स्कूलों में रैगिंग पर अलग केंद्रीय कानून बनाने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार CJI बेंच ने खारिज की PIL
देश भर के निजी और सरकारी स्कूलों, आवासीय विद्यालयों तथा प्री-यूनिवर्सिटी संस्थानों में बच्चों के साथ होने वाली रैगिंग और बुलिंग की घटनाओं पर लगाम कसने के लिए एक अलग, कठोर केंद्रीय कानून बनाने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सुनवाई करने से साफ इनकार कर दिया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि रैगिंग जैसी बुराई को रोकने के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय पहले ही व्यापक दिशा-निर्देश और स्पष्ट व्यवस्था दे चुका है। अदालत ने दोहराया कि जब पहले से ही एक मजबूत न्यायिक रूपरेखा मौजूद है, तो बार-बार उसी विषय पर नई याचिकाओं पर सुनवाई नहीं की जा सकती।
सर्वोच्च न्यायालय की इस सख्त टिप्पणी के बाद याचिकाकर्ता के वकील ने याचिका पर आगे जोर देने के बजाय पीछे हटना ही बेहतर समझा। हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता को यह वैधानिक स्वतंत्रता दी है कि वे अपनी चिंताओं और सुझावों को लेकर सीधे केंद्र सरकार, शिक्षा मंत्रालय और संबंधित सक्षम प्राधिकारियों के समक्ष एक औपचारिक प्रतिवेदन (रिप्रेजेंटेशन) दाखिल कर सकते हैं। इस फैसले के बाद यह साफ हो गया है कि स्कूलों में रैगिंग और मानसिक उत्पीड़न से निपटने के लिए नई कानूनी व्यवस्था बनाने के बजाय पूर्व में निर्धारित अदालती गाइडलाइंस और मौजूदा प्रशासनिक तंत्र को ही धरातल पर कड़ाई से लागू करना होगा।
सीजेआई सूर्यकांत की तीन जजों की बेंच का कड़ा रुख: 'पुराने दिशा-निर्देश मौजूद, बार-बार नई याचिकाएं नहीं'
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने याचिका की रूपरेखा पर विचार करते हुए बेहद संतुलित लेकिन कड़ा रुख अख्तियार किया। पीठ ने कहा कि रैगिंग के उन्मूलन के लिए अदालतों ने समय-समय पर विस्तृत मानक तय किए हैं, जो केवल उच्च शिक्षण संस्थानों ही नहीं बल्कि प्राथमिक स्तर पर भी सुरक्षा तंत्र विकसित करने का आधार बनते हैं। अदालत ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया का काम कानून बनाना या संसद को विशिष्ट कानून बनाने का निर्देश देना नहीं है, खासकर तब जब पूर्व के दिशा-निर्देशों के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी संबंधित राज्य सरकारों और वैधानिक निकायों पर है।
पीठ में शामिल जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना ने भी इस बात को रेखांकित किया कि दिशा-निर्देशों के अनुपालन को लेकर यदि कोई विशिष्ट उल्लंघन होता है, तो उसके लिए अलग कानूनी उपचार उपलब्ध हैं। लेकिन पूरे देश के लिए एक सामान्य याचिका दाखिल करके यह अपेक्षा करना कि शीर्ष अदालत नई विधायी प्रक्रिया शुरू करने का आदेश जारी करे, न्यायिक समीक्षा के तय सिद्धांतों के दायरे से बाहर है। अदालत ने कहा कि कानून-व्यवस्था और स्कूली अनुशासन की निगरानी स्थानीय स्तर पर स्कूल प्रबंधन और शिक्षा विभागों की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
सीबीएसई, आईसीएसई, केंद्र और सभी राज्यों को बनाया गया था पक्षकार, पाठ्यक्रम में विषय शामिल करने की थी मांग
यह जनहित याचिका अधिवक्ता यदावी आदित्य रसीवासिया के माध्यम से दायर की गई थी, जिसमें केंद्र सरकार के शिक्षा मंत्रालय, सभी राज्य सरकारों, केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासनों के साथ-साथ केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) और काउंसिल फॉर द इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट एग्जामिनेशंस (ICSE) को औपचारिक रूप से पक्षकार बनाया गया था। याचिका में जमीनी हकीकत का हवाला देते हुए तर्क दिया गया था कि देश के विभिन्न हिस्सों में स्कूली छात्र अक्सर हॉस्टलों और क्लासरूम्स में सीनियर छात्रों द्वारा शारीरिक उत्पीड़न, मानसिक प्रताड़ना और खतरनाक बुलिंग का शिकार होते हैं, जिससे कई बार मासूम बच्चों को अवसाद और आत्महत्या जैसे आत्मघाती कदम उठाने पड़ते हैं।
याचिका में केंद्र सरकार को यह निर्देश देने का आग्रह किया गया था कि वह स्कूलों के लिए एक विशेष केंद्रीय एंटी-रैगिंग कानून (Anti-Ragging Act) तैयार करे। इसके साथ ही, स्कूलों में छात्र शिकायतों के त्वरित और गोपनीय निपटारे के लिए एक सख्त मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) बनाने, अनिवार्य शिकायत निवारण समितियां गठित करने और नियमों की अवहेलना करने वाले स्कूलों की मान्यता रद्द करने जैसे कड़े प्रावधानों की वकालत की गई थी। इसके अतिरिक्त, याचिकाकर्ता ने यह महत्वपूर्ण सुझाव भी रखा था कि प्राथमिक और माध्यमिक कक्षाओं के पाठ्यक्रम में नैतिक शिक्षा और रैगिंग-विरोधी जागरूकता को एक अनिवार्य विषय के रूप में शामिल किया जाए, ताकि बच्चों में बचपन से ही एक-दूसरे के प्रति संवेदनशीलता और सम्मान की भावना विकसित हो सके।
सक्षम प्राधिकारियों के पाले में गेंद: अब सरकार और बोर्ड्स तय करेंगे एंटी-बुलिंग फ्रेमवर्क की रूपरेखा
सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका को औपचारिक रूप से खारिज किए जाने के बाद अब इस पूरे मामले की गेंद केंद्र सरकार, राज्यों और शिक्षा बोर्डों के पाले में चली गई है। अदालत द्वारा याचिकाकर्ता को सक्षम प्राधिकारियों के समक्ष प्रतिवेदन देने की दी गई छूट के तहत अब शिक्षाविदों और बाल अधिकार कार्यकर्ताओं की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय और राज्य स्तर के स्कूल शिक्षा बोर्ड इस दिशा में क्या कदम उठाते हैं। कई विशेषज्ञों का मानना है कि यद्यपि एक अलग केंद्रीय कानून की अनुपस्थिति है, फिर भी बाल संरक्षण आयोगों (NCPCR) और सीबीएसई द्वारा जारी परिपत्रों में रैगिंग और बुलिंग के खिलाफ बेहद कड़े प्रावधान पहले से तय हैं।
वर्तमान व्यवस्था के तहत स्कूलों में एंटी-बुलिंग कमेटियों का गठन अनिवार्य है, जिसमें शिक्षक, काउंसलर, अभिभावक और स्कूल प्रबंधन के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। अब याचिकाकर्ता इस व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और डिजिटल रिपोर्टिंग प्रणाली से जोड़ने के लिए केंद्र सरकार को अपना मांग पत्र सौंप सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा आदेश से यह संदेश पूरी तरह स्पष्ट हो चुका है कि मौजूदा नियमों को धरातल पर मजबूती से लागू करना ही बच्चों के लिए भयमुक्त शैक्षिक वातावरण तैयार करने का सबसे व्यावहारिक रास्ता है।