तमिलनाडु CM थलपति विजय की सरकार के खिलाफ हाई कोर्ट पहुंची विधवा बस ऑपरेटर: 'वेट्री पयानम' फ्री बस योजना को दी चुनौती

तमिलनाडु CM थलपति विजय की सरकार के खिलाफ हाई कोर्ट पहुंची विधवा बस ऑपरेटर: 'वेट्री पयानम' फ्री बस योजना को दी चुनौती

तमिलनाडु में सत्ता संभालने के बाद मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय (थलपति विजय) की सरकार की एक प्रमुख जन-कल्याणकारी योजना कानूनी पेच में फंसती नजर आ रही है। राज्य सरकार द्वारा महिलाओं और ट्रांस महिलाओं (Trans Women) के लिए शुरू की गई मुफ्त बस यात्रा योजना—'वेट्री पयानम' (Vetri Payanam)—के खिलाफ ईरोड जिले की एक निजी बस ऑपरेटर महिला ने मद्रास हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

याचिकाकर्ता ने इस योजना को मनमाना और असंवैधानिक बताते हुए रद्द करने की मांग की है, क्योंकि इसके कारण निजी बस संचालकों के सामने भारी आर्थिक संकट और रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है।

क्या है पूरा मामला?

ईरोड जिला प्राइवेट बस ऑपरेटर एन. कलामणि (N. Kalamani) ने मद्रास हाई कोर्ट में रिट पिटीशन दाखिल की है:

  • याचिकाकर्ता की पृष्ठभूमि: कलामणि एक विधवा महिला हैं, जो अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए दो निर्धारित मार्गों (रूट्स) पर परमिट लेकर निजी बस चलाती हैं।

  • याचिका का आधार: उनका कहना है कि सरकारी बसों में महिलाओं और ट्रांस महिलाओं के लिए किराया पूरी तरह फ्री कर दिए जाने से निजी बसों के यात्री पूरी तरह गायब हो गए हैं।

  • सह-यात्रियों का असर: कलामणि ने अपनी याचिका में दलील दी कि जब परिवार की महिलाएं या छात्राएं मुफ्त सफर के लिए सरकारी बसों में चढ़ती हैं, तो उनके साथ यात्रा कर रहे पुरुष परिजन और अन्य यात्री भी स्वाभाविक रूप से उसी बस में चले जाते हैं। नतीजतन, निजी बसों को खाली दौड़ाना पड़ रहा है।

निजी बस ऑपरेटरों के सामने 'तालाबंदी' की नौबत

याचिका में दावा किया गया है कि 'वेट्री पयानम' योजना को बिना किसी ठोस वित्तीय संतुलन और निजी क्षेत्र के हितों को ध्यान में रखे लागू कर दिया गया:

  • डीजल और टैक्स की मार: निजी बस ऑपरेटरों को भारी रोड टैक्स, परमिट फीस, कर्मचारियों का वेतन और महंगे डीजल का खर्च अपनी जेब से वहन करना पड़ता है।

  • अस्तित्व पर संकट: यात्री न मिलने के कारण टिकट की कमाई शून्य के करीब पहुंच गई है, जिससे ग्रामीण व कस्बाई रूट्स पर दशकों से चल रही निजी बस सेवा को बंद करने की नौबत आ गई है।

  • समान अवसर के अधिकार का हनन: याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि सरकार की इस नीति ने निजी ऑपरेटरों के संविधान प्रदत्त व्यापार और आजीविका कमाने के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 19(1)(g)) पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है।

पिछली व्यवस्था बनाम नई नीति

याचिका में यह भी रेखांकित किया गया कि पूर्ववर्ती द्रमुक (DMK) सरकार के कार्यकाल के दौरान जब फ्री बस स्कीम चलाई गई थी, तब रूटों और बस श्रेणियों का इस प्रकार वर्गीकरण किया गया था ताकि निजी ऑपरेटरों का कारोबार पूरी तरह ठप न हो। लेकिन विजय सरकार के व्यापक विस्तार के बाद निजी क्षेत्र के लिए प्रतिस्पर्धा करना असंभव हो गया है।

मद्रास हाई कोर्ट की खंडपीठ में सुनवाई

इस संवेदनशील मामले की सुनवाई मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और जस्टिस जी. अरुल मुरुगन की खंडपीठ के समक्ष तय की गई है। अदालत इस बात पर विचार करेगी कि क्या लोक-कल्याणकारी मुफ्त परिवहन योजना किसी निजी व्यवसाय के अस्तित्व को संकट में डालने के आधार पर न्यायिक समीक्षा के दायरे में आती है या नहीं।