जहरीले स्मॉग वाली दिल्ली की हवा श्रीनगर और बेंगलुरु से बेहतर? 'स्वच्छ वायु सर्वेक्षण 2026' में 21वां स्थान मिलने का चौंकाने वाला सच

जहरीले स्मॉग वाली दिल्ली की हवा श्रीनगर और बेंगलुरु से बेहतर? 'स्वच्छ वायु सर्वेक्षण 2026' में 21वां स्थान मिलने का चौंकाने वाला सच

केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की तरफ से नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (NCAP) के तहत जारी 'स्वच्छ वायु सर्वेक्षण 2026' के हालिया नतीजों ने पर्यावरणविदों और आम नागरिकों दोनों को हैरान कर दिया है। हर साल सर्दियों में घने जहरीले स्मॉग और खतरनाक स्तर पर पहुंचने वाले एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) के लिए चर्चित देश की राजधानी दिल्ली ने 10 लाख से अधिक आबादी वाले 48 बड़े शहरों की श्रेणी में 21वां स्थान हासिल किया है।

दिल्ली को कुल 200 में से 172 अंक मिले हैं। सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि प्राकृतिक रूप से स्वच्छ और बेहतर हवा के लिए जाने जाने वाले शहर—जैसे श्रीनगर (26वां स्थान, 162.6 अंक) और 'गार्डन सिटी' बेंगलुरु (32वां स्थान, 152.6 अंक)—इस रैंकिंग में दिल्ली से काफी पीछे छूट गए हैं। पहली नजर में यह परिणाम विरोधाभासी और जमीनी हकीकत से परे नजर आता है, लेकिन इसके पीछे की वजह इस सर्वे की अनूठी मूल्यांकन प्रणाली और इसके तय मानक हैं।

क्यों हवा खराब होने के बावजूद आगे निकली दिल्ली? समझिए सर्वे का गणित

'स्वच्छ वायु सर्वेक्षण' दरअसल किसी शहर की रोजाना सांस लेने योग्य हवा या सिर्फ वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) की सीधी मेरिट लिस्ट नहीं है। यह सर्वेक्षण इस बात की पड़ताल करता है कि किसी शहर का स्थानीय प्रशासन प्रदूषण फैलाने वाले स्रोतों को रोकने और नियंत्रित करने के लिए योजनाबद्ध तरीके से कितने ठोस कदम उठा रहा है और उन्हें लागू करने में कितना तत्पर है।

सर्वेक्षण में अंक मुख्य रूप से इन छह प्रमुख क्षेत्रों के आधार पर दिए जाते हैं:

  • सड़कों की धूल नियंत्रण: मैकेनाइज्ड स्वीपिंग मशीनों और वाटर स्प्रिंकलर का इस्तेमाल।

  • ठोस कचरा प्रबंधन: कचरा एकत्रीकरण, 100% प्रोसेसिंग और लैंडफिल पर डंपिंग में कमी।

  • वाहन और औद्योगिक उत्सर्जन: पुराने वाहनों पर रोक, पीयूसी (PUC) जांच और फैक्ट्रियों में पीएनजी/सीएनजी का इस्तेमाल।

  • निर्माण और तोड़फोड़ (C&D) कचरा: मलबे का वैज्ञानिक निस्तारण और निर्माण स्थलों पर धूल-रोधी नियम।

  • बायोमास और पराली दहन पर रोक: खुले में कूड़ा-पत्तियां जलाने पर कड़े जुर्माने और निगरानी।

  • जन जागरूकता और शिकायत निवारण: नागरिकों को जागरूक करने और डिजिटल ऐप्स पर शिकायतों के त्वरित समाधान की व्यवस्था।

दिल्ली में सर्दियों में एक्यूआई भले ही 400 या 450 के पार 'गंभीर' (Severe) स्तर पर पहुंच जाता हो और ग्रैप के चौथे चरण (GRAP Stage-IV) की आपात पाबंदियां लगानी पड़ती हों, लेकिन ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान का कड़ा तंत्र, एंटी-स्मॉग गनों की भारी तैनाती, इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट का प्रबंधन और सड़कों की लगातार यांत्रिक सफाई के चलते दिल्ली ने प्रशासनिक अंक तालिका में तगड़ा स्कोर हासिल कर लिया। इसी वजह से वर्ष 2025 में 32वें स्थान (157.3 अंक) पर रहने वाली दिल्ली ने 11 पायदान की छलांग लगाकर 21वां स्थान हासिल किया।

नंबर-1 लखनऊ की हवा भी राष्ट्रीय मानकों से दूर

प्रशासनिक प्रयासों और वास्तविक सांस लेने योग्य हवा के बीच का अंतर सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं है, बल्कि शीर्ष पायदान पर काबिज शहरों में भी साफ दिखता है:

  • लखनऊ ने मारी बाजी: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ 198 अंकों के साथ पूरे देश में पहले पायदान पर रही और 1.5 करोड़ रुपये का शीर्ष पुरस्कार अपने नाम किया।

  • इंदौर और जबलपुर: लगातार स्वच्छता में अव्वल रहने वाला इंदौर 197 अंकों के साथ दूसरे और जबलपुर 195 अंकों के साथ तीसरे स्थान पर रहा।

लखनऊ को नंबर-1 का खिताब इसलिए मिला क्योंकि नगर निगम ने 100% सॉलिड वेस्ट प्रोसेसिंग, 1,100 से अधिक इलेक्ट्रिक कचरा गाड़ियां और वार्ड स्तर पर एंटी-पॉल्यूशन टास्क फोर्स उतारकर जमीनी क्रियान्वयन में शत-प्रतिशत अंक बटोरे। लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि लखनऊ की हवा में भी प्रदूषक तत्वों (PM10 और PM2.5) का औसत स्तर राष्ट्रीय परिवेशी मानक (60 μg/m³) से काफी ज्यादा दर्ज किया जाता है। यानी सिस्टम का प्रयास बेहतरीन है, मगर हवा अब भी साफ होनी बाकी है।

130 में से 108 शहरों में सुधार, पर मंजिल अभी दूर

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के आंकड़ों के मुताबिक, नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम के सकारात्मक परिणाम देश भर में दिखने शुरू हुए हैं:

  • PM10 में गिरावट: सर्वे में शामिल कुल 130 गैर-प्राप्ति (Non-Attainment) शहरों में से 108 शहरों ने वर्ष 2017-18 के मुकाबले अपने PM10 सांद्रता स्तर में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया है।

  • मानकों की चुनौती: हालांकि, चिंता की बात यह है कि 130 में से केवल 14 शहर ही राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों (NAAQS) की तय सीमा को पूरी तरह हासिल कर पाए हैं। बाकी शहरों में सुधार तो हुआ है, लेकिन हवा अभी भी सुरक्षित सीमा से बाहर है।

कागजी अंकों से आगे: दिल्लीवासियों को कब मिलेगी जहरीले स्मॉग से असली आजादी?

स्वच्छ वायु सर्वेक्षण 2026 में दिल्ली का 21वां स्थान हासिल करना इस बात की गवाही कतई नहीं देता कि यहां की हवा श्रीनगर की वादियों या बेंगलुरु के मौसम से अधिक शुद्ध हो गई है। यह सिर्फ इस बात का आईना है कि दिल्ली सरकार, एमसीडी और संबंधित एजेंसियां प्रदूषण की चुनौती से निपटने के लिए नीतियां बनाने और संसाधन झोंकने में अन्य राज्यों से ज्यादा सक्रिय रही हैं।

दिल्ली-एनसीआर के नागरिकों के लिए यह 21वीं रैंक केवल एक प्रशासनिक सांत्वना जैसी है। राजधानी के लोगों के लिए असली उपलब्धि उस दिन मानी जाएगी जब इन नीतियों, एंटी-स्मॉग गनों और मैकेनाइज्ड स्वीपिंग का असर फाइलों से निकलकर खुले आसमान में दिखेगा और अक्टूबर से जनवरी के बीच हर साल आंखों में चुभने वाले जहरीले स्मॉग के दिनों में स्थायी गिरावट दर्ज होगी।