वाह रे दोस्त! अमेरिका ने तो हूतियों संग ही कर ली 'सेटिंग', सऊदी अरब को बीच मझधार में छोड़ा; मस्कट सीक्रेट डील से खुला बड़ा खेल
पश्चिम एशिया (Middle East) के कूटनीतिक और सामरिक रंगमंच पर 'दोस्ती और भरोसे' की एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने अरब जगत के सबसे शक्तिशाली मुल्क सऊदी अरब को गहरा झटका दिया है। दशकों से जिस अमेरिका को सऊदी अरब अपना सबसे बड़ा रणनीतिक और सुरक्षा साझेदार मानता रहा, उसी अमेरिका ने अपनी सुरक्षा के लिए पर्दे के पीछे ऐसा पासा फेंका है जिसे देखकर रियाद के नीति-निर्माता सन्न रह गए हैं। ओमान की मध्यस्थता में अमेरिका और यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के बीच एक गोपनीय बैठक हुई है। इस सीक्रेट बातचीत में एक ऐसी मौन सहमति (टैसिट अंडरस्टैंडिंग) बनी है, जिसके तहत हूतियों ने अमेरिकी वाणिज्यिक और नौसैनिक जहाजों पर लाल सागर में हमले न करने का वचन दिया है। लेकिन सौदे का सबसे कड़वा सच यह है कि हूतियों ने सऊदी अरब के जहाजों और उसके तेल ले जाने वाले टैंकरों को बख्शने से साफ इनकार कर दिया है। वहीं दूसरी ओर, हूतियों के हमलों से घिरे सऊदी अरब को अमेरिका ने सीधे सैन्य हस्तक्षेप से मना करते हुए अकेले ही जंग लड़ने के लिए छोड़ दिया है।
ओमान के मस्कट में हुई गुप्त बातचीत, क्या हुआ समझौता?
अंतरराष्ट्रीय मीडिया और राजनयिक सूत्रों के अनुसार, यह गोपनीय बैठक ओमान की राजधानी मस्कट स्थित अमेरिकी दूतावास में आयोजित की गई। वार्ता में हूती गुट की ओर से उनके वरिष्ठ वार्ताकार मोहम्मद अब्दुल सलाम और अब्दुल मलिक अल-अजिरी शामिल हुए, जबकि अमेरिकी पक्ष का प्रतिनिधित्व वरिष्ठ राजनयिकों ने किया।
इस गुप्त बातचीत में हूतियों ने वाशिंगटन को भरोसा दिलाया कि वे 2025 में हुए संघर्ष विराम (Ceasefire) का पूरी तरह पालन करेंगे और लाल सागर (Red Sea) के अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग में किसी भी अमेरिकी या अन्य अंतरराष्ट्रीय जहाजों को निशाना नहीं बनाएंगे। लेकिन हूती प्रतिनिधियों ने स्पष्ट शर्त रखी कि यमन पर नाकेबंदी और हालिया बमबारी के चलते सऊदी अरब के जहाजों और सऊदी क्रूड ऑयल ले जाने वाले टैंकरों पर उनके हमले बेरोकटोक जारी रहेंगे। अमेरिकी प्रशासन ने अपने हितों और जहाजों को सुरक्षित पाते हुए इस व्यवस्था पर सहमति जता दी, जिससे साफ हो गया कि अमेरिका ने अपने जहाजों का सुरक्षा कवच तो हासिल कर लिया, लेकिन अपने पुराने सहयोगी सऊदी अरब को भेड़ियों के आगे छोड़ दिया।
सऊदी ने मांगी थी सीधी सैन्य मदद, ट्रंप प्रशासन ने दिखाया ठेंगा
हूती विद्रोहियों द्वारा हाल ही में यमन के तटीय इलाकों, मारिब और लाल सागर के रणनीतिक मोचा बंदरगाह पर कब्जा करने और सऊदी के दक्षिणी प्रांतों (जाजान, खमीस मुशैत, आभा) पर भारी मिसाइल व ड्रोन हमले करने के बाद रियाद ने वाशिंगटन से सीधे सैन्य हस्तक्षेप की गुहार लगाई थी।
सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान को उम्मीद थी कि अमेरिका हूतियों के खिलाफ बड़े पैमाने पर हवाई और नौसैनिक हमले करके सऊदी सीमा की रक्षा करेगा। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी सरकार ने साफ कर दिया कि अमेरिका इस जंग में सीधे अपनी सेना नहीं उतारेगा। अमेरिकी प्रशासन ने रियाद को दो टूक कह दिया कि उनकी मदद केवल खुफिया जानकारी (Intelligence Sharing) और मिसाइल ट्रैकिंग सहायता तक ही सीमित रहेगी। डोनाल्ड ट्रंप ने खुद इस बात का संकेत दिया कि हूतियों ने उनसे संपर्क कर इस लड़ाई से दूर रहने का आग्रह किया था, और अमेरिका इस दलदल में अपने सैनिकों को नहीं झोंकना चाहता।
मक्का तक पहुंचे ड्रोन, फिर भी तमाशबीन बना रहा 'सुपरपावर'
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब सऊदी अरब अपनी सुरक्षा के सबसे नाजुक दौर से गुजर रहा है। सऊदी अरब ने आरोप लगाया कि हूतियों ने मक्का के प्रतिबंधित हवाई क्षेत्र के पास तक ड्रोन दागे, जिसे उनके एयर डिफेंस ने रास्ते में ही मार गिराया। इसके अलावा हूतियों ने लाल सागर के यानबू स्थित अरामको तेल संयंत्र और सीमावर्ती सैन्य अड्डों पर भी ताबड़तोड़ मिसाइलें दागीं।
सऊदी अरब के लिए यह 'रेड लाइन' थी। लेकिन इतने गंभीर हमलों और तेल सप्लाई बाधित होने के खतरे के बावजूद, अमेरिका द्वारा हूतियों से बैकचैनल वार्ता कर खुद को अलग कर लेना यह साबित करता है कि महाशक्तियों की कूटनीति में कोई स्थायी दोस्त नहीं होता, केवल स्थायी हित होते हैं।
पहले पाकिस्तान ने खींचे हाथ, अब अमेरिका ने भी दिया धोखा
सऊदी अरब के लिए यह दोहरा कूटनीतिक आघात है। अभी कुछ ही दिन पहले सऊदी अरब द्वारा बनाए गए बहुचर्चित 'मक्का डिफेंस पैक्ट' में उसके सहयोगी पाकिस्तान ने हूतियों के खिलाफ सेना भेजने से इनकार करते हुए इस समझौते को 'विशुद्ध रूप से रक्षात्मक' करार देकर पल्ला झाड़ लिया था। पाकिस्तान के इस झटके से सऊदी संभल भी नहीं पाया था कि अब उसके सबसे बड़े हथियार आपूर्तिकर्ता अमेरिका ने भी हूतियों के साथ अलग से 'डील' करके रियाद की पीठ में छुरा घोंप दिया।
विशेषज्ञों का कहना है कि अरबों डॉलर के अमेरिकी पैट्रियट मिसाइल सिस्टम खरीदने के बावजूद सऊदी अरब आज यमन के पहाड़ों से दागे जाने वाले सस्ते ड्रोन्स और बैलिस्टिक मिसाइलों के सामने पूरी तरह असुरक्षित महसूस कर रहा है।
सऊदी के पास अब क्या बचा है विकल्प?
अमेरिका की इस बेरुखी और हूतियों के आक्रामक तेवरों के बीच सऊदी अरब अब एक गंभीर चौराहे पर खड़ा है:
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अकेले दम पर जवाबी हमले: सऊदी वायुसेना ने यमन के ताइज, मारिब और होदेइदा में एफ-15 लड़ाकू विमानों से दर्जनों हवाई हमले किए हैं, लेकिन जमीनी सेना के बिना हूतियों की बढ़त को रोकना असंभव साबित हो रहा है।
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चीन और क्षेत्रीय शक्तियों की ओर रुख: अमेरिका की इस दोगली नीति के बाद सऊदी अरब अपनी सुरक्षा रणनीति में बड़ा फेरबदल करने को मजबूर हो सकता है। चीन की मध्यस्थता में पहले भी ईरान-सऊदी समझौते हुए थे, और अब रियाद बीजिंग के दबाव के जरिए तेहरान से हूतियों पर लगाम कसने की गुहार लगा सकता है।
कुल मिलाकर, अमेरिका और हूतियों के बीच हुए इस अघोषित समझौते ने यह साफ कर दिया है कि वॉशिंगटन के लिए लाल सागर में केवल अपने जहाजों की सुरक्षा मायने रखती है, भले ही इसके बदले में उसका दशकों पुराना दोस्त सऊदी अरब मिसाइलों की बारिश में अकेला क्यों न जलता रहे।