थलपति विजय को कहा 'लाश' और दी भद्दी गाली, फिर भी मिली जमानत; मद्रास हाईकोर्ट ने सरकार और पुलिस को लगाई कड़ी फटकार
तमिल सिनेमा के सुपरस्टार और 'तमिलगा वेत्री कषगम' (TVK) के प्रमुख थलपति विजय के खिलाफ सार्वजनिक मंच से अभद्र और अमर्यादित भाषा का प्रयोग करने के मामले में मद्रास उच्च न्यायालय ने बड़ा फैसला सुनाया है। ग्रेटर चेन्नई कॉरपोरेशन के वार्ड 95 की पार्षद और सत्तारूढ़ द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) महिला विंग की पदाधिकारी डी सुधा को अदालत ने 25,000 रुपये के निजी मुचलके पर अग्रिम जमानत मंजूर कर ली है। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार और अभियोजन पक्ष ने जमानत की शर्त के तौर पर यह मांग रखी थी कि आरोपी महिला पर भविष्य में विजय के खिलाफ सार्वजनिक बयानबाजी करने पर रोक लगाई जाए, लेकिन उच्च न्यायालय ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने साफ किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की संवैधानिक परीक्षा केवल शालीन बयानों तक सीमित नहीं होती।
क्या था पूरा विवाद? मंच से विजय को कहा था 'लाश', वीडियो हुआ था वायरल
यह विवाद बीते 7 अक्टूबर का है, जब चेन्नई में डीएमके की एक आंतरिक बैठक के दौरान पार्षद डी सुधा ने एक भाषण दिया। उस दौरान उन्होंने अभिनेता और नेता विजय पर मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की 'बॉडी शेमिंग' करने का आरोप लगाया।
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वायरल वीडियो में सुधा मंच से तीखे तेवर में कहती नजर आईं— "तुम हमारे नेता के लुक्स पर सवाल उठा रहे हो... मेरे नेता 74 साल के हैं और शेर की तरह दिखते हैं, जबकि विजय तुम 52 साल के होकर भी एक 'लाश' जैसे नजर आते हो।"
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इस भाषण के दौरान उन्होंने विजय के खिलाफ बेहद आपत्तिजनक और असंसदीय अपशब्दों (गाली-गलौज) का भी इस्तेमाल किया।
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वीडियो के सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होने के लगभग 12 दिन बाद थलपति विजय की पार्टी टीवीके (TVK) के एक पदाधिकारी ने स्थानीय पुलिस थाने में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज किया था।
"संवैधानिक सुरक्षा की परीक्षा भद्दे भाषणों पर ही होती है": जज की सरकार को खरी-खरी
जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति रमेश ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राज्य की कार्रवाई के अंतर्विरोधों पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं:
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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कसौटी: अदालत ने टिप्पणी की, "वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Free Speech) की संवैधानिक सुरक्षा की असली परीक्षा तभी होती है जब भाषण भद्दा, तीखा या अप्रिय हो, न कि तब जब केवल विनम्र और शिष्ट भाषा का इस्तेमाल किया गया हो। कोई भी सरकार अपने शालीन और मधुर आलोचकों को कभी गिरफ्तार करने की कोशिश नहीं करती।"
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अपशब्द सुनने के लिए रहें तैयार: बेंच ने स्पष्ट किया कि जो लोग लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीति या ऊंचे सार्वजनिक पदों पर बैठते हैं, उन्हें जनता और विरोधियों की कड़ी आलोचना, उपहास और यहां तक कि अपशब्दों का सामना करने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए। लोकतंत्र में आलोचना को अपराध मानकर जेल में नहीं डाला जा सकता।
पुलिस की निष्पक्षता पर सवाल: "पुलिस राज्य की होती है, किसी दल विशेष की नहीं"
अदालत ने इस मामले में पुलिस के रवैये और प्राथमिकता पर भी गंभीर सवाल खड़े किए:
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मानहानि को बनाया आपराधिक मामला: जज ने रेखांकित किया कि यह मामला मूल रूप से एक नागरिक मानहानि (Civil Defamation) का बनता था, जिसके लिए कानून में अलग प्रक्रिया निर्धारित है। लेकिन पुलिस ने एक तीसरे पक्ष (बाईस्टैंडर) की शिकायत पर इसे सीधे तौर पर गंभीर संज्ञेय अपराध में तब्दील कर दिया।
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पुलिस का संवैधानिक दायित्व: अदालत ने कड़े शब्दों में याद दिलाया कि "पुलिस स्थायी राज्य (State) की सेवा करती है, न कि सत्ता में बैठी किसी ऐसी राजनीतिक पार्टी की जो चुनावों के साथ बदलती रहती है।" पुलिस राजनीतिक भाषणों या आपसी तू-तू-मैं-मैं को दबाने के लिए गिरफ्तारी की धमकी को हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं कर सकती।
अदालत ने भाषा को गलत माना, लेकिन जमानत के अधिकार को सुरक्षित रखा
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि बोलने के अधिकार की रक्षा करने का यह अर्थ कतई नहीं है कि अदालत पार्षद द्वारा इस्तेमाल की गई अभद्र भाषा का समर्थन करती है। सुनवाई के दौरान डीएमके नेता ने अपनी भाषा पर खेद व्यक्त किया और माफी मांगी।
अदालत ने तथ्यों का विश्लेषण करते हुए पाया कि यह भाषण किसी विशेष समुदाय, धर्म या वर्ग के खिलाफ नफरत फैलाने के उद्देश्य से नहीं दिया गया था, बल्कि इसका दायरा दो विरोधी राजनीतिक दलों के नेताओं की तनातनी तक सीमित था और इससे किसी प्रकार की हिंसा भड़कने का प्रत्यक्ष खतरा नहीं था। इसी आधार पर अदालत ने डी सुधा को अग्रिम जमानत देते हुए पुलिस और सरकार की अत्यधिक सक्रियता पर विराम लगा दिया।