ब्राजील में चौथी बार लूला की ऐतिहासिक ताजपोशी, फ्लेवियो बोल्सोनारो की करारी हार

ब्राजील में चौथी बार लूला की ऐतिहासिक ताजपोशी, फ्लेवियो बोल्सोनारो की करारी हार

लैटिन अमेरिका के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश ब्राजील में सत्ता के महासंग्राम का पटाक्षेप हो गया है। वामपंथी राजनीति के सबसे अनुभवी स्तंभ और मौजूदा राष्ट्रपति लुइस इनासियो लूला डा सिल्वा ने कड़े और सांसें थाम देने वाले रनऑफ मुकाबले में दक्षिणपंथी प्रतिद्वंद्वी फ्लेवियो बोल्सोनारो को शिकस्त देकर चौथी बार राष्ट्रपति पद पर ऐतिहासिक जीत दर्ज कर ली है। ब्राजील के शीर्ष चुनावी प्राधिकरण ने आधिकारिक तौर पर लूला की जीत की पुष्टि कर दी है, जिसके साथ ही लैटिन अमेरिका की सबसे विशाल अर्थव्यवस्था में वामपंथी विचारधारा की पकड़ और अधिक मजबूत हो गई है। जीत का ऐलान होते ही राजधानी ब्रासीलिया से लेकर साओ पाउलो और रियो डी जेनेरियो की सड़कों पर लाल झंडों के साथ लाखों समर्थकों का हुजूम उमड़ पड़ा।

साओ पाउलो में आयोजित एक भव्य विजय रैली को संबोधित करते हुए 80 वर्षीय लूला डा सिल्वा ने अंतरराष्ट्रीय शक्तियों, विशेषकर वाशिंगटन की विदेश नीति को कड़े शब्दों में कटघरे में खड़ा किया। उन्होंने दहाड़ते हुए कहा कि ब्राजील एक स्वतंत्र और स्वाभिमानी राष्ट्र है, यह किसी का पिछलग्गू या किसी बड़ी शक्ति का 'बैकयार्ड' (आंगन) नहीं है। लूला का यह सीधा बयान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और वाशिंगटन के उस प्रभाव पर करारा तंज माना जा रहा है, जिसे दक्षिणपंथी खेमा ब्राजील पर थोपने की वकालत कर रहा था। लूला ने स्पष्ट किया कि ब्राजील के स्वाभिमानी नागरिकों ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल करके विदेशी दखल और बाहरी दबाव की साजिशों को सिरे से खारिज कर दिया है।

चुनावी रण में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर नियंत्रण की वकालत और ट्रंप को बड़ा रणनीतिक झटका

चुनावी अभियान के दौरान उभरे आधुनिक विवादों का जिक्र करते हुए राष्ट्रपति लूला ने तकनीकी दिग्गजों और सोशल मीडिया की भूमिका पर भी बेहद सख्त रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि आज के दौर में लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को विधिक दायरे में लाना और उन्हें सख्ती से रेगुलेट करना अनिवार्य हो चुका है। लूला ने दावा किया कि उनके पूरे अभियान ने चुनावी प्रक्रिया के दौरान विदेशी शक्तियों द्वारा सोशल मीडिया और एल्गोरिद्म के जरिए फैलाए गए दुष्प्रचार और चुनावी दखलंदाजी का डटकर मुकाबला किया और अंततः सत्य की विजय हुई।

अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रॉयटर्स की लाइव कवरेज और आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, मतगणना के दौरान लूला ने लगातार बढ़त बनाए रखी और 51.21 प्रतिशत से अधिक मत हासिल कर निर्णायक विजय पाई, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी फ्लेवियो बोल्सोनारो 48.79 प्रतिशत मतों पर सिमट गए। चुनाव आयोग की अंतिम मुहर से पहले ही देश के सबसे प्रतिष्ठित पोलस्टर 'डेटाफोलहा' ने लूला की विजय का सटीक अनुमान जारी कर दिया था। लूला की यह जीत लैटिन अमेरिका में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रभाव और उनके रणनीतिक सहयोगियों के लिए एक बहुत बड़ा कूटनीतिक झटका साबित हुई है, क्योंकि वॉशिंगटन दक्षिणपंथी खेमे के जरिए इस पूरे क्षेत्र में अपनी मजबूत पकड़ बनाना चाहता था।

जेल में बंद जायर बोल्सोनारो के बेटे फ्लेवियो की चुनौती और नतीजों को रद्द करने की मांग

इस चुनाव में लूला के सामने ताल ठोक रहे दक्षिणपंथी उम्मीदवार फ्लेवियो बोल्सोनारो कोई साधारण नेता नहीं, बल्कि देश के प्रभावशाली सीनेटर और जेल में बंद पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के सबसे बड़े बेटे हैं। फ्लेवियो ने अपने पूरे चुनावी अभियान को ट्रंप प्रशासन के साथ प्रगाढ़ संबंधों, वाशिंगटन समर्थक नीतियों और अमेरिकी उद्योगपतियों के साथ बड़े व्यापारिक समझौतों के इर्द-गिर्द केंद्रित रखा था। चुनावी नतीजे सामने आने के बाद दक्षिणपंथी खेमे में भारी हताशा देखी जा रही है और अपनी पराजय को स्वीकार करने के बजाय फ्लेवियो बोल्सोनारो ने चुनाव प्रक्रिया में कथित विसंगतियों का आरोप लगाते हुए पूरे चुनाव परिणाम को तुरंत रद्द करने की औपचारिक मांग उठा दी है।

गौरतलब है कि लूला डा सिल्वा ने इससे पहले 2003 से 2010 तक ब्राजील की सत्ता संभाली थी और उस दौरान वे ब्राजील के सामानों पर अमेरिकी टैरिफ तथा वाशिंगटन द्वारा क्षेत्रीय आपराधिक गिरोहों को विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित करने की एकतरफा नीतियों के प्रखर आलोचक रहे थे। दूसरी ओर, फ्लेवियो बोल्सोनारो ने दावा किया था कि यदि वे सत्ता में आते हैं, तो वे दुर्लभ खनिजों (Rare Earth Minerals) के विशाल भंडार के दोहन के लिए अमेरिका को विशेष प्राथमिकता देंगे। ब्राजील के पास अनुमानित 21 मिलियन टन दुर्लभ खनिजों का अकूत भंडार है, जो वैश्विक स्तर पर चीन के बाद दूसरे स्थान पर आता है। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रविवार को बयान दिया था कि वे चुनाव पर पैनी नजर रख रहे हैं, लेकिन उन्होंने औपचारिक तौर पर किसी भी उम्मीदवार का खुला समर्थन करने से खुद को अलग रखा था।

'अब कोई विरोधी नहीं, 215 मिलियन ब्राजीलियाई लोगों की सरकार': लूला का सुलह और जनभागीदारी का आह्वान

एक बेहद तीखे और कटुतापूर्ण अभियान के बाद लूला डा सिल्वा ने राष्ट्र के नाम अपने संदेश में सुलह और राष्ट्रीय एकता की नई राह पकड़ने का संकल्प दोहराया। ब्राजील की संसद (कांग्रेस) में कंजर्वेटिव दलों के बहुमत को देखते हुए लूला ने राजनीतिक मतभेदों को भुलाकर सभी दलों के साथ मिलकर काम करने का खुला प्रस्ताव दिया। उन्होंने भावुक होकर कहा, "मैं देश के सभी 215 मिलियन (21.5 करोड़) ब्राजीलियाई नागरिकों का राष्ट्रपति बनकर शासन करूंगा। अब चुनाव समाप्त हो चुका है और हमारा कोई व्यक्तिगत या चुनावी विरोधी शेष नहीं है।"

लूला ने शासन व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव और नीतियों के निर्माण में आम जनता की प्रत्यक्ष भागीदारी बढ़ाने का वादा किया। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार केवल कुछ नौकरशाहों के सहारे नहीं चलेगी, बल्कि बजट निर्माण और बुनियादी योजनाओं में जनता की आवाज को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी। लूला ने जोर देकर कहा कि उनके प्रचार अभियान की सबसे बड़ी सफलता यह रही कि वे देश के गरीब, मजदूर और वंचित तबके को यह समझाने में कामयाब रहे कि ब्राजील की लोकतांत्रिक संस्थाओं को बचाने के लिए मतपेटी तक पहुंचना क्यों आवश्यक था।

पहले दौर के 22 लाख वोटों के घाटे से ऐतिहासिक रनऑफ तक: गरीबी उन्मूलन के रिकॉर्ड ने दिलाई जीत

यह चुनावी मुकाबला हाल के इतिहास का सबसे दिलचस्प रीमैच था। पहले दौर के मतदान में फ्लेवियो बोल्सोनारो ने लूला पर 22 लाख (2.2 मिलियन) से अधिक वोटों की भारी बढ़त बना ली थी, जिससे ऐसा लग रहा था कि दक्षिणपंथी खेमा बाजी मार लेगा। लेकिन दूसरे दौर के रनऑफ में लूला ने जबर्दस्त जनसमर्थन जुटाकर पासा पूरी तरह पलट दिया। 1985 में तानाशाही समाप्त होने के बाद से यह दूसरा मौका है जब देश ने इतना कड़ा चुनावी मुकाबला देखा है।

लूला की इस शानदार वापसी के पीछे उनका पुराना गरीबी उन्मूलन का स्वर्णिम ट्रैक रिकॉर्ड रहा। समाज के पिछड़े तबकों, कामगारों और पूर्वोत्तर ब्राजील की ग्रामीण आबादी ने लूला के सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों 'बोल्सा फैमिलिया' और भूख के खिलाफ उनकी प्रतिबद्धता पर दोबारा अटूट भरोसा जताया। हालांकि, बोल्सोनारो के समर्थकों ने बढ़ती महंगाई, करों के बोझ और लूला खेमे पर भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर उन्हें घेरने की भरपूर कोशिश की, लेकिन ब्राजील के बहुसंख्यक मतदाताओं ने एक बार फिर सामाजिक सुरक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए लूला डा सिल्वा के अनुभवी हाथों में देश की बागडोर सौंपना ही बेहतर समझा।