‘रवि किशन का स्कोप नहीं था हमारी इंडस्ट्री में खड़े होने का…’ मनोज तिवारी ने भोजपुरी सिनेमा के पुराने दौर पर किया चौंकाने वाला खुलासा
भोजपुरी सिनेमा के इतिहास में जब भी आधुनिक युग के पुनर्जन्म और स्वर्णिम दौर की बात होती है, तो दो नाम सबसे ऊपर उभरकर सामने आते हैं—मनोज तिवारी और रवि किशन। दोनों ही दिग्गज न केवल भोजपुरी स्क्रीन के सबसे बड़े सितारे रहे हैं, बल्कि आज राजनीति के मैदान में भी सांसद के रूप में एक ही दल में साथ काम कर रहे हैं। हालांकि, हाल ही में एक पॉडकास्ट इंटरव्यू के दौरान मनोज तिवारी ने दोनों के शुरुआती दिनों, करियर की टाइमलाइन और इंडस्ट्री की जमीनी हकीकत को लेकर एक बेहद चौंकाने वाला बयान दिया। मनोज तिवारी ने बिना लाग-लपेट के कहा कि जब वे भोजपुरी सिनेमा के शीर्ष पर थे, उस दौर में रवि किशन के लिए इस इंडस्ट्री में पैर जमाना या खड़े होना बिल्कुल आसान नहीं था, बल्कि उनका कोई सीधा स्कोप ही नजर नहीं आ रहा था।
बॉलीवुड से भोजपुरी तक का सफर: क्यों कही मनोज तिवारी ने यह बात
मनोज तिवारी ने अपने इस बयान के पीछे का पूरा संदर्भ समझाते हुए बताया कि रवि किशन मूल रूप से हिंदी सिनेमा यानी बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाने के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रहे थे। 90 के दशक में रवि किशन ने कई हिंदी फिल्मों में सह-कलाकार और चरित्र भूमिकाएं निभाई थीं, लेकिन मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा में उन्हें वह सोलो स्टारडम हासिल नहीं हो पा रहा था जिसकी उन्हें तलाश थी। दूसरी तरफ, मनोज तिवारी उस समय तक भोजपुरी संगीत जगत के निर्विवाद सम्राट बन चुके थे। उनके गाए छठ गीत, देवी गीत और पारंपरिक भोजपुरी लोकगीत उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और विदेशों में बसे भोजपुरी भाषियों के घर-घर में गूंज रहे थे। उनका सांस्कृतिक जुड़ाव और जमीनी पकड़ इतनी मजबूत थी कि भोजपुरी दर्शकों के बीच उनका कद पहले से ही स्थापित हो चुका था।
'ससुरा बड़ा पइसावाला' का धमाका और इंडस्ट्री का कायापलट
साल 2004 में जब मनोज तिवारी की फिल्म 'ससुरा बड़ा पइसावाला' रिलीज हुई, तो उसने भोजपुरी सिनेमा के इतिहास को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया। महज 30 से 35 लाख रुपये के मामूली बजट में बनी इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर 35 करोड़ रुपये से अधिक का ऐतिहासिक कारोबार किया, जिसने पूरी भारतीय फिल्म इंडस्ट्री को हिलाकर रख दिया। मनोज तिवारी ने याद करते हुए कहा कि उस फिल्म की अभूतपूर्व सफलता से पहले भोजपुरी सिनेमा लगभग मृतप्राय हो चुका था और कोई भी बड़ा एक्टर इसमें काम करने का जोखिम नहीं उठाना चाहता था। लेकिन जब उन्होंने अपनी गायकी और अभिनय के दम पर एक नया बाजार खड़ा किया, तब जाकर अन्य अभिनेताओं के लिए भोजपुरी में संभावनाएं खुलीं। इसी दौर में रवि किशन ने भी भोजपुरी की ओर रुख किया और 'पंडित जी बताई ना बियाह कब होई' जैसी फिल्मों से अपनी दूसरी पारी की ठोस शुरुआत की।
कड़वाहट नहीं, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और दशकों पुरानी दोस्ती
अपने बयान में 'स्कोप नहीं था' कहने के बावजूद मनोज तिवारी ने यह स्पष्ट किया कि उनके इस आकलन में कोई व्यक्तिगत ईर्ष्या या द्वेष नहीं है। उन्होंने रवि किशन की कड़ी मेहनत, अभिनय कौशल और स्क्रीन प्रजेंस की जमकर सराहना की। मनोज तिवारी ने कहा कि जब रवि किशन भोजपुरी में पूरी तरह सक्रिय हुए, तो दोनों के बीच बॉक्स ऑफिस पर एक बेहद स्वस्थ और ऐतिहासिक प्रतिस्पर्धा (राइवलरी) शुरू हुई, जिसने भोजपुरी इंडस्ट्री को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया।
दर्शक दो धड़ों में बंट गए थे—एक तरफ मनोज तिवारी के ठेठ देहाती और संगीत-प्रधान अंदाज के दीवाने थे, तो दूसरी तरफ रवि किशन के स्टाइलिश और एक्शन-पैक्ड अवतार के मुरीद। मनोज तिवारी ने हंसते हुए कहा कि उस दौर में भले ही लोग उनके बीच 36 का आंकड़ा बताते थे, लेकिन पर्दे के पीछे दोनों ने हमेशा एक-दूसरे का सम्मान किया।
सिनेमा के पर्दे से संसद के गलियारों तक का अटूट सफर
चार दशकों के लंबे सफर के बाद आज मनोज तिवारी और रवि किशन का रिश्ता सिनेमा से कहीं आगे निकलकर संसद के गलियारों तक पहुंच चुका है। दोनों नेता भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर लोकसभा सांसद बने और आज भी एक-दूसरे के साथ एक दोस्ताना और मजबूत तालमेल साझा करते हैं। सार्वजनिक मंचों पर अक्सर दोनों एक-दूसरे की टांग खींचते और पुराने दिनों के संघर्षों को याद करते नजर आते हैं। मनोज तिवारी के इस हालिया बयान ने एक बार फिर 2000 के दशक के उस दौर की यादें ताजा कर दी हैं, जब इन दो सितारों ने मिलकर एक क्षेत्रीय भाषा के सिनेमा को राष्ट्रीय पहचान दिलाई थी।