RSS विजयादशमी उत्सव: 'AI से लेकर नशे तक, OTT पर नियम जरूरी'
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शताब्दी वर्ष के ऐतिहासिक पड़ाव पर नागपुर के रेशीमबाग मैदान में आयोजित पारंपरिक विजयादशमी उत्सव में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने राष्ट्र, समाज और समूचे विश्व के सामने खड़ी आधुनिक चुनौतियों पर अत्यंत महत्वपूर्ण मार्गदर्शन दिया। लगभग एक घंटे चले अपने ओजस्वी संबोधन में उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के विवेकपूर्ण इस्तेमाल, ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर अनियंत्रित सामग्री के नियमन, नई पीढ़ी में फैल रहे नशे के जाल, सामाजिक समरसता और पर्यावरण संरक्षण जैसे गंभीर विषयों पर विस्तार से प्रकाश डाला। समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में दैनिक जागरण के प्रधान संपादक संजय गुप्त मंच पर उपस्थित रहे। संघ प्रमुख ने स्पष्ट किया कि 100 वर्षों की यह अनवरत यात्रा केवल उत्सव मनाने के लिए नहीं, बल्कि भारत को उसकी सनातन सांस्कृतिक चेतना के आधार पर संगठित, शक्तिशाली और आत्मनिर्भर बनाकर समाज में ठोस सकारात्मक परिवर्तन लाने का महायज्ञ है।
शताब्दी वर्ष का महाअभियान: 10 करोड़ से अधिक घरों तक पहुंचा संघ, संतों के त्याग से प्रेरणा
संघ प्रमुख ने अपने उद्बोधन में शताब्दी वर्ष के दौरान चलाए गए देशव्यापी संपर्क और जनजागरण के विशाल आंकड़ों को साझा करते हुए बताया कि राष्ट्र निर्माण की इस मुहिम ने भारत के हर कोने को छुआ है। व्यापक संपर्क अभियान के अंतर्गत देश भर के 4,61,527 गांवों और 41,076 शहरी बस्तियों में 10 करोड़ 19 लाख 88 हजार 511 परिवारों तक व्यक्तिगत संपर्क साधा गया। इसके साथ ही देश के 1,117 जिलों में प्रबुद्ध नागरिक गोष्ठियां आयोजित हुईं, जिनमें 4 लाख 26 हजार से अधिक प्रबुद्ध महिला एवं पुरुष शामिल हुए। वहीं 5,036 प्रखंडों में सद्भावना बैठकें, 34,187 मंडलों में हिंदू सम्मेलन और युवा सम्मेलनों के जरिए 39 लाख 25 हजार से ज्यादा युवाओं को राष्ट्रधर्म से जोड़ा गया। विदेशी धरती पर भी भारतीय संस्कृति और संघ के सेवा कार्यों के प्रति संवाद स्थापित किया गया। डॉ. भागवत ने अपने संबोधन में संत रविदास महाराज की 650वीं जयंती, स्वामी श्रद्धानंद के बलिदान के 100 वर्ष, स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की जन्मशताब्दी और राजनारायण बसु की 200वीं जयंती का स्मरण कराते हुए कहा कि इन महापुरुषों का जीवन हमें सामाजिक समरसता, त्याग और सांस्कृतिक आत्मबोध की निरंतर प्रेरणा देता है।
पंच परिवर्तन की पांच ठोस पहल: समरसता, कुटुंब प्रबोधन और पर्यावरण से बदलेगा समाज
समाज के स्थायी उत्थान के लिए सरसंघचालक ने 'पंच परिवर्तन' के पंचसूत्रीय दर्शन को जीवनशैली का अनिवार्य हिस्सा बनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि यह केवल एक वर्ष का औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि समाज के स्वभाव को बदलने की सतत साधना है। इसके पहले आयाम 'सामाजिक समरसता' के तहत जातिगत और सामाजिक भेदभाव को मिटाकर समानता, परस्पर सम्मान और आत्मीयता को स्थापित करना है। दूसरा बिंदु 'कुटुंब प्रबोधन' है, जिसके जरिए आधुनिकता की अंधी दौड़ में बिखरते परिवारों के भीतर संस्कार, संवाद और उत्तरदायित्व के भाव को जीवित रखना है। तीसरा स्तंभ 'पर्यावरण संरक्षण' है, जिसमें प्रकृति की रक्षा और दैनिक जीवन में इको-फ्रेंडली आदतों को अपनाना जरूरी है। चौथा आयाम 'स्वबोध एवं स्वदेशी' है, जो अपनी गौरवशाली सांस्कृतिक पहचान को समझने और स्वदेशी उत्पादों व विचारों को प्राथमिकता देने पर बल देता है। पांचवां स्तंभ 'नागरिक अनुशासन' है, जिसके तहत संविधान प्रदत्त नागरिक कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करना और सामाजिक मर्यादाओं का सम्मान करना प्रत्येक भारतीय का धर्म होना चाहिए।
ओटीटी कंटेंट पर सरकारी नियंत्रण की मांग, नशे के खिलाफ संयुक्त राष्ट्रीय अभियान की पुकार
पारिवारिक और शैक्षणिक वातावरण में संस्कारों की कमी पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए डॉ. मोहन भागवत ने डिजिटल दुनिया और आधुनिक मीडिया के दुष्प्रभावों पर सीधे प्रहार किया। उन्होंने कहा कि आज की युवा पीढ़ी को सही और गलत के बीच भेद करने का विवेक सिखाना अत्यंत आवश्यक हो चुका है। ओटीटी (ओवर-द-टॉप) प्लेटफॉर्म्स पर परोसी जा रही अनियंत्रित, अश्लील और हिंसक सामग्री को लेकर समाज के भीतर भारी चिंता है, जिस पर शासन-प्रशासन को गंभीरता से विचार करते हुए उचित और पारदर्शी कानूनी नियमन तय करने की सख्त जरूरत है। इसके साथ ही उन्होंने देश के युवाओं को खोखला कर रही नशे की बढ़ती लत को एक विकराल 'राष्ट्रीय संकट' करार दिया। संघ प्रमुख ने कहा कि नशे के इस भयानक जाल को केवल पुलिस या कानून के भरोसे नहीं तोड़ा जा सकता, बल्कि इसके लिए सरकार, स्थानीय प्रशासन, प्रबुद्ध वर्ग और पूरे समाज को मिलकर एक साझा जन-आंदोलन छेड़ना होगा, ताकि भारत की युवा शक्ति को पतन से बचाया जा सके।
एआई और आधुनिक तकनीक का विवेकपूर्ण इस्तेमाल जरूरी, अंधाधुंध उपभोग से पर्यावरण को खतरा
विज्ञान और तकनीकी प्रगति का स्वागत करते हुए डॉ. भागवत ने आगाह किया कि तकनीक मानव जीवन को सुगम और बेहतर बनाने का साधन मात्र है, वह स्वयं जीवन का साध्य या अंतिम उद्देश्य नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और परमाणु तकनीक जैसी क्रांतिकारी शक्तियों का उपयोग केवल और केवल मानव कल्याण और रचनात्मक कार्यों के लिए होना चाहिए, न कि विनाश या विध्वंस के लिए। केवल भौतिक सुख-सुविधाओं और अंधाधुंध उपभोग पर केंद्रित विकास मॉडल पूरी दुनिया को गंभीर पर्यावरणीय तबाही की ओर धकेल रहा है, जिसका प्रत्यक्ष प्रमाण नेपाल की हालिया भीषण प्राकृतिक आपदा के रूप में देखने को मिला। उन्होंने कोलकाता की हृदयविदारक घटना का भी दुखद उल्लेख करते हुए कहा कि नैतिकता, संयम और मानवीय संवेदनशीलता के बिना भौतिक प्रगति अधूरी है। भारत को पूरी दुनिया के सामने संतुलित, नैतिक और प्रकृति-सम्मत विकास का अनुकरणीय वैश्विक मॉडल प्रस्तुत करना होगा।
हिंदू भाव ही राष्ट्रीय चेतना का आधार, विभाजनकारी प्रवृत्तियों और आंदोलनकारी राजनीति से सतर्कता
संघ प्रमुख ने स्पष्ट शब्दों में प्रतिपादित किया कि 'हिंदू भाव' भारत की अखंड राष्ट्रीय चेतना और एकात्मता की सबसे मजबूत धुरी है। यह भाव किसी संकीर्ण पूजा-पद्धति, भाषा, पंथ, खान-पान या दलगत राजनीति में कैद नहीं है, बल्कि इसका मूल लक्षण अध्यात्म, मानवता और 'वसुधैव कुटुंबकम' का विश्व बंधुत्व है। मातृभूमि के प्रति अनन्य निष्ठा, समान पूर्वजों की गौरवशाली विरासत और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का आचरण ही राष्ट्रीय एकता का आधार है। उन्होंने कहा कि एक संगठित और स्वाभिमानी हिंदू समाज का निर्माण किसी अन्य पंथ के विरोध में नहीं, बल्कि सबके समावेशी कल्याण के लिए है। समाज को भाषा, प्रांत या इतिहास की पुरानी आशंकाओं के नाम पर भड़काने और आपसी कलह पैदा करने वाली विघटनकारी ताकतों से बेहद सतर्क रहना होगा। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आंदोलनों का लक्ष्य राष्ट्रीय समस्याओं का वास्तविक समाधान होना चाहिए, न कि समाज को बांटकर राजनीतिक स्वार्थ, वोट बैंक या तात्कालिक लोकप्रियता हासिल करना।
21 प्रांतों के 1,296 विद्यालयों में ग्रामीणों का सेवा मॉडल, 'वंदे मातरम्' से विश्वगुरु बनने का मार्ग
सरसंघचालक ने जमीनी बदलाव के उदाहरण देते हुए बताया कि समाज की हर समस्या के लिए केवल सरकार पर निर्भर रहना समाधान नहीं है। देश के 21 प्रांतों के 210 जिलों में स्थित लगभग 1,296 विद्यालयों में राष्ट्रीय स्वयंसेवकों और स्थानीय ग्रामीणों की सहभागिता से चमत्कारी बदलाव देखने को मिले हैं, जहां विद्यार्थियों की उपस्थिति, शिक्षा की गुणवत्ता और इंफ्रास्ट्रक्चर में ऐतिहासिक सुधार हुआ है। संबोधन के समापन चरण में उन्होंने ऐतिहासिक बंगाल विभाजन के विरोध और राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम्' की अमर चेतना का स्मरण कराते हुए कहा कि छोटी-छोटी संकीर्ण पहचानों के फेर में हमें अपनी महान राष्ट्रीय एकता के मूल आधार को कभी नहीं भूलना चाहिए। आज जब पूरी दुनिया भू-राजनीतिक तनावों, युद्ध, आर्थिक अनिश्चितता और जलवायु संकट से जूझ रही है, तब भारत अपनी सनातन सांस्कृतिक दृष्टि के दम पर ही विश्व को शांति, सुख और बंधुत्व की नई राह दिखा सकता है, जिसके लिए हर नागरिक को अपने आचरण से राष्ट्र निर्माण में आहुति देनी होगी।