UP में चुनाव आयोग का बड़ा एक्शन: गृह जिले और 3 साल से जमे अफसरों के तबादले का आदेश, चुनावी ड्यूटी पर सख्त बैन
उत्तर प्रदेश में आगामी चुनावी प्रक्रियाओं को स्वतंत्र, पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने के उद्देश्य से भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ने अधिकारियों के तबादले और तैनाती को लेकर कड़े दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं। आयोग ने स्पष्ट किया है कि चुनाव संचालन से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े किसी भी प्रशासनिक या पुलिस अधिकारी को उसके गृह जिले में चुनावी जिम्मेदारी नहीं सौंपी जाएगी। इसके साथ ही, पिछले चार वर्षों के दौरान किसी एक जिले में तीन साल या उससे अधिक की सेवा पूरी कर चुके अधिकारियों को भी तत्काल प्रभाव से जिले से बाहर स्थानांतरित किया जाएगा।
31 मई 2027 बनेगी कट-ऑफ तारीख, तय समय में रिपोर्ट तलब
चुनाव आयोग के निर्देशों के अनुसार, उत्तर प्रदेश के लिए अधिकारियों के कार्यकाल की गणना 31 मई 2027 की कट-ऑफ तारीख को आधार बनाकर की जाएगी। यदि कोई अधिकारी 31 मई 2027 तक किसी जिले में 3 साल का समय पूरा कर रहा है, तो उसे भी अनिवार्य रूप से ट्रांसफर के दायरे में शामिल किया जाएगा। आयोग ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक (DGP) को इस ट्रांसफर पॉलिसी का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने और अनुपालन रिपोर्ट निर्धारित समयसीमा के भीतर आयोग को सौंपने के निर्देश दिए हैं।
किन अधिकारियों पर लागू होगी यह सख्ती?
आयोग का यह आदेश सीधे तौर पर चुनाव के संचालन, कानून-व्यवस्था और फील्ड मैनेजमेंट से जुड़े अधिकारियों पर प्रभावी होगा:
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प्रशासनिक अधिकारी: जिला निर्वाचन अधिकारी (DEO/DM), अपर जिलाधिकारी (ADM), उपजिलाधिकारी (SDM), रिटर्निंग ऑफिसर (RO), सहायक रिटर्निंग ऑफिसर (ARO), तहसीलदार और ब्लॉक स्तर के चुनाव नोडल अधिकारी।
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पुलिस अधिकारी: पुलिस कमिश्नर, आईजी, डीआईजी, एसएसपी/एसपी, अपर पुलिस अधीक्षक (Addl. SP), पुलिस उपाधीक्षक (CO/DSP), इंस्पेक्टर और सब-इंस्पेक्टर (दारोगा) स्तर के सभी अधिकारी।
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प्रमोशन पर भी नियम: यदि किसी अधिकारी को उसी जिले के भीतर पदोन्नति मिली है, तो उसके कुल कार्यकाल की गणना में दोनों पदों की अवधि को एक साथ जोड़ा जाएगा।
पिछले चुनाव और उपचुनाव वाली सीटों पर दोबारा पोस्टिंग नहीं
आयोग ने एक और महत्वपूर्ण खंड जोड़ते हुए स्पष्ट किया है कि जो अधिकारी पिछले आम चुनाव या उसके बाद संबंधित विधानसभा क्षेत्र में हुए किसी उपचुनाव के दौरान तैनात रहे हैं, उन्हें दोबारा उसी विधानसभा क्षेत्र या जिले में तैनात नहीं किया जा सकेगा। इसके पीछे की मंशा यह है कि कोई भी अधिकारी स्थानीय स्तर पर राजनीतिक दलों या रसूखदार उम्मीदवारों के साथ अपने पुराने संपर्कों का प्रभाव न डाल सके।
दागी और अनुशासनात्मक कार्रवाई झेल रहे अधिकारियों पर पूर्ण पाबंदी
ट्रांसफर-पोस्टिंग के नियमों में आयोग ने चुनावी शुचिता पर विशेष जोर दिया है:
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लापरवाही का इतिहास: जिन अधिकारियों के खिलाफ अतीत में चुनावी ड्यूटी के दौरान पक्षपात, लापरवाही या आचार संहिता उल्लंघन की शिकायत पर कार्रवाई की सिफारिश की गई थी, उन्हें किसी भी सूरत में चुनाव कार्य में नहीं लगाया जाएगा।
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लंबित आपराधिक मुकदमे: जिन सरकारी सेवकों के खिलाफ किसी अदालत में आधिकारिक कामकाज या भ्रष्टाचार से संबंधित आपराधिक मामले लंबित हैं, उन्हें भी चुनावी प्रक्रियाओं से पूरी तरह अलग रखा जाएगा।
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सेवानिवृत्ति की छूट: ऐसे अधिकारी जो अगले 6 महीनों के भीतर रिटायर होने वाले हैं, उन्हें जिले से बाहर ट्रांसफर करने के बजाय केवल गैर-चुनावी (Non-Election) पदों पर स्थानांतरित किया जाएगा।
मतदाता सूची के पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े अफसरों पर क्या होगा असर?
निर्वाचन आयोग ने यह भी निर्देश दिया है कि वर्तमान में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Summary Revision) से जुड़े अधिकारियों का तबादला आयोग की पूर्वानुमति के बिना नहीं किया जा सकेगा। मतदाता सूची के अंतिम प्रकाशन तक यह रोक प्रभावी रहेगी ताकि वोटर लिस्ट तैयार करने का काम प्रभावित न हो। जैसे ही पुनरीक्षण का कार्य पूरा होगा, 3 साल और गृह जिले के मानक के अनुसार व्यापक फेरबदल की प्रक्रिया को धरातल पर उतार दिया जाएगा।