अफगानिस्तान के लिए इतिहास रचने वाली साइकलिस्ट फरीबा हाशमी की अनकही दास्तां
खेल के मैदान पर जब कोई खिलाड़ी जीत हासिल करता है, तो उसके पीछे केवल कुछ महीनों की मेहनत नहीं होती, बल्कि वर्षों का वह कड़ा संघर्ष छिपा होता है जो आम आदमी की कल्पना से परे होता है। एशियाई खेलों में पिछले सप्ताह अफगानिस्तान के लिए रजत पदक जीतकर इतिहास रचने वाली महिला साइकलिस्ट फरीबा हाशमी की सफलता भी कुछ ऐसी ही रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी है। फरीबा ने यह मुकाम करियर की शुरुआत में राह के फूलों से नहीं, बल्कि रूढ़िवादी समाज के लोगों द्वारा उन पर फेंके गए पत्थरों, ईंटों और बोतलों से बचते-बचते तय किया है।
इस ऐतिहासिक उपलब्धि के साथ फरीबा हाशमी न केवल अफगानिस्तान से साइकलिंग में पदक जीतने वाली पहली खिलाड़ी बन गई हैं, बल्कि वर्ष 2002 के बाद से एशियाई खेलों के इतिहास में किसी भी स्पर्धा में पदक जीतने वाली अपने देश की पहली महिला एथलीट भी बन गई हैं। उनकी यह जीत सिर्फ एक मेडल नहीं है, बल्कि उन तमाम रूढ़िवादी जंजीरों के खिलाफ एक खुला विद्रोह है जो महिलाओं को चार दीवारों में कैद रखना चाहती हैं।
पिता को था समाज का डर, पहचान छुपाने के लिए पहनने पड़े पुरुषों के कपड़े
जब फरीबा हाशमी के पिता ने अपनी बेटी को पहली बार साइकिल चलाने की कोशिश करते देखा था, तो उनके मन में यह डर बिल्कुल नहीं था कि कहीं उनकी बेटी गिरकर घायल न हो जाए। उनके भीतर का असली डर सामाजिक और वैचारिक था—उन्हें इस बात का खौफ था कि अगर रूढ़िवादी अफगान समाज में किसी को इस बात की भनक लग गई कि एक लड़की साइकिल चला रही है, तो परिवार और उस लड़की के साथ क्या हश्र होगा।
अफगानिस्तान के अत्यधिक रूढ़िवादी माहौल में महिलाओं का खुलेआम खेलकूद में हिस्सा लेना किसी बड़े अपराध से कम नहीं माना जाता था। स्थिति इतनी भयावह थी कि अभ्यास के दौरान स्थानीय लोग फरीबा पर जानबूझकर पत्थर और पानी की बोतलें फेंकते थे ताकि वे डरकर यह खेल छोड़ दें। लेकिन फरीबा के हौसले इन अड़चनों से कमजोर नहीं पड़े। अपनी पहचान और अपनी जान को बचाए रखने के लिए उन्हें कई बार पुरुषों के कपड़े पहनकर साइकिल लेकर मैदान में उतरना पड़ता था, ताकि कोई उन्हें पहचान न सके।
तालिबान के सत्ता में लौटने पर छोड़ना पड़ा देश, अब इटली से लिख रही हैं सफलता की नई इबारत
फरीबा हाशमी का यह संघर्ष तब और अधिक कठिन हो गया जब साल 2021 में अफगानिस्तान में तालिबान ने दोबारा सत्ता की बागडोर अपने हाथ में ले ली। महिला अधिकारों और खेलों पर लगे प्रतिबंधों के बाद उनके लिए देश में रहना असंभव हो गया, जिसके चलते उन्हें मजबूरन अपना वतन छोड़कर सुरक्षित ठिकाने के रूप में इटली में शरण लेनी पड़ी।
विदेशी धरती पर संघर्ष जारी रखते हुए फरीबा ने अपनी ट्रेनिंग पर पूरा फोकस किया और अपनी कड़ी मेहनत के दम पर एशियाई खेलों में देश के लिए रजत पदक जीतकर यह साबित कर दिया कि हौसले बुलंद हों तो हर दीवार गिराई जा सकती है। वर्तमान में इटली में रह रहीं फरीबा ने अपनी इस ऐतिहासिक जीत के बाद भावुक होते हुए कहा कि वे चाहती हैं कि उनके देश से और भी कई 'फरीबा' बाहर आएं और खेल के मैदान में देश का नाम रोशन करें। आने वाले लॉस एंजिलिस ओलंपिक में पदक जीतना उनके जीवन के सबसे बड़े सपनों में से एक है, और वे इसके लिए पूरी शिद्दत से जुटी हुई हैं।