अपनी ही बायोपिक से निराश हैं मैरी कॉम, प्रियंका चोपड़ा की फिल्म पर छलका दर्द; बोलीं- 'कहानी के कुछ हिस्से...'
भारतीय खेल इतिहास की सबसे महान महिला मुक्केबाज, ओलंपिक पदक विजेता और छह बार की विश्व चैंपियन एम. सी. मैरी कॉम ने अपनी बायोपिक फिल्म को लेकर एक बड़ा और चौंकाने वाला बयान दिया है। साल 2014 में रिलीज हुई और राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुकी फिल्म 'मैरी कॉम', जिसमें ग्लोबल स्टार प्रियंका चोपड़ा ने उनका किरदार निभाया था, बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट साबित हुई थी। हालांकि, इतने वर्षों बाद खुद मैरी कॉम ने इस बात को स्वीकार किया है कि वे अपनी ही इस बायोपिक के कुछ हिस्सों से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं और उन्हें इस बात की गहरी निराशा है कि उनके वास्तविक जीवन के कई बेहद अहम और दर्दनाक संघर्षों को पर्दे पर सही ढंग से जगह नहीं मिल सकी। मैरी कॉम के इस बेबाक बयान ने एक बार फिर बॉलीवुड में स्पोर्ट्स बायोपिक्स के कमर्शियल तड़के और वास्तविक सच्चाई के बीच के अंतर पर नई बहस छेड़ दी है।
'कहानी के कुछ हिस्से पूरी तरह छूट गए, पर्दे पर नहीं दिखा मेरा असली संघर्ष'
मैरी कॉम ने हालिया बातचीत के दौरान खुलकर अपनी बात रखते हुए कहा कि सिनेमा की अपनी सीमाएं होती हैं, लेकिन जब किसी जीवित लीजेंड की कहानी कही जा रही हो, तो उसकी असलियत से समझौता नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा—"प्रियंका चोपड़ा ने बहुत मेहनत की थी और उनका अभिनय बेहतरीन था, लेकिन कहानी के कई ऐसे हिस्से थे जिन्हें या तो पूरी तरह छोड़ दिया गया या फिर बहुत सतही तौर पर दिखाया गया। पर्दे पर जो दिखा, वह मेरे वास्तविक जीवन का सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा था।"
मैरी कॉम ने विस्तार से बताते हुए कहा कि मणिपुर के एक बेहद गरीब और पिछड़े इलाके से निकलकर बिना जूतों, फटे ग्लव्स और भूखे पेट बॉक्सिंग रिंग तक पहुंचने की जो तपस्या थी, फिल्म में उसे बहुत जल्दी और ड्रामैटिक अंदाज में समेट दिया गया। रिंग के बाहर भारतीय खेल प्रशासन की बेरुखी, जातिगत व क्षेत्रीय पूर्वाग्रह और आर्थिक तंगहाली से लड़ते हुए बच्चों को पालने का जो रोजमर्रा का मानसिक तनाव था, वह फिल्म में पूरी सच्चाई के साथ उभरकर नहीं आ पाया।
कमर्शियल एंगल और बॉलीवुड ड्रामा पर उठाए सवाल
मैरी कॉम का मानना है कि बॉलीवुड फिल्मों में वास्तविक संघर्ष को दिखाने के बजाय कहानी को जबरन मेलोड्रामा और बनावटी सस्पेंस से भरने की कोशिश की जाती है। फिल्म के उस बहुचर्चित क्लाइमेक्स सीन का उदाहरण देते हुए, जहां एक तरफ उनके बच्चे का दिल का ऑपरेशन हो रहा होता है और दूसरी तरफ वे विश्व चैंपियनशिप का फाइनल मुकाबला लड़ रही होती हैं, यह शुद्ध रूप से सिनेमाई लिबर्टी थी। वास्तविक जीवन में परिस्थितियां उतनी ड्रामैटिक भले न रही हों, लेकिन खेल और परिवार के बीच उनका रोज का संघर्ष पर्दे पर दिखाए गए दृश्य से कहीं अधिक जटिल और थका देने वाला था। बायोपिक में कई ऐसे लोगों के योगदान को भी नजरअंदाज कर दिया गया जिन्होंने शुरुआती दिनों में उनकी झोली में पैसे डालकर उन्हें रिंग तक पहुंचाया था।
कास्टिंग को लेकर पुराने विवादों की फिर से ताजा हुईं यादें
फिल्म की रिलीज के वक्त भी पूर्वोत्तर (नॉर्थ-ईस्ट) के कई एक्टिविस्ट्स और सिनेप्रेमियों ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई थी कि मैरी कॉम के किरदार के लिए किसी नॉर्थ-ईस्ट की अभिनेत्री को चुनने के बजाय एक मुख्यधारा की बॉलीवुड अभिनेत्री को क्यों लिया गया। उस समय निर्माताओं ने प्रियंका चोपड़ा के स्टारडम और फिल्म के बजट की भरपाई का तर्क दिया था। मैरी कॉम ने हमेशा प्रियंका के समर्पण की तारीफ की है, लेकिन उन्होंने भी यह माना कि यदि कहानी के लेखन और पटकथा में थोड़ी और ईमानदारी बरती जाती, तो यह फिल्म केवल एक दो घंटे का बॉलीवुड ड्रामा बनकर रहने के बजाय देश के हर कोने में संघर्ष कर रहे एथलीट्स के लिए एक ऐतिहासिक और प्रामाणिक दस्तावेज बन सकती थी।
असली मैरी कॉम का जीवन किसी भी फिल्मी स्क्रिप्ट से कहीं ज्यादा बड़ा
मैरी कॉम की यह निराशा इस बात का आईना है कि असल जिंदगी की लड़ाइयां 70 एमएम के पर्दे पर दिखाए जाने वाले ढाई घंटे के गानों और बैकग्राउंड स्कोर से कहीं ज्यादा कठिन होती हैं। तीन बच्चों की मां बनने के बाद भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर तिरंगा लहराना और 40 की उम्र तक रिंग में खुद से आधी उम्र की मुक्केबाजों को धूल चटाना केवल कुछ मोंटाज सीन्स की बदौलत संभव नहीं होता। इसके पीछे दशकों का खून, पसीना और अनकहे आंसू होते हैं। मैरी कॉम के इस बयान ने यह साबित कर दिया है कि भले ही फिल्म ने करोड़ों कमाए और अवॉर्ड्स जीते हों, लेकिन रिंग की असली 'सुपरमॉम' की नजरों में उनकी सच्ची दास्तान का सबसे बड़ा हिस्सा आज भी अनकहा ही रह गया है।