88% नहरी जल के उपयोग से सुधरा पंजाब का गिरता भूजल स्तर; सीएम बोले- अंडरग्राउंड पाइपलाइन से अंतिम छोर के हर खेत तक पहुंचा पानी

88% नहरी जल के उपयोग से सुधरा पंजाब का गिरता भूजल स्तर; सीएम बोले- अंडरग्राउंड पाइपलाइन से अंतिम छोर के हर खेत तक पहुंचा पानी

पंजाब की कृषि और पर्यावरण को लेकर एक बड़ी और सकारात्मक खबर सामने आई है। राज्य में दशकों से लगातार नीचे गिरते भूजल स्तर (Groundwater Depletion) और 'डार्क जोन' में तब्दील होते ब्लॉकों के बीच जल संरक्षण के प्रयासों के जमीनी नतीजे अब साफ दिखने लगे हैं। राज्य सरकार द्वारा नहरी सिंचाई प्रणाली के पुनरुद्धार और व्यापक बुनियादी ढांचे के विस्तार के चलते पंजाब में नहरी पानी के उपयोग में 88 प्रतिशत तक की उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।

नहरी जल के इस अधिकतम इस्तेमाल से सीधे तौर पर ट्यूबवेलों और सबमर्सिबल पंपों पर किसानों की निर्भरता कम हुई है, जिसके परिणामस्वरूप भूमिगत जल के अंधाधुंध दोहन पर प्रभावी रोक लगी है और कई क्षेत्रों में जलस्तर में सुधार दर्ज किया गया है।

अंडरग्राउंड पाइपलाइन से हर खेत तक पानी: सीएम का दावा

मुख्यमंत्री ने इस उपलब्धि पर बात करते हुए कहा कि राज्य सरकार का संकल्प था कि पंजाब के एक-एक बूंद पानी का सदुपयोग हो और अंतिम छोर (Tail End) पर बैठे किसान के खेत तक सिंचाई का पानी पहुंचे।

  • सैकड़ों किलोमीटर भूमिगत पाइपलाइन: सरकार ने टेल-एंड तक पानी पहुंचाने के लिए ओपन खालों (कच्चे नालों) के स्थान पर बड़े स्तर पर अंडरग्राउंड पाइपलाइन (UGPL - Underground Pipeline System) बिछाई है।

  • पानी की बर्बादी पर रोक: पाइपलाइन प्रणाली से वाष्पीकरण (Evaporation) और जमीन द्वारा पानी सोख लिए जाने (Seepage) की समस्या पूरी तरह खत्म हो गई है, जिससे 20 से 30 प्रतिशत अतिरिक्त पानी की बचत हो रही है।

  • सूखे टेल-एंड पर 30-40 साल बाद पहुंचा पानी: मालवा और सीमावर्ती जिलों के ऐसे सैकड़ों गांव, जहां पिछले तीन से चार दशकों से नहरों का पानी नहीं पहुंचा था, वहां अब नियमित रूप से पानी की आपूर्ति बहाल हो गई है।

ट्यूबवेलों पर निर्भरता घटी, बिजली सब्सिडी और पर्यावरण दोनों को राहत

धान के सीजन के दौरान पंजाब में लाखों कृषि ट्यूबवेल 24 घंटे चलते थे, जिससे हर साल भूजल कई फीट नीचे खिसक जाता था।

  • नहरी पानी का 88% उपयोग: खेतों तक नहरी पानी की निर्बाध आपूर्ति होने से किसानों को महंगे डीजल इंजन और भारी हॉर्सपावर वाले बिजली के ट्यूबवेल चलाने की जरूरत नहीं पड़ी।

  • बिजली की भारी बचत: ट्यूबवेलों का कम उपयोग होने से कृषि क्षेत्र में दी जाने वाली मुफ्त बिजली सब्सिडी के मद में सरकारी खजाने पर भी भार कम हुआ है और पावर ग्रिड पर से अतिरिक्त दबाव हटा है।

  • मिट्टी की उर्वरता में सुधार: नहरी पानी में प्राकृतिक गाद (Silt) और पोषक तत्व होते हैं, जो खारे व भारी ट्यूबवेल के पानी की तुलना में जमीन की उपजाऊ क्षमता को बढ़ाते हैं।

जीर्ण-शीर्ण नहरों की मरम्मत और क्षमता विस्तार अभियान

जल संसाधन विभाग द्वारा पिछले दो वर्षों में राज्य की प्रमुख नहरों, डिस्ट्रीब्यूटरी और माइनर्स की क्षमता बढ़ाने के लिए व्यापक अभियान चलाया गया:

  • कंक्रीट लाइनिंग और डी-सिल्टिंग: सालों से गाद और मलबे से पटी पड़ी नहरों की सफाई की गई और किनारों को पक्का (Concrete Relining) किया गया ताकि पानी की प्रवाह गति बढ़ सके।

  • जल विवादों का समाधान: सिंचाई विभाग ने स्थानीय स्तर पर किसानों के पानी की बारी (वारबंदी) को पारदर्शी बनाया, जिससे टेल-एंड पर स्थित छोटे किसानों को उनके हक का पानी मिलना सुनिश्चित हुआ।

  • बारिश के पानी का संरक्षण: मानसून के दौरान अतिरिक्त नहरी पानी को रीचार्जिंग कुओं और जल निकायों (Ponds) में मोड़कर भूजल पुनर्भरण की रफ्तार तेज की गई।

कृषि विशेषज्ञों की राय: भविष्य के लिए जीवनरेखा

कृषि और जल संरक्षण वैज्ञानिकों का मानना है कि पंजाब को 'रेगिस्तान' बनने से बचाने का एकमात्र जरिया नहरी नेटवर्क को 100% कार्यशील बनाना ही है। नहरी पानी का 88% स्तर तक पहुंचना राज्य के कृषि इतिहास में एक बड़ा मोड़ है। यदि आगामी वर्षों में भी अंडरग्राउंड पाइपलाइनों का दायरा इसी गति से बढ़ाया गया और फसल विविधीकरण (Crop Diversification) को साथ जोड़ा गया, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए पंजाब का जल संकट पूरी तरह समाप्त किया जा सकता है।

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