'वो बस ड्राइवर का बेटा है, उसे किसी की खैरात नहीं मिली!' जब यश के स्टारडम पर उठे सवाल तो मां पुष्पा ने दिया आलोचकों को मुंहतोड़ जवाब
भारतीय सिनेमा के आधुनिक इतिहास में 'रॉकिंग स्टार' यश का उदय किसी जादुई परीकथा से कम नहीं है। 'KGF Chapter 1', 'KGF Chapter 2' और 'टॉक्सिक' जैसी अखिल भारतीय (पैन-इंडिया) फिल्मों के जरिए बॉक्स ऑफिस पर हजारों करोड़ का कारोबार करने वाले यश आज उस मुकाम पर हैं जहां हर बड़ा निर्माता और निर्देशक उनके साथ काम करने के लिए कतार में खड़ा रहता है। हालांकि, फिल्मी दुनिया में जब कोई बाहरी व्यक्ति बिना किसी गॉडफादर या फिल्मी घराने के शीर्ष पर पहुंचता है, तो अक्सर उद्योग के कुछ खेमों और आलोचकों द्वारा उसकी सफलता को 'तुक्का' या 'क्षणिक शोहरत' बताकर कम आंकने की कोशिश की जाती है। जब कुछ आलोचकों और इंडस्ट्री के संकीर्ण विचारकों ने यश के स्टारडम, उनकी बैकग्राउंड और उनकी भारी लोकप्रियता पर सवाल उठाने की जुर्रत की, तो अभिनेता की मां पुष्पा ने आगे आकर उन सभी को ऐसा करारा और दिल दहला देने वाला जवाब दिया जिसने पूरी इंडस्ट्री को खामोश कर दिया।
एक इंटरव्यू और सार्वजनिक बातचीत के दौरान यश की मां पुष्पा ने बेहद स्वाभिमान और गर्व से भरी आवाज में कहा, "जो लोग आज मेरे बेटे की शोहरत, उसके ठाठ-बाट और उसके स्टारडम पर उंगलियां उठा रहे हैं, वे शायद यह भूल जाते हैं कि वह किसी सुपरस्टार या बड़े खानदान का वारिस नहीं है। वह एक साधारण सरकारी बस ड्राइवर का बेटा है। उसने आज जो कुछ भी कमाया है, अपनी दिन-रात की मेहनत, खून-पसीने और अपनी अटूट जिद्द से कमाया है। उसे यह मुकाम किसी की खैरात या विरासत में नहीं मिला है।" मां का यह बेबाक बयान सोशल मीडिया पर आते ही जंगल की आग की तरह फैल गया और करोड़ों फैंस के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा जरिया बन गया।
जेब में महज ₹300 और आंखों में समंदर जैसे सपने: बेंगलुरु की सड़कों पर संघर्ष
यश (मूल नाम नवीन कुमार गौड़ा) का जन्म कर्नाटक के हासन जिले के एक बेहद सीधे-सादे और मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। उनके पिता अरुण कुमार गौड़ा कर्नाटक राज्य सड़क परिवहन निगम (KSRTC/BMTC) में एक साधारण बस ड्राइवर के रूप में नौकरी करते थे, जबकि मां पुष्पा एक गृहणी थीं। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी सीमित थी कि महीने के अंत में घर का खर्च चलाना भी एक बड़ी चुनौती होता था। ऐसे माहौल में जब स्कूल के दिनों में यश ने अपने माता-पिता से कहा कि वे पढ़ाई छोड़कर सिनेमा में हीरो बनना चाहते हैं, तो माता-पिता सन्न रह गए। उन्हें लगा कि यह उम्र का कोई भटकाव है और उन्होंने यश को कड़ी चेतावनी दी कि अगर वह घर से गया, तो उसके लिए दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे।
लेकिन 16 साल के उस नौजवान की रगों में सिनेमा का ऐसा जुनून सवार था कि वह माता-पिता की नाराजगी के बावजूद घर से भागकर सपनों के शहर बेंगलुरु पहुंच गया। उस वक्त यश की जेब में महज ₹300 थे। बेंगलुरु के मैजेस्टिक बस स्टैंड पर उतरते ही उन्हें अहसास हुआ कि बाहर की दुनिया कितनी बेरहम और अजनबी है। उस वक्त उन्हें यह भी नहीं पता था कि रात को सिर कहां छिपाना है। पहले कुछ दिनों तक यश ने रेलवे स्टेशनों, बस स्टॉप के बेंचों और सड़क किनारे सोकर रातें काटीं। वे खाने के एक वक्त के भोजन के लिए भी घंटों तक तरसते रहे, लेकिन उन्होंने कभी हार मानकर वापस गांव लौटने का विचार अपने मन में नहीं आने दिया।
बैकग्राउंड आर्टिस्ट और थिएटर के बैकस्टेज से शुरू हुआ सफर
बेंगलुरु में टिके रहने के लिए यश ने सबसे पहले प्रसिद्ध नाटककार बी.वी. कारंत के थिएटर ग्रुप 'बेनाका' में काम करना शुरू किया। वहां उन्हें मंच पर अभिनय करने का मौका नहीं मिला, बल्कि वे बैकस्टेज वर्कर के रूप में काम करते थे। उनका काम मंच पर झाड़ू लगाना, चाय-पानी की व्यवस्था करना, लाइटें संभालना और अभिनेताओं के कॉस्ट्यूम सहेजना था। इसके बदले में उन्हें दिन के 50 रुपये और रात का खाना मिल जाया करता था। यश ने उस तंगहाली को भी एक विश्वविद्यालय माना जहां वे पर्दे के पीछे खड़े होकर दिग्गज कलाकारों के हाव-भाव और संवाद अदायगी को बारीकी से सीखते रहे।
थिएटर में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने के बाद उन्हें छोटे पर्दे पर काम करने का मौका मिला। उन्होंने 'नंदा गोकुला' और 'प्रीति इल्लादा मेले' जैसे लोकप्रिय कन्नड़ टीवी धारावाहिकों में छोटे-मोटे किरदार निभाए। टीवी सीरियल्स के सेट पर वे 18-18 घंटे लगातार काम करते थे ताकि अपनी पहचान बना सकें। यहीं उनकी मुलाकात अभिनेत्री राधिका पंडित से हुई, जो बाद में उनकी जीवनसंगिनी बनीं। साल 2008 में फिल्म 'मोगिना मनसु' में उन्हें एक सहायक अभिनेता का रोल मिला, जिसके लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला। इसके बाद यश ने एक के बाद एक कई सुपरहिट कन्नड़ फिल्में—जैसे 'गुगली', 'मिस्टर एंड मिसेज रामाचारी' और 'किरातका'—देकर खुद को सैंडलवुड का नंबर-1 स्टार बना लिया।
जब स्टार बनने के बाद भी पिता ने नहीं छोड़ी बस ड्राइवर की नौकरी
यश और उनके परिवार की सबसे बड़ी ताकत उनकी सादगी और अपनी जड़ों से जुड़ाव रही है। जब यश कन्नड़ सिनेमा के सबसे बड़े सुपरस्टार बन चुके थे और एक-एक फिल्म के करोड़ों रुपये ले रहे थे, तब भी उनके पिता अरुण कुमार गौड़ा ने बीएमटीसी बस चलाने की अपनी सरकारी नौकरी नहीं छोड़ी थी। कई बार जब बस में सफर करने वाले यात्रियों को पता चलता था कि उन्हें अपनी मंजिल तक पहुंचाने वाला ड्राइवर असल में राज्य के सबसे बड़े हीरो यश का सगा पिता है, तो वे हैरान रह जाते थे।
जब मीडिया ने एक बार यश से इस बारे में पूछा था, तो उन्होंने गर्व से कहा था, "मेरे पिता का मानना है कि जिस नौकरी ने उनके बच्चों का पेट पाला और उन्हें इस लायक बनाया, उस काम को केवल बेटे के स्टार बन जाने से छोड़ देना गलत होगा। मेरे पिता की यही ईमानदारी और सादगी मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी प्रेरणा है।" यश की मां ने भी हमेशा यह सुनिश्चित किया कि शोहरत और चकाचौंध के बीच उनका बेटा अपने शुरुआती दिनों के संघर्ष और संस्कारों को कभी न भूले।
नेपोटिज्म के तिलिस्म को तोड़ा: कन्नड़ सिनेमा को दिलाया वैश्विक मुकाम
भारतीय सिनेमा में जहां दशकों से वंशवाद और फिल्मी परिवारों के दबदबे की चर्चा होती रही है, वहां यश ने बिना किसी पारिवारिक पृष्ठभूमि के पूरे देश के सिनेमाई नक्शे को बदलकर रख दिया। 2018 में जब 'KGF: Chapter 1' आई, तो उसने दक्षिण और उत्तर भारत के बीच की दीवारों को हमेशा के लिए गिरा दिया। 'रॉकी भाई' के रूप में यश का एटीट्यूड, दाढ़ी, बाल और संवाद अदायगी पूरे देश के युवाओं का स्टाइल स्टेटमेंट बन गई।
इसके बाद 2022 में आई 'KGF: Chapter 2' ने दुनिया भर के बॉक्स ऑफिस पर ₹1250 करोड़ से अधिक का ऐतिहासिक कलेक्शन करके यह साबित कर दिया कि एक बस ड्राइवर का बेटा अगर ठान ले, तो वह पूरे विश्व में भारतीय सिनेमा का परचम लहरा सकता है। कन्नड़ सिनेमा, जिसे पहले केवल एक सीमित क्षेत्रीय उद्योग माना जाता था, आज यश के कंधों पर सवार होकर हॉलीवुड और बॉलीवुड की बड़ी फिल्मों को कड़ी टक्कर दे रहा है।
यश की मां पुष्पा का वह तीखा और भावुक बयान आज उन तमाम आलोचकों के मुंह पर एक करारा तमाचा है जो किसी की प्रतिभा को उसकी पृष्ठभूमि से तौलने की भूल करते हैं। यश की यह यात्रा इस बात का जीता-जागता सबूत है कि मुकद्दर किसी खानदान या सरनेम का मोहताज नहीं होता। जब इरादों में फौलाद जैसा दम हो और सीने में सपनों की आग जल रही हो, तो एक बस ड्राइवर का बेटा भी पूरी दुनिया के दिलों पर राज करने वाला 'रॉकिंग स्टार' बन सकता है।