क्या भारत में बिकेगी पाकिस्तान की चीनी? ललचाई आंखों से भारतीय बाजार को देख रहे पाकिस्तानी मिल मालिक; शहबाज शरीफ सरकार से लगाई निर्यात की गुहार
भारत में आगामी त्योहारी सीजन से पहले चीनी की खुदरा कीमतें ₹69 से ₹70 प्रति किलोग्राम तक पहुंचने और केंद्र सरकार द्वारा 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी के शुल्क मुक्त (Duty-Free) आयात की अनुमति दिए जाने के बाद पड़ोसी देश पाकिस्तान में अचानक भारी सुगबुगाहट शुरू हो गई है। आर्थिक तंगी, विदेशी मुद्रा भंडार के संकट और चीनी के विशाल अधिशेष (Surplus Stock) से जूझ रहे पाकिस्तानी चीनी मिल मालिकों की नजरें अब ललचाई आंखों से भारत के विशाल उपभोक्ता बाजार पर टिक गई हैं। पाकिस्तान शुगर मिल्स एसोसिएशन (PSMA) के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की सरकार को सीधा संदेश भेजते हुए गुहार लगाई है कि उन्हें तुरंत 12 लाख टन अतिरिक्त चीनी भारत को निर्यात करने की अनुमति दी जाए।
12 लाख टन अतिरिक्त स्टॉक का दबाव और $600 मिलियन की कमाई की आस
पाकिस्तान के चीनी उद्योग के सामने इस समय नकदी का भारी संकट खड़ा हो गया है। पाकिस्तान शुगर मिल्स एसोसिएशन (PSMA) से जुड़े वरिष्ठ प्रतिनिधि और हुंजा शुगर मिल्स के चौधरी मुहम्मद वहीद के अनुसार, 15 अगस्त तक पाकिस्तान के पास लगभग 28.1 लाख टन चीनी का कुल स्टॉक मौजूद है, जबकि वहां की घरेलू मासिक खपत औसतन 5.5 लाख टन ही है।
दिसंबर के आखिर तक घरेलू मांग पूरी करने के बाद भी पाकिस्तान के पास 1.2 मिलियन टन (12 लाख टन) से अधिक अतिरिक्त चीनी बची हुई है। नवंबर से नया पेराई सत्र (Crushing Season) शुरू होने वाला है और अगर यह पुराना स्टॉक नहीं निकला, तो मिलों के पास नकदी का भारी संकट हो जाएगा और वे किसानों को गन्ने का भुगतान नहीं कर पाएंगी। पाकिस्तानी मिल मालिकों का दावा है कि यदि शहबाज शरीफ सरकार भारत को यह चीनी बेचने की मंजूरी दे देती है, तो पाकिस्तान को बैठे-बिठाए 600 मिलियन डॉलर (लगभग ₹5,000 करोड़) की कीमती विदेशी मुद्रा हासिल हो सकती है।
भारत को क्यों मुफीद बाजार मान रहे हैं पाकिस्तानी निर्यातक?
पाकिस्तानी शुगर लॉबी का तर्क है कि भौगोलिक निकटता के कारण पाकिस्तान भारत को चीनी आपूर्ति करने के लिए सबसे मुफीद स्थिति में है:
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कम मालभाड़ा (Freight Cost Advantage): ब्राजील या थाईलैंड जैसे सुदूर देशों की तुलना में पाकिस्तान से सड़क या समुद्री मार्ग के जरिए भारत तक चीनी पहुंचाना बेहद सस्ता और तेज होगा।
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भारतीय बाजार की तात्कालिक जरूरत: भारत में खुदरा कीमतें ₹70 छू रही हैं और भारत सरकार ने 31 अक्टूबर तक आयात की खिड़की खोली है। ऐसे में पाकिस्तानी चीनी भारतीय बाजार में प्रतिस्पर्धी दामों पर पहुंच सकती है।
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कर्ज में डूबी अर्थव्यवस्था को सहारा: आईएमएफ के कड़े बेलआउट पैकेज और खाड़ी देशों से घटती मदद के बीच 600 मिलियन डॉलर की कमाई शहबाज सरकार के खाली खजाने के लिए संजीवनी साबित हो सकती है।
क्या भारत खरीदेगा पाकिस्तान से चीनी? कूटनीतिक दीवार सबसे बड़ी बाधा
पाकिस्तानी मिल मालिकों की यह मांग भले ही आर्थिक दृष्टिकोण से उनके लिए फायदेमंद दिख रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि भारत द्वारा पाकिस्तान से चीनी आयात किए जाने की संभावना न के बराबर है:
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व्यापारिक रिश्तों पर पूर्ण विराम: भारत और पाकिस्तान के बीच अगस्त 2019 के बाद से ही प्रत्यक्ष द्विपक्षीय व्यापार लगभग ठप पड़ा हुआ है।
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200% बेसिक कस्टम ड्यूटी: भारत ने पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान को दिया गया मोस्ट फेवर्ड नेशन (MFN) का दर्जा वापस ले लिया था और वहां से आने वाले सामानों पर 200% की भारी बेसिक कस्टम ड्यूटी लगाई हुई है। इस भारी शुल्क के चलते पाकिस्तानी चीनी का भारतीय बाजार में बिकना व्यावहारिक रूप से असंभव है।
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सुरक्षा और सीमा पार तनाव: हालिया सीमा पार तनाव और आतंकवाद के मुद्दे पर भारत का स्पष्ट रुख रहा है कि 'आतंक और व्यापार एक साथ नहीं चल सकते।'
शहबाज सरकार के लिए 'इधर कुआं, उधर खाई' की स्थिति
प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के लिए अपने ही देश के चीनी मिल मालिकों की यह मांग गले की फांस बन गई है। राजनीतिक रूप से कमजोर शहबाज सरकार भारत से व्यापार शुरू करने की पहल करके देश के भीतर कट्टरपंथियों और विपक्षी दलों के निशाने पर नहीं आना चाहती। वहीं दूसरी तरफ, यदि 12 लाख टन चीनी का समय पर निर्यात नहीं हुआ, तो पाकिस्तानी मिलों के दिवालिया होने और किसानों के सड़क पर उतरने का खतरा मंडरा रहा है। यही वजह है कि पाकिस्तानी चीनी लॉबी भारतीय बाजार की मिठास देखकर लगातार इस्लामाबाद पर दबाव बना रही है।