त्योहारों पर आसमान छू रहा फ्लाइट का किराया: घर जाना विदेश यात्रा से भी महंगा

त्योहारों पर आसमान छू रहा फ्लाइट का किराया: घर जाना विदेश यात्रा से भी महंगा

दिवाली और छठ महापर्व पर घर लौटने की तैयारी कर रहे लाखों प्रवासियों को इस बार यात्रा के लिए अपनी जेब अत्यधिक ढीली करनी पड़ रही है। रेलवे में महीनों पहले से सीटें फुल होने और लंबी वेटिंग लिस्ट के 'रिग्रेट' (नो रूम) में तब्दील हो जाने के कारण बड़ी संख्या में लोगों ने हवाई यात्रा की ओर रुख किया, लेकिन विमानन कंपनियों के डायनामिक फेयर सिस्टम ने हवाई सफर को आम आदमी की पहुंच से लगभग बाहर कर दिया है। त्योहारों के चरम दिनों में देश के प्रमुख महानगरों से उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के शहरों के लिए घरेलू उड़ानों का एक तरफ का किराया 20 हजार से लेकर 35 हजार रुपये तक पहुंच चुका है। स्थिति यह हो गई है कि घरेलू मार्गों पर सफर का खर्च दुबई, बैंकॉक या सिंगापुर जैसे लोकप्रिय अंतरराष्ट्रीय गंतव्यों के हवाई किराए के बराबर या उससे भी अधिक हो गया है।

सामान्य दिनों से 3 गुना तक उछले दाम, वाराणसी-पटना का टिकट 25 हजार पार

आमतौर पर सामान्य दिनों में दिल्ली से वाराणसी का हवाई टिकट 4 से 5 हजार रुपये, मुंबई से 5 से 6 हजार रुपये और बेंगलुरु से 8 से 10 हजार रुपये के आसपास मिल जाता है। हालांकि नवंबर के पहले सप्ताह यानी दिवाली व छठ पूजा के दौरान यही किराया तीन से चार गुना तक उछल चुका है। बेंगलुरु से वाराणसी आने वाले विमानों का किराया 15 से 22 हजार रुपये और मुंबई से वाराणसी का टिकट 13 से 18 हजार रुपये में बिक रहा है। 5 नवंबर के आसपास चेन्नई और अहमदाबाद से वाराणसी के सीधी उड़ानों की सीटें पूरी तरह फुल हो चुकी हैं, जिसके चलते यात्रियों को कनेक्टिंग फ्लाइट्स के लिए 21 हजार से 35 हजार रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं। इसी तरह बिहार के दरभंगा और पटना जाने वाली उड़ानों में मुंबई व हैदराबाद से टिकट 25 हजार से 30 हजार रुपये के पार पहुंच चुका है।

देश के भीतर सफर महंगा, विदेश जाना क्यों पड़ रहा सस्ता?

त्योहारी सीजन में किराए की तुलना करने पर चौंकाने वाले आंकड़े सामने आ रहे हैं। इस समय दिल्ली या हैदराबाद से बैंकॉक, मलेशिया और शारजाह के लिए एक तरफ का टिकट 15 हजार से 22 हजार रुपये के दायरे में आसानी से मिल रहा है। वहीं दूसरी ओर, दिल्ली से पटना या मुंबई से गोरखपुर और दरभंगा जाने वाले यात्रियों को 25 हजार से 32 हजार रुपये तक चुकाने पड़ रहे हैं। यानी दक्षिण-पूर्व एशिया या खाड़ी देशों की अंतरराष्ट्रीय यात्रा की तुलना में अपने ही देश में एक से दो घंटे की घरेलू उड़ान भरना अधिक महंगा साबित हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय उड़ानों की क्षमता और मार्गों पर संतुलन होने के कारण वहां कीमतों में इतनी तीव्र अस्थिरता नहीं है, जबकि घरेलू मांग पूरी तरह एकतरफा हो गई है।

ट्रेनों में 'रिग्रेट' का बोर्ड और सीमित उड़ानों ने बढ़ाई यात्रियों की मजबूरी

हवाई किराए में इस भारी उछाल के पीछे प्रमुख कारण ट्रेनों का पूरी तरह पैक होना और उड़ानों की सीमित संख्या है। दिल्ली, मुंबई, सूरत और पुणे से पूर्वांचल व बिहार जाने वाली अधिकांश एक्सप्रेस व सुपरफास्ट ट्रेनों में कंफर्म सीटें, आरएसी (RAC) और यहां तक कि वेटिंग लिस्ट की अधिकतम सीमा भी समाप्त हो चुकी है। इसके अलावा सड़क मार्ग पर चलने वाली प्राइवेट वोल्वो बसों ने भी अपने किराए दोगुने कर दिए हैं। ऐसे में जिन लोगों को अनिवार्य रूप से त्योहार पर अपने परिवार के पास पहुंचना है, उनके पास आखिरी विकल्प के रूप में हवाई सफर ही बचता है। एयरलाइंस के अल्गोरिदम मांग में अचानक हुई इस भारी बढ़ोतरी को भांपते हुए बची हुई सीटों के दाम लगातार बढ़ाते जा रहे हैं।

एविएशन टरबाइन फ्यूल में तेजी और फ्यूल सरचार्ज का अतिरिक्त बोझ

विमान किराए में आई इस अभूतपूर्व तेजी के पीछे परिचालन लागत में बढ़ोतरी भी एक बड़ा कारक बनकर उभरी है। हाल के दिनों में एविएशन टरबाइन फ्यूल (ATF यानी जेट ईंधन) की वैश्विक और घरेलू कीमतों में आई तेजी के बाद इंडिगो समेत कई प्रमुख एयरलाइंस ने फ्यूल सरचार्ज बढ़ा दिया है। लंबी दूरी के घरेलू सेक्टरों पर इस सरचार्ज के कारण प्रति टिकट अतिरिक्त आर्थिक भार जुड़ गया है। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे त्योहार की तारीखें नजदीक आएंगी और अंतिम कुछ दिनों की सीटें बिकेंगी, बचे हुए टिकटों के दाम 15 से 20 प्रतिशत तक और बढ़ सकते हैं। ऐसे में यात्रियों को सलाह दी जा रही है कि वे आखिरी क्षणों के अत्यधिक किराए से बचने के लिए निकटवर्ती वैकल्पिक हवाई अड्डों या कनेक्टिंग उड़ानों के विकल्पों की भी पड़ताल कर लें।