बेंजामिन नेतन्याहू हार गए तो क्या थम जाएगा ईरान से युद्ध? इजरायल में आज मतदान, समझिए सत्ता बदलने पर भी क्यों नहीं थमेगा मिसाइलों का दौर

बेंजामिन नेतन्याहू हार गए तो क्या थम जाएगा ईरान से युद्ध? इजरायल में आज मतदान, समझिए सत्ता बदलने पर भी क्यों नहीं थमेगा मिसाइलों का दौर

इजरायल में आज 73 लाख से अधिक मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर रहे हैं। 2019 के बाद से यह देश का छठा आम चुनाव है, जिसे प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक अस्तित्व और युद्ध नेतृत्व पर एक सीधा जनमत संग्रह माना जा रहा है। वैश्विक कूटनीतिक गलियारों और मध्य पूर्व में इस समय सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि यदि नेतन्याहू चुनाव हार जाते हैं और विपक्ष सत्ता में आता है, तो क्या ईरान, यमन के हूतियों और हिजबुल्लाह के खिलाफ चल रहा सैन्य मोर्चा शांत हो जाएगा?

अंतरराष्ट्रीय रक्षा विश्लेषकों, पूर्व सैन्य अधिकारियों और तेल अवीव की सुरक्षा स्थापना (Security Establishment) का एकमुश्त जवाब है—"नहीं"। नेतृत्व बदलने से युद्ध की शैली और रणनीतिक भाषा बदल सकती है, लेकिन ईरान को लेकर इजरायल की बुनियादी सुरक्षा नीति में कोई बड़ा बदलाव आने की संभावना लगभग शून्य है।

1. ईरान को लेकर इजरायल में 'राष्ट्रीय आम सहमति'

इजरायल की राजनीति आंतरिक मुद्दों (जैसे न्यायपालिका सुधार, धर्मनिरपेक्षता और धुर-दक्षिणपंथी राजनीति) को लेकर भले ही बुरी तरह बंटी हो, लेकिन ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसकी बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों में पूर्ण आम सहमति (National Consensus) है।

  • अस्तित्व का संकट (Existential Threat): इजरायल में चाहे दक्षिणपंथी लिकुड पार्टी हो या मध्यमार्गी/उदारवादी विपक्ष, हर कोई ईरान को देश के अस्तित्व के लिए सीधा खतरा मानता है।

  • विपक्षी नेता भी पूर्व सैन्य प्रमुख: नेतन्याहू के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी गादी इसनकोट (पूर्व आईडीएफ चीफ ऑफ स्टाफ), बेनी गैंट्ज़ और नफ्ताली बेनेट खुद सुरक्षा मामलों में बेहद आक्रामक माने जाते हैं। नफ्ताली बेनेट ने ही ईरान के खिलाफ "ऑक्टोपस डॉक्ट्रिन" (सिर पर सीधे वार करने की नीति) पेश की थी। ऐसे में अगर इनमें से कोई भी सत्ता में आता है, तो वह ईरान के प्रति नरम रुख नहीं अपनाएगा।

2. नेतन्याहू के हारने पर क्या बदलेगा? 'शैली बनाम रणनीति'

यदि नेतन्याहू सत्ता से बाहर होते हैं, तो युद्ध के रुख में बुनियादी नीति के बजाय कार्यप्रणाली में बदलाव देखने को मिलेंगे:

पहलू नेतन्याहू का नेतृत्व संभावित विपक्षी नेतृत्व (इसनकोट / बेनेट)
अमेरिका के साथ तालमेल वाशिंगटन के दबाव की अनदेखी, खुली तनातनी और एकतरफा आक्रामक फैसले। अमेरिका और पश्चिमी सहयोगियों के साथ पूर्ण कूटनीतिक समन्वय और साझा सैन्य रणनीति।
सैन्य नेतृत्व (IDF) पर भरोसा सेना जनरलों और खुफिया एजेंसियों से टकराव और राजनीतिक दबाव। आईडीएफ (IDF) के संस्थागत सुझावों और योजनाबद्ध रणनीतियों पर पूरी निर्भरता।
क्षेत्रीय कूटनीति अब्राहम एकॉर्ड को किनारे कर केवल सीधी सैन्य शक्ति पर अत्यधिक जोर। सुन्नी अरब देशों (सऊदी अरब, यूएई) के साथ मिलकर एक औपचारिक रक्षा कवच बनाने की कोशिश।
सैन्य कार्रवाई का तरीका हाई-प्रोफाइल राजनीतिक हमले और निरंतर तनाव बनाए रखने की नीति। गुप्त ऑपरेशंस (कवर्ट ऑपरेशंस), साइबर युद्ध और विशिष्ट सैन्य ठिकानों पर पिन-पॉइंट स्ट्राइक।

3. सेना प्रमुख से टकराव और चुनाव से पहले हमले का दबाव

मतदान से ठीक पहले इजरायली मीडिया और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में यह बड़ा खुलासा हुआ था कि नेतन्याहू ने चुनाव से ठीक पहले ईरान पर एक और बड़ा सैन्य हमला करने का दबाव बनाया था। हालांकि, आईडीएफ के चीफ ऑफ स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल इयाल जमीर ने इसका कड़ा विरोध करते हुए स्पष्ट निर्देश को लिखित में मांगा और चेतावनी दी कि चुनावी लाभ के लिए बिना किसी रणनीतिक अनिवार्यता के ऐसा कदम देश को बड़े जोखिम में डाल सकता है।

विपक्षी नेताओं ने भी आरोप लगाया था कि नेतन्याहू अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए सेना को मोहरा बना रहे हैं। नेतन्याहू के हटने का एकमात्र सीधा परिणाम यह होगा कि सेना पर से ऐसा 'राजनीतिक रूप से प्रेरित दबाव' हट जाएगा और सैन्य फैसले विशुद्ध रक्षा जरूरतों के आधार पर लिए जाएंगे।

4. तेहरान का रुख: 'इजरायल में कौन पीएम बना, हमें फर्क नहीं पड़ता'

ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बागाई ने इजरायल में हो रहे मतदान पर प्रतिक्रिया देते हुए साफ कहा कि तेल अवीव में सत्ता परिवर्तन से तेहरान की नीतियों पर कोई असर नहीं पड़ने वाला। ईरान का मानना है कि चाहे नेतन्याहू सत्ता में रहें या विपक्ष, इजरायल का सैन्य ढांचा और गाजा-लेबनान-सीरिया में उसकी उपस्थिति आक्रामक ही बनी रहेगी। हूती विद्रोही और हिजबुल्लाह भी किसी नए इजरायली प्रधानमंत्री के आने से अपने हथियार नहीं डालेंगे।

नेतन्याहू जाएं या रहें, आग सुलगती रहेगी

इजरायल के इस चुनाव से देश के घरेलू लोकतंत्र, न्यायपालिका और बंधकों की रिहाई पर असर पड़ सकता है, लेकिन ईरान के खिलाफ चल रही सामरिक जंग थमने वाली नहीं है। नया नेतृत्व भले ही वाशिंगटन के साथ तनाव कम कर ले और आक्रामक बयानों पर लगाम लगाए, लेकिन जब तक ईरान का परमाणु संवर्धन कार्यक्रम पूरी तरह निष्प्रभावी नहीं होता या कोई नया कूटनीतिक समझौता नहीं बनता, तब तक लाल सागर से लेकर तेहरान तक मिसाइलों और ड्रोनों का खतरा बरकरार रहेगा।