डेमोग्राफी कमीशन के 15 साल के डेटा मांगने पर भड़के असदुद्दीन ओवैसी, बोले- मुसलमानों को निशाना बनाने की साजिश
देश के विभिन्न राज्यों और सीमावर्ती जिलों में जनसंख्या के बदलते स्वरूप और जनसांख्यिकीय बदलावों (Demographic Changes) के अध्ययन के लिए गठित उच्चस्तरीय 'डेमोग्राफी कमीशन' की एक विस्तृत प्रश्नावली ने देश के सियासी पारे को अचानक सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा गठित इस आयोग ने राज्य सरकारों से पिछले 15 वर्षों का बेहद विस्तृत डेटा मांगा है, जिसमें यह जानकारी शामिल है कि किस जिले और किस धर्म के लोगों ने कितनी गाड़ियां खरीदीं, कितनी जमीनों की खरीद-फरोख्त की और स्कूलों में किन समुदायों के बच्चों का कितना दाखिला हुआ। इस कदम के सामने आते ही ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने केंद्र सरकार और गृह मंत्री अमित शाह की कार्यप्रणाली पर तीखा हमला बोला है और इसे अल्पसंख्यकों के खिलाफ एक सोची-समझी रणनीति करार दिया है।
असदुद्दीन ओवैसी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एक लंबा और आक्रामक बयान जारी करते हुए मोदी सरकार की प्राथमिकताओं और मंशा पर गंभीर सवाल खड़े किए। ओवैसी ने कहा कि जब विपक्ष और अल्पसंख्यक समुदाय लंबे समय से केंद्र सरकार से यह मांग कर रहे थे कि वह देश में मुसलमानों की वास्तविक सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक (तालीमी, समाजी और मआशी) स्थिति का पता लगाने के लिए वैज्ञानिक और आधिकारिक आंकड़े जुटाए, तब सरकार तुरंत मुंह फेर लेती थी और ऐसे किसी भी आंकड़े को एकत्र करने से इनकार कर देती थी। लेकिन अब गृह मंत्रालय के अधीन काम कर रहा डेमोग्राफी कमीशन राज्यों से इस बात की सूक्ष्म पड़ताल करवा रहा है कि किस मजहब के लोगों के पास कितनी गाड़ियां और कितनी जमीनें हैं।
आंकड़ों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने का आरोप, ओवैसी बोले- 'मुसलमानों के बचे-खुचे हक छीनने की तैयारी'
एआईएमआईएम प्रमुख ने आरोप लगाया कि इस कमीशन का वास्तविक एजेंडा वंचित वर्गों के उत्थान के लिए कोई कल्याणकारी योजना या बेहतर सामाजिक नीतियां बनाना नहीं है। उन्होंने दावा किया कि इस पूरी कवायद का छिपा हुआ मकसद केवल यह है कि चुनिंदा आंकड़ों को इकट्ठा किया जाए, उन्हें संदर्भ से अलग हटाकर तोड़-मरोड़कर जनता के सामने परोसा जाए और एक ऐसा नैरेटिव गढ़ा जाए जिससे मुसलमानों को सीधे तौर पर निशाना बनाया जा सके। ओवैसी ने अपनी पोस्ट में तीखे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए कहा कि सरकार का अंतिम उद्देश्य इस प्रकार की भ्रामक रिपोर्टों के आधार पर अल्पसंख्यक समुदाय के बचे-खुचे संवैधानिक और नागरिक अधिकार भी छीनना है।
ओवैसी के इस तीखे बयान के बाद विपक्षी दलों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने भी इस मामले में अपनी प्रतिक्रियाएं देनी शुरू कर दी हैं। आलोचकों का तर्क है कि भारत के संविधान का मूल धर्मनिरपेक्ष ढांचा (Secular Framework) किसी भी राज्य सरकार या उसके विभागों को नागरिकों की धार्मिक पहचान के आधार पर संपत्तियों, वाहनों या स्कूली शिक्षा का डेटा संकलित करने की इजाजत नहीं देता। जब सरकारी विभागों में वाहन पंजीयन या जमीन रजिस्ट्री के समय मजहब का कोई अनिवार्य कॉलम ही नहीं होता, तो ऐसे में इस प्रकार के आंकड़े मांगने का मतलब प्रशासनिक मशीनरी पर अनावश्यक दबाव बनाना और समाज में अविश्वास का माहौल पैदा करना है।
राज्यों से मांगा गया 15 साल का धर्मवार डेटा: वाहन, जमीन, स्कूल और वोटर रजिस्ट्रेशन की मांगी सूची
गृह मंत्रालय द्वारा गठित इस हाईलेवल कमेटी ने राज्यों के मुख्य सचिवों और गृह विभागों को 35 सवालों की एक विस्तृत और जटिल प्रश्नावली भेजी है। इस प्रश्नावली में राज्यों से पिछले 15 वर्षों (2011 से 2026 तक) के दौरान जिलों में हुए जनसांख्यिकीय बदलावों, प्रवासन (Migration Trends) और अंतर-राज्यीय व सीमा पार से होने वाली आवाजाही का पूरा कच्चा-चिट्ठा मांगा गया है। आयोग ने विशेष रूप से यह जानना चाहा है कि किन-किन जिलों में वाहनों के पंजीकरण में किस वर्ग की भागीदारी तेजी से बढ़ी है, अचल संपत्ति और जमीनों के लेन-देन में क्या कोई खास पैटर्न उभरा है, सरकारी व निजी स्कूलों में छात्रों के अनुपात में क्या बदलाव आया है और मतदाता सूची (Voter Registration) में किस तरह की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
इस विस्तृत मांग पत्र ने राज्य सरकारों और उनके नौकरशाहों को गहरे असमंजस और प्रशासनिक पशोपेश में डाल दिया है। कई राज्यों के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि भारत के परिवहन विभाग (RTO), भूमि राजस्व विभाग और स्कूल शिक्षा बोर्ड सामान्य तौर पर धार्मिक श्रेणियों के आधार पर नागरिकों का रिकॉर्ड नहीं रखते हैं। वाहन खरीदने या जमीन की रजिस्ट्री करवाते समय केवल नागरिकता, पता और वित्तीय विवरण दर्ज किए जाते हैं, न कि व्यक्ति का मजहब। ऐसे में पिछले 15 वर्षों के करोड़ों पुराने दस्तावेजों को खंगालकर उनमें से धर्मवार डेटा अलग करना तकनीकी और प्रशासनिक रूप से लगभग असंभव कार्य है। इसके अलावा, अधिकारियों ने यह आशंका भी जताई है कि यदि ऐसा डेटा जबरन तैयार करने की कोशिश की गई, तो यह निजता के अधिकार और संवैधानिक प्रावधानों का खुला उल्लंघन साबित हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस प्रकाश प्रभाकर नाओलेकर की अगुवाई में बनी कमेटी, जानिए क्या है इसका मैंडेट
गौरतलब है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस संवेदनशील विषय पर एक उच्चस्तरीय कमेटी का गठन 28 मई को किया था। इस आयोग की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति प्रकाश प्रभाकर नाओलेकर (Justice Prakash Prabhakar Naolekar) को सौंपी गई है, जो मध्य प्रदेश के लोकायुक्त भी रह चुके हैं। इस कमेटी में जनसांख्यिकी विशेषज्ञों, वरिष्ठ पूर्व नौकरशाहों और आंतरिक सुरक्षा के जानकारों को शामिल किया गया है। केंद्र सरकार का मानना है कि देश के कई सीमावर्ती और संवेदनशील राज्यों में अवैध प्रवासन (Illegal Infiltration) और आंतरिक विस्थापन के चलते जनसांख्यिकीय संतुलन तेजी से बिगड़ा है, जिसका सीधा असर राष्ट्रीय सुरक्षा, सीमा प्रबंधन और स्थानीय संसाधनों पर पड़ रहा है।
कमेटी का मुख्य उद्देश्य यही निर्धारित किया गया था कि वह देश भर में अवैध घुसपैठ, अनियंत्रित प्रवासन और अन्य विशिष्ट सामाजिक-आर्थिक कारणों से हो रहे डेमोग्राफिक परिवर्तनों का वैज्ञानिक और सांख्यिकीय अध्ययन करे और केंद्र सरकार को इससे प्रभावी तरीके से निपटने के लिए ठोस कानूनी व नीतिगत सुझाव सौंपे। सरकार के सूत्रों का कहना है कि यह अध्ययन किसी समुदाय विशेष को लक्षित करने के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संसाधनों के उचित वितरण और सीमावर्ती क्षेत्रों की सुरक्षा को चाक-चौबंद करने के लिए आवश्यक है। बहरहाल, 35 सवालों की इस सूची के सार्वजनिक होते ही यह स्पष्ट हो गया है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद से लेकर अदालतों तक एक बड़ा राजनीतिक और कानूनी बवंडर खड़ा करने वाला है।