पंजाब में BJP में गए AAP विधायकों पर स्पीकर लेंगे बड़ा फैसला, दलबदल कानून के तहत सदस्यता रद्द होगी या बचेंगे?
पंजाब की सियासत में दल-बदल और विधानसभा सदस्यता को लेकर कानूनी तथा राजनीतिक सरगर्मी चरम पर पहुंच गई है। सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (AAP) को अलविदा कहकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) का दामन थामने वाले विधायकों की विधानसभा सदस्यता पर अब अंतिम फैसला पंजाब विधानसभा के स्पीकर कुलतार सिंह संधवां की चौखट पर आ टिका है। आम आदमी पार्टी की ओर से बागी विधायकों के खिलाफ संविधान की दसवीं अनुसूची यानी दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के तहत औपचारिक याचिकाएं दाखिल कर उनकी सदस्यता तत्काल प्रभाव से रद्द करने की मांग की गई है। इसके जवाब में भाजपा का दामन थामने वाले नेताओं का दावा है कि उनका कदम जनभावनाओं और हलके के विकास के अनुरूप है।
विधानसभा सचिवालय के गलियारों में अब इस बात की विस्तृत समीक्षा हो रही है कि संविधान और विधानसभा नियमावली के तहत स्पीकर के पास क्या-क्या शक्तियां हैं और सुनवाई की प्रक्रिया किस गति से आगे बढ़ेगी। पंजाब के राजनीतिक इतिहास में यह पहला मौका नहीं है जब किसी सत्ताधारी दल के विधायक विपक्षी खेमे में गए हों, लेकिन पूर्ण बहुमत वाली सरकार के दौर में इस तरह का दलबदल दोनों ही प्रमुख दलों के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई बन चुका है।
संविधान की 10वीं अनुसूची: स्पीकर का विशेषाधिकार और कानूनी पेच
भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची संसद और राज्य विधानसभाओं में राजनीतिक स्थिरता बनाए रखने और खरीद-फरोख्त रोकने के मकसद से 1985 में 52वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ी गई थी। इस कानून के पैरा 2(1)(a) के मुताबिक, यदि किसी राजनीतिक दल के टिकट पर चुना गया विधायक स्वेच्छा से अपनी मूल पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है, तो वह सदन की सदस्यता के अयोग्य हो जाता है। यहां 'स्वेच्छा से सदस्यता छोड़ना' केवल औपचारिक लिखित इस्तीफे तक सीमित नहीं है, बल्कि सार्वजनिक मंचों से दूसरी पार्टी का मंच साझा करना, पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होना और दूसरी पार्टी का झंडा थामना भी इसका सीधा प्रमाण माना जाता है।
दल-बदल विरोधी कानून के तहत अंतिम फैसला सुनाने का एकमात्र और अनन्य अधिकार संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी यानी विधानसभा स्पीकर के पास होता है। जब तक स्पीकर इस मामले पर अंतिम आदेश पारित नहीं करते, तब तक अदालतें आमतौर पर प्रक्रिया के बीच में हस्तक्षेप नहीं करतीं। इस प्रक्रिया के तहत सबसे पहले स्पीकर विरोधी पक्ष की याचिका की वैधता की जांच करते हैं, जिसके बाद आरोपी विधायकों को नोटिस जारी कर उनका लिखित पक्ष मांगा जाता है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और साक्ष्यों की जांच के बाद ही स्पीकर अपना निर्णय सुरक्षित रखते हैं और आदेश सुनाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की नजीरें: क्या समयसीमा बांध सकती है अदालत?
विधानसभा स्पीकर के फैसले को लेकर अतीत में कई राज्यों में कानूनी विवाद शीर्ष अदालत तक पहुंचे हैं। किहोतो होलोहन बनाम जाचिल्हू (1992) के ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने स्पष्ट किया था कि जब स्पीकर दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता याचिकाओं की सुनवाई करते हैं, तो वे एक अर्ध-न्यायिक न्यायाधिकरण (Quasi-Judicial Tribunal) की तरह काम करते हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि उनके फैसले न्यायिक समीक्षा के दायरे में आते हैं। यदि स्पीकर का फैसला दुर्भावनापूर्ण, असंवैधानिक या प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत पाया जाता है, तो उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय उसे रद्द कर सकते हैं।
इसके अलावा, मणिपुर विधानसभा से जुड़े एक चर्चित मामले (के. मेघचंद्र सिंह बनाम मणिपुर विधानसभा स्पीकर, 2020) में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि स्पीकर को अयोग्यता याचिकाओं पर सामान्य परिस्थितियों में तीन महीने के भीतर फैसला लेना चाहिए। पंजाब के मामले में यदि विधानसभा सचिवालय की ओर से प्रक्रिया में अत्यधिक देरी की जाती है, तो आम आदमी पार्टी अदालत का दरवाजा खटखटाकर समयबद्ध फैसले की गुहार लगा सकती है। वहीं, बागी विधायकों के कानूनी सलाहकार प्रक्रियात्मक आधारों पर सुनवाई को लंबा खींचने का प्रयास कर सकते हैं ताकि उनका कार्यकाल अधिक से अधिक समय तक सुरक्षित रह सके।
बागी विधायकों के पास क्या रास्ते बचे हैं?
दल-बदल कानून के तहत कार्रवाई का सामना कर रहे विधायकों के पास कानूनी और राजनीतिक रूप से बहुत सीमित विकल्प हैं। कानूनन, किसी दल से अलग होने पर अयोग्यता से बचने के लिए कम से कम दो-तिहाई विधायकों का एक साथ अलग होना अनिवार्य है, जिसे विलय माना जा सकता है। चूंकि पंजाब में भाजपा में शामिल हुए विधायकों की संख्या दो-तिहाई के आंकड़े से काफी कम है, इसलिए वे सामूहिक विभाजन या विलय की कानूनी ढाल का सहारा नहीं ले सकते।
ऐसी स्थिति में बागी विधायकों के सामने तीन मुख्य रास्ते नजर आते हैं। पहला रास्ता यह है कि वे स्पीकर द्वारा अयोग्य घोषित किए जाने से पहले ही खुद विधानसभा की सदस्यता से औपचारिक इस्तीफा सौंप दें। इस्तीफा स्वीकार होने पर सीट तुरंत रिक्त घोषित हो जाती है और वे कानूनी कलंक से बचकर उपचुनाव की राह पकड़ सकते हैं। दूसरा रास्ता यह है कि वे विधानसभा स्पीकर की न्यायिक प्रक्रिया में भाग लें, तकनीकी खामियों की दलील दें और पार्टी से निकाले जाने या पार्टी व्हिप का उल्लंघन न करने जैसे तर्कों के सहारे खुद का बचाव करें। तीसरा रास्ता स्पीकर के संभावित अयोग्यता आदेश को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देकर राहत हासिल करने की कोशिश करना है।
पंजाब की जमीनी सियासत पर असर और उपचुनावों की आहट
यदि विधानसभा स्पीकर इन विधायकों की सदस्यता रद्द करते हैं या विधायक स्वयं इस्तीफा देते हैं, तो दोनों ही सूरतों में उन विधानसभा हलकों में छह महीने के भीतर उपचुनाव कराना चुनाव आयोग की संवैधानिक बाध्यता होगी। पंजाब की सियासत के लिहाज से यह बेहद संवेदनशील मोड़ होगा। मालवा, दोआबा या माझा—जिस भी क्षेत्र से यह सीटें खाली होंगी, वहां का चुनावी मुकाबला त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय होने की संभावना बनेगी।
सत्ताधारी आम आदमी पार्टी के लिए यह अपनी साख बचाने और बागियों को राजनीतिक सबक सिखाने का इम्तिहान होगा, ताकि पार्टी के भीतर किसी भी संभावित असंतोष को सख्त संदेश दिया जा सके। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी के लिए पंजाब में ग्रामीण और शहरी दोनों स्तरों पर अपने पैर पसारने का यह बड़ा अवसर होगा। भाजपा इन सीटों पर अपने नए चेहरों के दम पर यह साबित करने की कोशिश करेगी कि पंजाब का मतदाता पारंपरिक क्षेत्रीय दलों और 'आप' के विकल्प के रूप में उसे स्वीकार करने के लिए तैयार है। वहीं कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल भी इन सीटों पर सत्ता विरोधी लहर को भुनाने के लिए पूरी ताकत झोंकेंगे।
विधानसभा सचिवालय के सूत्रों के अनुसार, स्पीकर कुलतार सिंह संधवां ने नियमों और स्थापित परंपराओं के तहत फाइलों का अध्ययन शुरू कर दिया है। आने वाले कुछ सप्ताह पंजाब की संसदीय राजनीति के लिए निर्णायक साबित होंगे, जहां कानून की धाराएं, न्यायिक नजीरें और राजनीतिक भविष्य एक ही पटल पर टकराते दिखाई देंगे।