पर्सनल लोन लेते समय ये 7 गलतियां खाली कर देंगी जेब: कम EMI का लालच पड़ेगा भारी
आपातकालीन वित्तीय जरूरत, घर की मरम्मत या शादी-ब्याह के खर्चों के लिए पर्सनल लोन आज सबसे तेज और आसान विकल्प बन चुका है। बैंक और फिनटेक कंपनियां चुटकियों में प्री-अप्रूव्ड लोन के ऑफर देकर ग्राहकों को आकर्षित करती हैं। लेकिन बिना सोचे-समझे लिया गया अनसिक्योर्ड लोन अक्सर कर्ज के ऐसे भंवरजाल में बदल जाता है, जिससे बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। सबसे बड़ा धोखा कम ईएमआई (Equated Monthly Installment) के जाल में होता है। मासिक किस्त भले ही छोटी लगे, लेकिन कर्ज की कुल अवधि खत्म होते-होते जेब से मूलधन से भी कहीं ज्यादा रकम ब्याज के रूप में निकल चुकी होती है।
1. छोटी EMI के चक्कर में लंबा टेन्योर चुनना
अधिकांश उधारकर्ता सिर्फ यह देखते हैं कि हर महीने जेब से कितनी रकम कटेगी। बैंक इसी मानसिकता का फायदा उठाकर 5 से 7 साल का लंबा टेन्योर (अवधि) ऑफर करते हैं।
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गणित समझिए: ₹5 लाख के पर्सनल लोन पर 14% की ब्याज दर से 2 साल के लिए मासिक EMI करीब ₹24,006 बनती है और कुल ब्याज ₹76,144 जाता है।
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वहीं, अगर इसी लोन को 5 साल (60 महीने) के लिए लिया जाए, तो EMI घटकर ₹11,634 रह जाती है, लेकिन कुल ब्याज बढ़कर ₹1,98,048 (लगभग दो लाख रुपये) पहुंच जाता है। यानी सिर्फ EMI छोटी दिखाने के लिए आपने बैंक को ₹1.22 लाख से ज्यादा अतिरिक्त चुका दिए।
2. छिपे हुए शुल्क (Processing Fee व Preclosure Charges) नजरअंदाज करना
पर्सनल लोन में सिर्फ ब्याज दर ही लागत नहीं होती। कई बैंक 1% से 3% तक प्रोसेसिंग फीस काटते हैं, जो सीधे लोन अमाउंट से कटकर मिलती है। इसके अलावा, यदि आपके पास बाद में पैसे आ जाएं और आप लोन समय से पहले बंद करना चाहें, तो बैंक 2% से 5% तक का फोरक्लोजर या प्री-पेमेंट चार्ज वसूलते हैं। लोन एग्रीमेंट साइन करने से पहले इन सभी छिपे हुए शुल्कों की पड़ताल अनिवार्य रूप से करें।
3. फ्लैट रेट बनाम रिड्यूसिंग बैलेंस रेट का अंतर न समझना
कई गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (NBFCs) ग्राहकों को 8% या 9% 'फ्लैट इंटरेस्ट रेट' का लालच देती हैं। फ्लैट रेट में ब्याज की गणना हमेशा शुरुआती मूलधन पर होती है, भले ही आप आधा कर्ज चुका चुके हों। वहीं 'रिड्यूसिंग बैलेंस' में ब्याज केवल बचे हुए मूलधन पर लगता है। फ्लैट रेट का 9% असल में रिड्यूसिंग बैलेंस के 16% से 17% के बराबर बैठता है। हमेशा रिड्यूसिंग बैलेंस रेट पर ही लोन का विकल्प चुनें।
4. जरूरत से ज्यादा रकम का लोन ले लेना
बैंक अक्सर आपकी पात्रता (Eligibility) देखकर ₹5 लाख की जरूरत पर ₹8 लाख का लोन ऑफर कर देते हैं। अतिरिक्त पैसा बैंक खाते में देखकर लोग फिजूलखर्च कर बैठते हैं। यह ध्यान रखें कि पर्सनल लोन एक अनसिक्योर्ड और महंगा कर्ज है। जितनी सख्त जरूरत हो, केवल उतने ही पैसे का लोन लें।
5. एक साथ कई बैंकों में लोन की अर्जी लगाना
लोन अप्रूवल की जल्दबाजी में एक ही समय पर कई बैंकों या ऑनलाइन पोर्टल्स पर आवेदन करना सबसे बड़ी भूल है। हर आवेदन के साथ बैंक आपके क्रेडिट स्कोर की 'हार्ड इन्क्वायरी' (Hard Inquiry) करते हैं। बार-बार हार्ड इन्क्वायरी होने से आपका सिबिल (CIBIL) स्कोर तेजी से नीचे गिरता है और बैंक आपको 'क्रेडिट हंग्री' (कर्ज का भूखा) मानकर आवेदन खारिज कर सकते हैं या ऊंची ब्याज दर थोप सकते हैं।
6. इंश्योरेंस बंडलिंग और गैर-जरूरी ऐड-ऑन स्वीकार करना
अक्सर लोन बांटते समय बैंक कर्मचारी लोन सुरक्षा बीमा (Loan Insurance) या एक्सीडेंटल कवर को अनिवार्य बताकर प्रीमियम की रकम लोन में ही जोड़ देते हैं। आरबीआई (RBI) के नियमों के अनुसार पर्सनल लोन के साथ कोई भी बीमा खरीदना पूरी तरह स्वैच्छिक (Optional) है। यदि आपके पास पहले से पर्याप्त टर्म इंश्योरेंस है, तो ऐसे महंगे बंडल प्रोडक्ट्स को साफ मना कर दें।
7. प्री-पेमेंट और रीपेमेंट की रणनीति तय न करना
लोन लेने से पहले यह योजना बनाना जरूरी है कि यदि कोई बोनस, इंसेंटिव या अतिरिक्त आय मिलती है, तो उसे पार्ट-पेमेंट में इस्तेमाल करेंगे या नहीं। अधिकांश लोग सिर्फ न्यूनतम EMI भरते रहते हैं। हर साल 1-2 अतिरिक्त ईएमआई या मूलधन का 10% चुकाने से लोन की अवधि और ब्याज लागत दोनों आधी हो सकती हैं।