'1984 के पीड़ितों से कब मांगेंगे माफी...', संगरूर में राहुल गांधी की रैली पर भाजपा सांसद रविशंकर प्रसाद का करारा प्रहार
चंडीगढ़: पंजाब की चुनावी सियासत में एक बार फिर 1984 के सिख विरोधी दंगों का दर्द और उससे जुड़े अनसुलझे राजनीतिक सवाल केंद्र में आ गए हैं। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी द्वारा पंजाब के संगरूर से अपनी राजनीतिक मुहिम की शुरुआत किए जाने के तुरंत बाद भारतीय जनता पार्टी ने आक्रामक रुख अपनाते हुए सीधा पलटवार किया है। पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री और पटना साहिब से लोकसभा सांसद रविशंकर प्रसाद ने चंडीगढ़ में आयोजित एक विशेष सम्मेलन में राहुल गांधी और गांधी परिवार से कड़े सवाल पूछे। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में पूछा कि देश भर में न्याय और इंसाफ की बात करने वाले राहुल गांधी 1984 के निर्दोष सिख पीड़ितों और उनके बिलखते परिवारों से आज तक बिना शर्त सार्वजनिक माफी कब मांगेंगे?
चंडीगढ़ में 'ज़ख़्म 84 दे' सम्मेलन और कांग्रेस पर चौतरफा घेराबंदी
भाजपा की पंजाब इकाई द्वारा चंडीगढ़ में 'ज़ख़्म 84 दे' (Zakhm 84 De) शीर्षक से एक विशेष राज्यस्तरीय सम्मेलन आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य 1984 के दंगों के चार दशक बीत जाने के बाद भी पीड़ितों की अधूरी कानूनी लड़ाई, ऐतिहासिक अन्याय और नई पीढ़ी को उस दौर की बर्बरता से रूबरू कराना था। मंच पर पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद के साथ पंजाब भाजपा अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों, पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव एवं पंजाब प्रभारी डॉ. सतीश पूनिया और राष्ट्रीय प्रवक्ता आरपी सिंह सहित कई वरिष्ठ नेता मौजूद थे।
सम्मेलन की शुरुआत 1984 के कत्लेआम में अपनी जान गंवाने वाले हजारों निर्दोष लोगों की आत्मिक शांति और उनके आश्रितों को मुकम्मल इंसाफ मिलने की कामना के साथ एक सामूहिक अरदास से हुई। इसके बाद नेताओं ने उस दौर की बर्बरता को उजागर करती एक विस्तृत फोटो प्रदर्शनी का औपचारिक अवलोकन किया। वातावरण पूरी तरह से गंभीर और विचारोत्तेजक था, जहां वक्ताओं ने केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित न रहकर कानूनी और ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर कांग्रेस की तत्कालीन और वर्तमान भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए।
'जब बड़ा पेड़ गिरता है...' बयान की याद और गांधी परिवार से जवाबदेही
मंच से सभा को संबोधित करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता और सांसद रविशंकर प्रसाद ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के उस चर्चित बयान का खुलकर उल्लेख किया, जो उन्होंने 1984 के नरसंहार के ठीक बाद दिया था। प्रसाद ने कहा कि राजीव गांधी ने सार्वजनिक मंच से कहा था कि 'जब एक बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती थोड़ी हिलती ही है'। भाजपा नेता ने कहा कि यह कोई सामान्य राजनीतिक टिप्पणी नहीं थी, बल्कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली सहित देश के अलग-अलग हिस्सों में जिंदा जला दिए गए, कत्ल कर दिए गए हजारों निर्दोष सिखों की हत्याओं को व्यवस्था द्वारा खुलेआम जायज ठहराने की अमानवीय कोशिश थी।
रविशंकर प्रसाद ने याद दिलाया कि जब वह पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री थे, तब उन्होंने संसद और देश के सामने इस ऐतिहासिक तथ्य की प्रामाणिकता साबित करने के लिए राजीव गांधी के उस विवादित भाषण के मूल ऑडियो-वीडियो फुटेज को दूरदर्शन के अभिलेखागार से निकलवाकर सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा बनवाया था। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या राहुल गांधी अपने पिता के उस असंवेदनशील बयान से खुद को अलग करने का साहस दिखा सकते हैं? क्या वह देश की संसद या पंजाब की पावन धरती पर खड़े होकर यह स्वीकार करेंगे कि 1984 में जो कुछ हुआ, वह एक भयानक राज्य-प्रायोजित अपराध था जिसके लिए गांधी परिवार को शीश झुकाकर माफी मांगनी चाहिए?
'लटकाना, भटकाना और झटकाना': चार दशक तक मुख्य आरोपियों को संरक्षण का आरोप
रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस पार्टी की कार्यप्रणाली पर तीखा प्रहार करते हुए आरोप लगाया कि पिछले चार दशकों से कांग्रेस नेतृत्व का एक ही सूत्र वाक्य रहा है—मामलों को लटकाना, जांच को भटकाना और पीड़ितों को झटका देना। उन्होंने कहा कि नरसंहार के मुख्य सूत्रधारों के रूप में जिन नेताओं के नाम सार्वजनिक रूप से सामने आए—चाहे वे सज्जन कुमार हों, जगदीश टाइटलर हों या कमलनाथ—कांग्रेस ने उन्हें सजा दिलाने के बजाय दशकों तक सत्ता के शीर्ष पदों से नवाजा, सांसद और मंत्री बनाया और पार्टी का कद्दावर चेहरा बनाए रखा।
वरिष्ठ भाजपा सांसद ने अदालत के दस्तावेजों का हवाला देते हुए कहा कि कांग्रेस सरकारों के कार्यकाल में पुलिस थानों में प्राथमिकियां (FIR) तक दर्ज नहीं होने दी गईं। जांच आयोगों की रिपोर्टों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया और गवाहों को डराने-धमकाने का खुला खेल खेला गया। उन्होंने कहा कि जो पार्टी चालीस साल तक हत्यारों की ढाल बनकर खड़ी रही, आज उसके नेता पंजाब में आकर नैतिकता और इंसाफ का ढोंग रच रहे हैं, जिसे पंजाब का जागरूक समाज कभी स्वीकार नहीं करेगा।
नरेंद्र मोदी सरकार की एसआईटी और जस्टिस ढींगरा समिति से खुला न्याय का रास्ता
अपने भाषण में रविशंकर प्रसाद ने 2014 के बाद केंद्र सरकार द्वारा पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए उठाए गए ठोस प्रशासनिक और कानूनी कदमों का सिलसिलेवार ब्योरा दिया। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद ही 1984 के बंद कर दिए गए मामलों को दोबारा खोलने के लिए एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया गया था। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जस्टिस एस. एन. ढींगरा समिति की महत्वपूर्ण सिफारिशों को अक्षरशः लागू किया गया।
प्रसाद ने कहा कि इसी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच का ऐतिहासिक परिणाम रहा कि कांग्रेस के कद्दावर नेता सज्जन कुमार को अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई और वह आज जेल की सलाखों के पीछे अपने कर्मों का फल भुगत रहे हैं। इसके अतिरिक्त जगदीश टाइटलर के खिलाफ आरोप तय हुए और उनके खिलाफ कानूनी शिकंजा कसा गया। उन्होंने इस लंबी और बेहद जोखिम भरी कानूनी लड़ाई को दशकों तक निस्वार्थ भाव से लड़ने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता एच. एस. फूलका और पीड़ित परिवारों के अदम्य साहस की मंच से सार्वजनिक रूप से भूरि-भूरि प्रशंसा की।
पंजाब की आत्मा पर दो नासूर: 1984 का कत्लेआम और नशाखोरी का जाल
रविशंकर प्रसाद ने पंजाब के वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य पर बात करते हुए कहा कि सीमांत राज्य पंजाब की आत्मा पर आज भी दो गहरे और दुखते जख्म मौजूद हैं। पहला गहरा जख्म नवंबर 1984 के कत्लेआम का है, जिसके न्याय की प्रतीक्षा में पीढ़ियां गुजर गईं। वहीं दूसरा नासूर पंजाब की नौजवानी को दीमक की तरह चाट रही नशाखोरी की गंभीर समस्या है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक 1984 के हर एक गुनाहगार को उसके अंजाम तक नहीं पहुंचा दिया जाता, तब तक पहला जख्म पूरी तरह नहीं भर सकता। वहीं दूसरी ओर राज्य में कानून-व्यवस्था के पतन और नशे के अवैध नेटवर्क पर जब तक सख्त प्रशासनिक प्रहार नहीं होता, तब तक पंजाब का आर्थिक और सामाजिक पुनरुत्थान संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि दोनों ही मामलों में कांग्रेस और उसके परवर्ती राजनीतिक दलों ने केवल भावनात्मक शोषण किया है, जबकि जमीनी स्तर पर समाधान देने की इच्छाशक्ति सिर्फ मौजूदा केंद्र सरकार ने दिखाई है।
संगरूर रैली की टाइमिंग पर सवाल: पीड़ितों के जख्मों पर नमक छिड़कने की सियासत?
राहुल गांधी द्वारा संगरूर में आयोजित की गई रैली और हालिया राजनीतिक आयोजनों की तारीखों पर भी भाजपा ने कड़ा ऐतराज जताया। भाजपा नेताओं ने कहा कि पूरा सिख समुदाय 1 नवंबर से 4 नवंबर के दिनों को काले दिवस और शोक के रूप में याद करता है। यह वह दौर था जब दिल्ली के त्रिलोकपुरी, सुल्तानपुरी, मंगोलपुरी और कनाट प्लेस की सड़कों पर बेगुनाहों का खून बहाया जा रहा था।
नेताओं ने सवाल किया कि क्या राहुल गांधी के पास अपने शक्ति प्रदर्शन के लिए इन तारीखों के अलावा कोई अन्य समय नहीं था? पीड़ित परिवारों के घाव जब हर साल नवंबर के पहले हफ्ते में हरे हो जाते हैं, तब उसी दौर में पंजाब की धरती पर चुनावी शंखनाद करना संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। पंजाब भाजपा अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों ने भी सभा को संबोधित करते हुए कहा कि कांग्रेस पार्टी को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वह देश भर में संविधान की प्रति लहराने से पहले 1984 में नागरिकों के जीने के मूल अधिकार और संविधान की हुई सरेआम हत्या पर क्या रुख रखती है।
त्रिलोकपुरी से कनाट प्लेस तक: प्रदर्शनी में दिखी 1984 की दिल दहलाने वाली दास्तान
चंडीगढ़ के आयोजन स्थल पर लगाई गई विशेष फोटो प्रदर्शनी ने वहां मौजूद हर शख्स को झकझोर कर रख दिया। इस प्रदर्शनी में नवंबर 1984 के दौरान राष्ट्रीय राजधानी के त्रिलोकपुरी ब्लॉक-32 में खाक किए गए मकानों, कनाट प्लेस और चांदनी चौक में धू-धू कर जलती दुकानों, लूटे गए गुरुद्वारों और बेसहारा होकर शरणार्थी शिविरों में बैठी रोती-बिलखती विधवाओं और अनाथ बच्चों के दुर्लभ ऐतिहासिक छायाचित्र प्रदर्शित किए गए थे।
प्रदर्शनी का अवलोकन करते हुए भाजपा नेताओं ने पीड़ित परिवारों के प्रतिनिधियों से भी मुलाकात की और उन्हें आश्वस्त किया कि केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी इस कानूनी लड़ाई को आखिरी मुकाम तक ले जाने के लिए प्रतिबद्ध है। पार्टी प्रवक्ता आरपी सिंह ने कहा कि जब तक 1984 के नरसंहार की साजिश रचने वाला अंतिम साजिशकर्ता भी सलाखों के पीछे नहीं पहुंच जाता, तब तक यह संघर्ष किसी भी सूरत में रुकने वाला नहीं है। भाजपा के इस आक्रामक रुख ने साफ कर दिया है कि पंजाब की आगामी चुनावी जंग में 1984 का इंसाफ, ऐतिहासिक जवाबदेही और पीड़ितों की पीड़ा एक बेहद अहम सियासी मुद्दा बने रहेंगे।