2 चुनाव आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को लिखी थी गोपनीय चिट्ठी, जानिए उस खत पर क्या हुआ एक्शन

2 चुनाव आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को लिखी थी गोपनीय चिट्ठी, जानिए उस खत पर क्या हुआ एक्शन

देश की चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और स्वायत्तता की संरक्षक मानी जाने वाली संस्था 'भारत निर्वाचन आयोग' (Election Commission of India) के भीतर प्रशासनिक कामकाज और निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर उपजे आंतरिक असंतोष पर एक बड़ा खुलासा सामने आया है। प्राप्त दस्तावेजों और सूत्रों के अनुसार, दो चुनाव आयुक्तों ने आयोग के आंतरिक कामकाज, फाइलों के संचालन और महत्वपूर्ण निर्णयों में पारदर्शिता की कमी को लेकर केंद्र सरकार के सबसे वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी यानी कैबिनेट सचिव को एक औपचारिक और गोपनीय पत्र लिखा था।

संवैधानिक संस्था के भीतर इस तरह के पत्राचार के सार्वजनिक होने से प्रशासनिक और सियासी गलियारों में हलचल मच गई है। सवाल उठ रहे हैं कि जब आयोग खुद एक स्वायत्त संवैधानिक निकाय है, तो यह मामला कैबिनेट सचिव तक क्यों पहुंचा और उस पत्र पर सरकार व आयोग के भीतर क्या कार्रवाई हुई।

चिट्ठी में क्या उठाए गए थे मुद्दे? क्यों नाराज थे दोनों चुनाव आयुक्त?

खुलासे के अनुसार, दोनों आयुक्तों की मुख्य आपत्ति आयोग के रोजमर्रा के फैसलों और नीतिगत मामलों में अपनाई जा रही कार्यशैली को लेकर थी:

  • निर्णय प्रक्रिया में दरकिनार किए जाने का आरोप: पत्र में संकेत दिया गया था कि कई नीतिगत मसलों, संवेदनशील जांचों और आयोग के अहम परिपत्रों को अंतिम रूप देते समय सभी सदस्यों की औपचारिक बैठक या सर्वसम्मति लेने की स्थापित परंपरा की अनदेखी की जा रही थी।

  • आयोग के कोरम और 'समान अधिकार' की मर्यादा: चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक, मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य दो चुनाव आयुक्तों के पास निर्णय लेने के समान अधिकार होते हैं और मतभेद की स्थिति में बहुमत से निर्णय होता है। आयुक्तों ने रेखांकित किया कि फाइलों का मूवमेंट केवल एकतरफा नहीं होना चाहिए, बल्कि हर अहम फैसले पर तीनों सदस्यों का साझा विमर्श दर्ज होना जरूरी है।

  • पारदर्शिता और रिकॉर्ड कीपिंग: आयोग की बैठकों के मिनट्स (कार्रवाई विवरण) और असहमति के स्वरों (Dissent Notes) को आधिकारिक फाइलों में दर्ज करने की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने पर जोर दिया गया था।

आखिर उस गोपनीय खत का क्या हुआ? हुआ यह बड़ा खुलासा

कैबिनेट सचिव को पत्र भेजे जाने के बाद इस पूरे मामले पर सरकार और आयोग के स्तर पर क्या कदम उठाए गए, इसका ब्योरा अब सामने आया है:

  • संविधान की सीमाओं का ध्यान और अनौपचारिक मध्यस्थता: चूंकि निर्वाचन आयोग अनुच्छेद 324 के तहत एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है, इसलिए कैबिनेट सचिवालय या सरकार सीधे तौर पर आयोग के आंतरिक विवादों में लिखित या आधिकारिक हस्तक्षेप नहीं कर सकती थी। ऐसे में कैबिनेट सचिवालय ने पत्र को संज्ञान में लेते हुए इसे संस्था की आंतरिक स्वायत्तता का मामला माना।

  • आंतरिक परामर्श और फुल-कमीशन बैठकें बहाल: पत्र के बाद आयोग के भीतर उच्च स्तर पर बातचीत का दौर शुरू हुआ। इसके परिणामस्वरूप यह सहमति बनी कि आयोग से जुड़ा कोई भी बड़ा नीतिगत फैसला, आचार संहिता के उल्लंघन की समीक्षा या चुनावी सुधारों से जुड़ी फाइलें केवल औपचारिक 'फुल कमीशन' (तीनों आयुक्तों की मौजूदगी) की बैठक में ही तय की जाएंगी।

  • फाइल फ्लो की नई कार्यप्रणाली: इस पत्राचार के बाद फाइलों के रूटिंग सिस्टम में सुधार किया गया, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि फील्ड से आने वाली संवेदनशील शिकायतें और नीतिगत मसौदे तीनों आयुक्तों के अवलोकन के बाद ही सार्वजनिक किए जाएं।

पहले भी उठते रहे हैं आयोग के भीतर असहमति के सुर

यह पहला मौका नहीं है जब निर्वाचन आयोग के भीतर मतभेद खुलकर सामने आए हों। इससे पहले भी आदर्श आचार संहिता (MCC) के उल्लंघनों की जांच और फैसलों के दौरान आयुक्तों के बीच असहमति के नोट दर्ज किए जाने को लेकर लंबी बहस छिड़ चुकी है।

सुप्रीम कोर्ट भी कई मौकों पर यह दोहरा चुका है कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता इस बात पर टिकी है कि वह एक 'कोलेजिएट बॉडी' (सामूहिक निकाय) के रूप में कार्य करे, न कि किसी एक पद के इर्द-गिर्द केंद्रित संस्था के रूप में। इस खुलासे के बाद एक बार फिर यह बहस तेज हो गई है कि निर्वाचन आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया को अधिक संस्थागत और वैधानिक सुरक्षा दी जानी चाहिए ताकि किसी भी मतभेद की स्थिति में संस्था की गरिमा पर कोई आंच न आए।