नितेश तिवारी की 'रामायण' की रिलीज से पहले रॉकिंग स्टार यश ने दर्शकों से की भावुक अपील, बोले- छोटी-छोटी कमियां मत ढूंढना

नितेश तिवारी की 'रामायण' की रिलीज से पहले रॉकिंग स्टार यश ने दर्शकों से की भावुक अपील, बोले- छोटी-छोटी कमियां मत ढूंढना

भारतीय सिनेमा के इतिहास के सबसे महत्वाकांक्षी और भव्य सिनेमैटिक प्रोजेक्ट 'रामायण' को लेकर दर्शकों का उत्साह सातवें आसमान पर है। निर्देशक नितेश तिवारी के निर्देशन में बन रही इस महागाथा में भगवान श्रीराम के रूप में रणबीर कपूर, माता सीता के किरदार में साई पल्लवी और लंकापति रावण की सशक्त भूमिका में कन्नड़ सुपरस्टार रॉकिंग स्टार यश नजर आने वाले हैं। इस बहुप्रतीक्षित फिल्म के रिलीज होने से पहले यश ने फिल्म समीक्षकों, सोशल मीडिया विश्लेषकों और आम सिनेप्रेमियों से एक बेहद भावुक और विचारणीय अपील की है। यश ने साफ तौर पर कहा है कि दर्शक सिनेमाघरों में जाते वक्त केवल तकनीकी बाल की खाल निकालने या छोटी-छोटी कमियां ढूंढने का नजरिया न रखें, बल्कि इस महान गाथा को पर्दे पर जीवंत करने के पीछे के सच्चे समर्पण, भारतीय संस्कृति के मान और विशाल विजन को महसूस करें। उनका यह बयान सामने आते ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से लेकर फिल्म इंडस्ट्री के गलियारों तक तेजी से वायरल हो रहा है और इस पर एक गंभीर विमर्श शुरू हो चुका है। यश ने इस बात पर जोर दिया कि रामायण सिर्फ एक साधारण कमर्शियल फिल्म नहीं है, बल्कि यह करोड़ों लोगों की आस्था, हमारे सांस्कृतिक मूल्यों और भारतीय सनातन परंपरा का अमर आधार है। जब इतने विशाल कैनवास पर कोई निर्देशक या निर्माता काम करता है, तो उनका प्राथमिक उद्देश्य हमारी सांस्कृतिक विरासत को पूरे गौरव के साथ विश्व पटल पर प्रस्तुत करना होता है। ऐसे में अगर दर्शक थिएटर में घुसते ही सिर्फ इस ताक में रहेंगे कि कहां कौन सा विजुअल इफेक्ट थोड़ा अलग दिख गया या संवाद में कहां चूक हो गई, तो वे उस रूहानी अनुभव और महाकाव्य की मूल आत्मा से पूरी तरह वंचित रह जाएंगे। यश का मानना है कि आलोचकों को निष्पक्ष समीक्षा जरूर करनी चाहिए, लेकिन सिनेमा के इस विराट प्रयास को सिर्फ नकारात्मक सूक्ष्मदर्शी से देखना सही नहीं है।

करोड़ों का बजट और हॉलीवुड स्तर के वीएफएक्स, भारतीय सिनेमा को विश्व मंच पर ले जाने की ऐतिहासिक कोशिश

'रामायण' सिर्फ भारत तक सीमित रहने वाला सिनेमा नहीं है, बल्कि इसे वैश्विक स्तर पर हॉलीवुड की सबसे बड़ी फैंटेसी फ्रेंचाइजीज जैसे 'द लॉर्ड ऑफ द रिंग्स' या 'अवतार' की तर्ज पर दुनिया भर के स्क्रीन्स पर रिलीज करने की रणनीति बनाई गई है। यश खुद इस फिल्म के सह-निर्माता के रूप में जुड़े हैं और उन्होंने ऑस्कर विजेता वीएफएक्स स्टूडियो डीएनईजी (DNEG) के साथ मिलकर इस प्रोजेक्ट को तकनीकी रूप से अद्वितीय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। यश ने अपने बयान में इस विशाल तकनीकी तैयारी का जिक्र करते हुए कहा कि हमारी पूरी टीम ने दिन-रात एक करके यह सुनिश्चित किया है कि भारतीय पौराणिक इतिहास को दुनिया के सबसे आधुनिक विजुअल स्टैंडर्ड्स के साथ पेश किया जाए। यश ने कहा कि जब देश की कोई फिल्म वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाने के लिए इतनी बड़ी पूंजी और जोखिम उठाती है, तो घरेलू दर्शकों का सकारात्मक समर्थन उस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी रीढ़ बन जाता है। भारत के बाहर जब कोई विदेशी फिल्म बड़े स्तर पर रिलीज होती है, तो वहां के लोग और मीडिया अपनी इंडस्ट्री के प्रयासों पर गर्व करते हैं। ठीक उसी तरह भारत में भी हमें अपनी पौराणिक धरोहर पर गर्व महसूस करते हुए इस सिनेमाई साहसिक कदम को प्रोत्साहित करना चाहिए। यदि हम अपनी ही कलाकृतियों में केवल त्रुटियां तलाशने का ट्रेंड बना लेंगे, तो भविष्य में कोई भी फिल्मकार हमारे वेदों, उपनिषदों और महाकाव्यों पर इतना विशाल जोखिम लेने की हिम्मत कभी नहीं जुटा पाएगा।

सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग कल्चर और प्री-जजमेंट पर यश का करारा प्रहार, दर्शकों को दिया अहम संदेश

आज के डिजिटल दौर में किसी भी पौराणिक या ऐतिहासिक फिल्म का टीजर या ट्रेलर आते ही सोशल मीडिया पर मीम्स, ट्रोलिंग और पूर्व-धारणाओं की बाढ़ आ जाती है। पिछली कुछ फिल्मों के कटु अनुभवों को ध्यान में रखते हुए यश ने इस बात को बड़ी बेबाकी से रखा कि लोगों को सिनेमाघर में कदम रखने से पहले ही अपनी राय बना लेने की आदत छोड़नी चाहिए। उन्होंने कहा कि स्मार्टफोन की स्क्रीन पर दस सेकंड की क्लिप देखकर या किसी फ्रेम को जूम करके सोशल मीडिया पर ट्रोल करना बहुत आसान काम है, लेकिन उस एक फ्रेम को तैयार करने के लिए सैकड़ों कलाकारों और तकनीशियनों ने महीनों तक पसीना बहाया होता है। यश ने दर्शकों से आग्रह किया कि वे बिना किसी पूर्वाग्रह के सिनेमाघर जाएं और खुद को पूरी तरह से उस प्राचीन आर्यावर्त के युग में खो जाने दें। उन्होंने कहा कि सिनेमा एक अनुभव है, कोई गणित का इम्तिहान नहीं जहां आप लाल पेन लेकर गलतियां काटने बैठें। जब आप भगवान राम के त्याग, मर्यादा और रावण के अहंकार के इस शाश्वत संघर्ष को बड़े पर्दे पर देखेंगे, तो आपकी आंखें उस भावनात्मक प्रवाह को महसूस करेंगी। यश का यह बयान सीधे तौर पर उन सोशल मीडिया क्रिएटर्स और यूट्यूब समीक्षकों को आईना दिखाता है जो व्यूज और क्लिक्स के चक्कर में नकारात्मक नैरेटिव खड़ा करने की होड़ में लगे रहते हैं।

रणबीर कपूर, साई पल्लवी और यश का अद्भुत संगम, भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े कास्टिंग कूप की कहानी

फिल्म 'रामायण' की सबसे बड़ी ताकत इसकी ड्रीम स्टार कास्ट है, जिसने पूरे भारत के सिनेमा प्रेमियों को एकजुट कर दिया है। बॉलीवुड के सबसे प्रतिभावान अभिनेताओं में गिने जाने वाले रणबीर कपूर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के शांत, गंभीर और तेजस्वी स्वरूप को साकार कर रहे हैं, जिसके लिए उन्होंने वर्षों तक शारीरिक बदलाव, गहन अध्ययन और जीवनशैली में सख्त अनुशासन का पालन किया है। वहीं दक्षिण भारतीय सिनेमा की सादगी और प्रतिभा की प्रतीक साई पल्लवी माता सीता के दिव्य और करुणामयी चरित्र को जीवंत कर रही हैं। स्वयं यश ने लंकाधिपति रावण के उस जटिल, विद्वान, महापराक्रमी और अहंकारी चरित्र को पर्दे पर उतारने के लिए अपनी पूरी ऊर्जा झोंक दी है। यश ने सह-कलाकारों के समर्पण की प्रशंसा करते हुए कहा कि सेट पर मौजूद हर एक अभिनेता ने इस प्रोजेक्ट को महज एक नौकरी या अभिनय की भूमिका नहीं माना, बल्कि इसे एक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक साधना के रूप में जिया है। उन्होंने बताया कि किस तरह रणबीर कपूर ने घंटों तक तीरंदाजी, संस्कृत के श्लोकों के शुद्ध उच्चारण और सात्विक भाव-भंगिमाओं का अभ्यास किया है। जब इतने शीर्ष कलाकार अपने स्टारडम को पीछे छोड़कर हमारी साझी संस्कृति के सबसे पवित्र प्रतीकों को साकार करने के लिए एक साथ आते हैं, तो वह दृश्य अपने आप में भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम युग की शुरुआत का संकेत देता है।

बॉक्स ऑफिस और संस्कृति का संतुलन, 'रामायण' से देश और दुनिया भर के सिनेप्रेमियों को बंधी उम्मीदें

भारतीय बॉक्स ऑफिस पर पिछले कुछ वर्षों में पौराणिक और ऐतिहासिक विषयों को लेकर दर्शकों की संवेदनशीलता बेहद बढ़ चुकी है। ऐसे संवेदनशील दौर में 'रामायण' का निर्माण करना और उसे वैश्विक दर्शकों के सामने पेश करना एक बहुत बड़ी चुनौती रही है। निर्देशक नितेश तिवारी, जो 'दंगल' जैसी भावनात्मक और सटीक कहानियों के लिए जाने जाते हैं, उन्होंने इस बात का विशेष ध्यान रखा है कि मूल वाल्मीकि रामायण और गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस के मूल संदेश और मर्यादाओं से कोई छेड़छाड़ न हो। यश की इस पुरजोर अपील ने फिल्म के प्रति एक सकारात्मक और परिपक्व माहौल बनाने की मजबूत नींव रख दी है। फिल्म उद्योग के विशेषज्ञों का भी मानना है कि जब किसी फिल्म के साथ करोड़ों लोगों की धार्मिक भावनाएं जुड़ी हों, तो रचनाकारों का ईमानदार प्रयास ही सबसे बड़ा प्रमाण होता है। यश का यह स्पष्ट और परिपक्व आह्वान न केवल दर्शकों को एक सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ सिनेमाघरों तक खींचने में मदद करेगा, बल्कि यह भारतीय सिनेमा के वैश्विक विस्तार को भी एक नई दिशा प्रदान करेगा। अब पूरी दुनिया की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जब यह महाकाव्य बड़े पर्दे पर अवतरित होगा, तो यह भारतीय संस्कृति और सिनेमा के इतिहास में सफलता का कौन सा नया अध्याय लिखेगा।