मुसीबत में 'संकटमोचक' बना भारत! नेपाल जलप्रलय के बीच भेजी 47.5 टन राहत सामग्री, दवाइयों से लेकर खाने के पैकेट तक

मुसीबत में 'संकटमोचक' बना भारत! नेपाल जलप्रलय के बीच भेजी 47.5 टन राहत सामग्री, दवाइयों से लेकर खाने के पैकेट तक

हिमालयी पड़ोसी राष्ट्र नेपाल में 26 अगस्त को रसुवा और भोटेकोशी नदी घाटी में आई प्रलयंकारी बाढ़ ने जब सैकड़ों जिंदगियों को लील लिया और देश के 13 प्रमुख हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स समेत बुनियादी ढांचे को मलबे में तब्दील कर दिया, तब भारत ने एक बार फिर सच्चे 'पड़ोसी धर्म' और 'फर्स्ट रिस्पॉन्डर' (सबसे पहले मदद पहुंचाने वाले देश) की भूमिका निभाते हुए मदद का हाथ आगे बढ़ाया है। तबाही की खबर मिलते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सीधे निर्देशों पर भारतीय वायुसेना (IAF) ने काठमांडू के लिए एक विशाल एयर-ब्रिज तैयार किया। भारत सरकार ने महज 24 घंटों के भीतर दो विशेष सैन्य विमानों के जरिए 47.5 टन से अधिक मानवीय सहायता और आपदा राहत (HADR) सामग्री काठमांडू पहुंचा दी है। इस आपातकालीन सहायता में जीवनरक्षक दवाइयां, रेडी-टू-ईट फूड पैकेट्स, टेंट, जनरेटर और हाइजीन किट शामिल हैं, जिससे बाढ़ प्रभावित दुर्गम इलाकों में फंसे हजारों बेघर नागरिकों को त्वरित राहत मिल सके।

वायुसेना के C-130J और C-17 ग्लोबमास्टर से 47.5 टन महा-सहायता: क्या-क्या भेजा गया?

भारत की तरफ से यह सहायता अभियान दो सुनियोजित चरणों में संचालित किया गया। त्रासदी की पहली सूचना मिलते ही बुधवार रात गाजियाबाद स्थित हिंडन एयरफोर्स स्टेशन से भारतीय वायुसेना के विशेष सामरिक परिवहन विमान C-130J सुपर हरक्यूलिस ने पहली उड़ान भरी। इस पहली खेप में 10 टन अत्यंत आवश्यक आपातकालीन राहत सामग्री, जीवनरक्षक दवाइयां, टेंट, कंबल, सोलर लैंप और स्वच्छता किट शामिल थे। यह विमान रात में ही काठमांडू के त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर सुरक्षित रूप से उतरा और सामग्री तुरंत स्थानीय आपदा राहत इकाइयों को सौंप दी गई।

इसके तुरंत बाद गुरुवार सुबह भारतीय वायुसेना के सबसे भारी और शक्तिशाली परिवहन विमान C-17 ग्लोबमास्टर को मिशन पर लगाया गया। इस दूसरे विमान ने हिंडन से 37.5 टन की भारी-भरकम राहत खेप लेकर उड़ान भरी। इस तरह दोनों उड़ानों को मिलाकर भारत अब तक कुल 47.5 टन सहायता नेपाल पहुंचा चुका है। इस विशाल खेप में लगभग 8 टन गंभीर बीमारियों और चोटों के इलाज में काम आने वाली आपातकालीन दवाइयां, 1 टन से अधिक पौष्टिक और लंबे समय तक सुरक्षित रहने वाले तैयार भोजन (MRE) के पैकेट्स, बिजली आपूर्ति ठप होने की स्थिति के लिए भारी क्षमता वाले पावर जनरेटर और शेल्टर निर्माण का सामान शामिल है।

काठमांडू में भारतीय राजदूत ने सौंपी खेप: पीएम मोदी और विदेश मंत्री जयशंकर का सीधा संदेश

काठमांडू में राहत सामग्री की यह खेप औपचारिक रूप से नेपाल सरकार के सुपुर्द की गई। नेपाल में भारत के राजदूत नवीन श्रीवास्तव ने हवाई अड्डे पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहकर नेपाल के संस्कृति, पर्यटन और नागरिक उड्डयन मंत्री खड़क राज पौडेल और आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के शीर्ष अधिकारियों को यह मानवीय सहायता सौंपी। नेपाली नेतृत्व ने इस संकट की घड़ी में भारत की अप्रत्याशित तेजी और उदार सहयोग के लिए हार्दिक आभार व्यक्त किया।

इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल के शीर्ष नेतृत्व से फोन पर सीधी बातचीत कर जान-माल के भारी नुकसान पर गहरा शोक व्यक्त किया था। प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट किया कि भारत इस कठिन समय में नेपाल के अपने भाई-बहनों के साथ पूरी मजबूती और एकजुटता के साथ खड़ा है तथा राहत, पुनर्वास और तकनीकी सहायता के लिए जो भी आवश्यक होगा, भारत हर संभव मदद उपलब्ध कराएगा। विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर पुष्टि करते हुए लिखा कि भारत लगातार नेपाल के अधिकारियों के संपर्क में है और खोज व बचाव अभियानों में जमीन से लेकर आसमान तक हर स्तर पर सहयोग जारी रहेगा।

एनडीआरएफ (NDRF) स्टैंडबाय पर, वायुसेना के चॉपर्स तैयार: दुर्गम पहाड़ों में रेस्क्यू का बैकअप

सामग्री पहुंचाने के साथ-साथ भारत सरकार ने जमीनी स्तर पर रेस्क्यू ऑपरेशंस के लिए भी अपनी पूरी तैयारी कर रखी है। राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) के आईजी नरेंद्र सिंह बुंदेला के अनुसार, एनडीआरएफ की विशेषज्ञ टीमों को पूरी तरह स्टैंडबाय मोड पर रखा गया है। जैसे ही नेपाल सरकार की ओर से औपचारिक अनुरोध प्राप्त होगा और केंद्र सरकार से हरी झंडी मिलेगी, आधुनिक खोज व बचाव उपकरणों (जैसे लाइफ डिटेक्टर्स, कटर, बोट्स और प्रशिक्षित डॉग स्क्वॉड) से लैस टीमें तुरंत नेपाल के लिए रवाना हो जाएंगी।

इसके अतिरिक्त, पहाड़ी इलाकों में पुलों और सड़कों के बह जाने के कारण दर्जनों गांव पूरी तरह कट चुके हैं। इस स्थिति को देखते हुए भारतीय वायुसेना ने अपने बहुउद्देशीय हेलीकॉप्टरों (एमआई-17 वी5 और एडवांस लाइट हेलीकॉप्टर) को भी अलर्ट पर रखा है। आवश्यकता पड़ने पर इन हेलीकॉप्टरों का इस्तेमाल दुर्गम संकरी घाटियों में फंसे लोगों को एयरलिफ्ट करने और सीधे पहाड़ी चोटियों पर भोजन व दवाइयां गिराने (एयरड्रॉप) के लिए किया जाएगा।

सीमा पार फंसे भारतीयों की सुरक्षा और हेल्पलाइन: काठमांडू से बीजिंग तक 24 घंटे अलर्ट

रसुवा और तिमुरे जैसे सीमावर्ती इलाकों में भारी बाढ़ आने के समय सैकड़ों भारतीय नागरिक व्यापार, तीर्थयात्रा और पर्यटन के सिलसिले में वहां मौजूद थे। प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार, करीब 288 से अधिक भारतीय नागरिकों के लापता होने या संपर्क टूटने की सूचना मिली है, जिनमें से कई लोग चीनी सीमा और तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र के आसपास के ट्रांजिट पॉइंट्स पर फंसे बताए जा रहे हैं।

इस आपात स्थिति से निपटने के लिए नई दिल्ली में विदेश सचिव विक्रम मिस्री और विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय समीक्षा बैठकें हुईं। काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास ने 24x7 काम करने वाले तीन आपातकालीन हेल्पलाइन नंबर (+977-9851316807, +977-9709107500 और +977-9810326117) जारी किए हैं, जिन पर परिजन व्हाट्सएप के माध्यम से भी जानकारी साझा कर सकते हैं। इसके साथ ही, बीजिंग स्थित भारतीय दूतावास ने भी तिब्बत सीमा पर फंसे भारतीयों के लिए एक विशेष इमरजेंसी नंबर (0086-18514284905) एक्टिव किया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने संबंधित भारतीय राज्यों के मुख्य सचिवों से समन्वय स्थापित कर लापता लोगों का डेटाबेस तैयार करना शुरू कर दिया है ताकि हर एक नागरिक की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित की जा सके।

'नेबरहुड फर्स्ट' और संकट मोचक भारत: 2015 के 'ऑपरेशन मैत्री' की यादें ताजा

भारत और नेपाल के रिश्ते केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि सदियों पुराने सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और 'रोटी-बेटी' के पारिवारिक बंधनों पर टिके हैं। जब भी नेपाल पर कोई प्राकृतिक आपदा आई है, भारत ने बिना किसी हिचकिचाहट के सबसे आगे आकर सहायता की है। साल 2015 के विनाशकारी गोरखा भूकंप के दौरान भारत द्वारा चलाया गया 'ऑपरेशन मैत्री' इतिहास के सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय राहत अभियानों में से एक था, जिसमें भारत ने हजारों जानें बचाई थीं।

हालिया वर्षों में जाजरकोट भूकंप से लेकर मौजूदा रसुवा फ्लैश फ्लड तक, भारत ने बार-बार यह साबित किया है कि प्रधानमंत्री की 'नेबरहुड फर्स्ट' (पड़ोसी पहले) और 'सागर' (SAGAR) दृष्टि केवल कागजी नीतियां नहीं, बल्कि जमीन पर उतरने वाली एक जीवंत मानवीय प्रतिबद्धता हैं। ऐसे समय में जब नेपाल के पहाड़ों में 'बैरियर लेक' और अतिरिक्त जलभराव का खतरा अभी भी बना हुआ है, भारत की यह 47.5 टन राहत सामग्री दोनों देशों के अटूट विश्वास और साझा भविष्य का सबसे मजबूत प्रतीक बनकर सामने आई है।