Nobody OTT Release: 17 करोड़ की बैंक लूट, मीडिया ट्रायल और कातिलाना सस्पेंस; जियो हॉटस्टार की थ्रिलर फिल्म 'आई नोबडी' का क्लाइमेक्स उड़ा देगा आपके होश
दक्षिण भारतीय सिनेमा, विशेष रूप से मलयालम फिल्म इंडस्ट्री (Mollywood), अपने यथार्थवादी कथानक, अप्रत्याशित सस्पेंस और इंसानी मनोविज्ञान की गहरी परतों को छूने वाली कहानियों के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है। थिएटर्स में सफलता का परचम लहराने के बाद अब डिजिटल स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म 'जियोहॉटस्टार' (JioHotstar) पर रिलीज हुई सुपरस्टार पृथ्वीराज सुकुमारन की क्राइम-थ्रिलर फिल्म 'आई नोबडी' (I, Nobody) दर्शकों के दिमाग की नसें हिला रही है। निर्देशक निसम बशीर के निर्देशन में बनी यह 2 घंटे 46 मिनट की फिल्म दर्शकों को एक ऐसे पेचीदा और डार्क चक्रव्यूह में ले जाती है, जहां हर बीतते दृश्य के साथ सच और झूठ के मायने बदलने लगते हैं। फिल्म की कहानी एक साधारण सरकारी कर्मचारी, 17 करोड़ रुपये की भीषण बैंक डकैती, मीडिया के निर्मम ट्रायल और एक पति के व्यक्तिगत बदले के इर्द-गिर्द घूमती है। यदि आप भी रोंगटे खड़े कर देने वाले सस्पेंस और 'मनी हाइस्ट' जैसी दिमागी चालों के शौकीन हैं, तो 'आई नोबडी' का हर एक मोड़ आपको अपनी सीट से बांधे रखने के लिए काफी है।
राजीवन और बैंक लूट का अजीबोगरीब कनेक्शन: बदले की आग में कैसे फंसा आम आदमी?
फिल्म की शुरुआत राजीवन (पृथ्वीराज सुकुमारन) नाम के एक सीधे-साधे और शांत सरकारी कर्मचारी के जीवन से होती है। राजीवन अपनी पत्नी मीरा (पार्वती थिरुवोथु) और अपनी दो मासूम बेटियों—जिया और अमला के साथ एक सामान्य मध्यमवर्गीय जीवन बिता रहा होता है। किंतु घर के बंद दरवाजों के पीछे राजीवन और उसकी पत्नी के बीच का वैवाहिक रिश्ता बेहद तनावपूर्ण और कड़वाहट से भरा होता है। राजीवन को यह सनसनीखेज सच पता चलता है कि उसकी पत्नी मीरा का संबंध एक स्थानीय बैंक के मैनेजर के साथ चल रहा है।
अपमान और प्रतिशोध की आग में जलता हुआ राजीवन अपनी जेब में एक लोडेड पिस्टल छिपाकर उसी बैंक में पहुंचता है ताकि वह उस बैंक मैनेजर को गोली मारकर अपने अपमान का बदला ले सके। इस बैंक में राजीवन का कोई खाता तक नहीं होता। किंतु नियति का खेल ऐसा होता है कि जिस क्षण राजीवन अपनी पिस्टल निकालने वाला होता है, ठीक उसी पल तीन हथियारबंद नकाबपोश लुटेरे बैंक में धावा बोल देते हैं। यह लुटेरे बैंक से 17 करोड़ रुपये की भारी-भरकम नकदी लूटते हैं। भागते समय वे पुलिस की गोलीबारी से बचने के लिए वहां खड़े राजीवन को बंधक बना लेते हैं, उसका चेहरा काले कपड़े से ढक देते हैं और अपने साथ ले जाते हैं।
17 करोड़ की डकैती और तीनों लुटेरों की मौत: राजीवन बना इकलौता संदिग्ध
बैंक की सुरक्षा में तैनात एक भ्रष्ट पुलिसकर्मी भी लुटेरों के साथ मिला होता है, जो उन्हें पिछले दरवाजे से सुरक्षित निकालने में मदद करता है। लुटेरे राजीवन को एक सुनसान सड़क पर धक्का देकर अपनी गाड़ी बदलते हैं और तेजी से भागने की कोशिश करते हैं। किंतु कुछ ही दूरी पर लुटेरों की कार का भीषण एक्सीडेंट हो जाता है, जिसमें तीनों मुख्य लुटेरे मौके पर ही मारे जाते हैं। राजीवन को भी हल्की चोटें आती हैं, लेकिन वह जिंदा बच जाता है।
इसके बाद कहानी में सबसे बड़ा भूचाल आता है। पुलिस की प्राथमिक जांच में जब यह सामने आता है कि बैंक में मौजूद लुटेरों की गाड़ी के पास राजीवन मौजूद था, उसकी जेब से पिस्टल बरामद हुई है और उस बैंक में उसका कोई खाता भी नहीं था, तो जांच की पूरी सुई राजीवन की तरफ घूम जाती है। पुलिस और प्रशासन यह मान बैठते हैं कि राजीवन कोई आम इंसान नहीं बल्कि इस 17 करोड़ रुपये की महा-डकैती का मास्टरमाइंड है, जिसने अपने साथियों को मरवाकर सारा पैसा अकेले ही कहीं छुपा दिया है।
मीडिया ट्रायल, सोशल मीडिया का आतंक और परिवार का उजड़ना
इसके बाद फिल्म एक बेहद तीखा और सामयिक सामाजिक संदेश देती है कि कैसे आधुनिक मीडिया और सोशल मीडिया बिना किसी अदालती फैसले के एक आम इंसान की जिंदगी को नर्क बना देते हैं। राजीवन को रोज थाने बुलाया जाता है, पुलिसिया प्रताड़ना का शिकार बनाया जाता है और पूरे देश के सामने उसे '17 करोड़ का मास्टरमाइंड चोर' घोषित कर दिया जाता है।
न्यूज चैनल्स पर सनसनीखेज हेडलाइंस चलने लगती हैं और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स व यूट्यूबर्स व्यूज के लालच में राजीवन के घर का घेराव कर लेते हैं। उसकी छोटी बेटियों को स्कूल में तानों और अपमान का सामना करना पड़ता है। समाज का यह दबाव उस समय एक भयानक त्रासदी में बदल जाता है जब कुछ अज्ञात अपराधी 17 करोड़ रुपये की वसूली के लालच में राजीवन की बेटी अमला का अपहरण कर लेते हैं। राजीवन का हंसता-खेलता परिवार एक पल में पूरी तरह बिखर जाता है।
पुलिस अफसर अनास का दोहरा खेल और 17 करोड़ की अंधी भूख
इस संकट की घड़ी में अनास रहमान (हक्किम शाहजहां) नाम का एक पुलिस अधिकारी राजीवन की मदद के लिए मसीहा बनकर सामने आता है। अनास राजीवन को भरोसा दिलाता है कि वह उसे इस दलदल से बाहर निकालेगा और उसकी बेटी को सुरक्षित बचाएगा। मानसिक रूप से टूट चुका राजीवन उस पर विश्वास करने लगता है।
किंतु कहानी में रोंगटे खड़े कर देने वाला ट्विस्ट तब आता है जब अनास का असली चेहरा सामने आता है। अनास कोई ईमानदार पुलिसकर्मी नहीं, बल्कि अंदर से बेहद लालची और भ्रष्ट अधिकारी होता है, जिसे पूरा पक्का यकीन होता है कि 17 करोड़ रुपये की नकदी राजीवन के पास ही छिपी है। वह राजीवन की मजबूरी का फायदा उठाकर उस पैसे को खुद हड़पना चाहता है। जब राजीवन को इस धोखे का अहसास होता है, तो वह सिस्टम के खिलाफ अपनी खुद की एक खतरनाक और गुप्त चाल चलने का फैसला करता है।
दिमाग हिला देने वाला क्लाइमेक्स: क्या था राजीवन का असली और सीक्रेट मास्टरप्लान?
फिल्म का अंतिम 30 मिनट का हिस्सा ऐसा है जो दर्शकों को दांतों तले उंगलियां दबाने पर मजबूर कर देता है। राजीवन लोगों का ध्यान अपने ऊपर से हटाने और अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को वापस पाने के लिए अपनी दूसरी बेटी जिया के एक फर्जी अपहरण का नाटक रचता है। किंतु चीजें तब नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं जब जिया का सचमुच में अपहरण हो जाता है और वह पैसा भी गायब हो जाता है।
राजीवन की मदद कर रहा पूर्व अधिकारी जैकब जब सुरागों की कड़ियां जोड़ता है, तो वे अनास के साले के गुप्त ठिकाने तक पहुंचते हैं, जहां जिया को बंधक बनाकर रखा गया था और सारा लूटा हुआ धन छुपाया गया था। इसके बाद कहानी जब फ्लैशबैक में जाती है, तो दर्शकों के होश उड़ जाते हैं।
फ्लैशबैक में खुलासा होता है कि राजीवन केवल एक असहाय पीड़ित नहीं था; वह पहले दिन से ही हर एक घटनाक्रम, लुटेरों के नेटवर्क, पुलिस की गतिविधियों और अनास के लालच को भांप चुका था। उसने अपनी मासूमियत और आम आदमी होने की छवि (Nobody) को एक ऐसा अचूक ढाल बनाया था, जिसने भ्रष्ट पुलिसवालों और अपराधियों को आपस में ही लड़वाकर खत्म कर दिया। अंत में राजीवन न केवल अपनी बेटियों को सुरक्षित बचाता है, बल्कि अपनी बेगुनाही साबित करके अपने परिवार और पत्नी मीरा के साथ रिश्ते को एक नए सम्मानजनक धरातल पर पुनर्स्थापित करता है।
पृथ्वीराज सुकुमारन की जादुई अदाकारी और निसम बशीर का धारदार निर्देशन
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत सुपरस्टार पृथ्वीराज सुकुमारन का अद्वितीय अभिनय है। उन्होंने एक लाचार, डरे हुए और परिस्थितियों के मारे सरकारी कर्मचारी से लेकर एक बेहद चतुर और शांत मास्टरमाइंड के भावों को जिस सहजता से अपने चेहरे पर उतारा है, वह उनके करियर के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शनों में से एक है। पार्वती थिरुवोथु ने एक गिल्ट और उलझनों में फंसी पत्नी के रूप में बेहतरीन अभिनय किया है, जबकि हक्किम शाहजहां का विलेन अवतार दर्शकों के मन में नफरत पैदा करने में पूरी तरह सफल रहता है।
निर्देशक निसम बशीर (जिन्होंने इससे पहले 'रॉर्शैक' जैसी मनोवैज्ञानिक थ्रिलर बनाई थी) ने इस फिल्म के स्क्रीनप्ले को इतनी कसावट के साथ लिखा है कि एक पल के लिए भी दर्शकों का ध्यान स्क्रीन से नहीं भटकता। फिल्म की डार्क सिनेमैटोग्राफी, बारिश और बंद कमरों के शॉट्स कहानी के तनाव को कई गुना बढ़ा देते हैं। इसके साथ ही फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर (BGM) हर एक सस्पेंस सीक्वेंस में रोंगटे खड़े कर देने वाला रोमांच पैदा करता है।
यदि आप वीकेंड पर एक ऐसी थ्रिलर फिल्म देखना चाहते हैं जो आपकी बुद्धि की परीक्षा ले और अंत तक आपको चौंकाती रहे, तो जियो हॉटस्टार पर उपलब्ध 'आई नोबडी' (I, Nobody) आपकी वॉचलिस्ट में सबसे ऊपर होनी चाहिए।