बटेश्वर मेले में आए 'बादल' और 'चेतक', BMW से भी महंगे मारवाड़ी और गुलजार लाइन नस्ल के घोड़े, मालिक का चैलेंज
उत्तर प्रदेश के आगरा जिले में यमुना नदी के तट पर आयोजित होने वाले 400 साल से भी अधिक पुराने और ऐतिहासिक बटेश्वर पशु मेले (Bateshwar Fair) में इन दिनों गजब का उत्साह और लग्जरी का अनोखा नजारा देखने को मिल रहा है। कार्तिक पूर्णिमा के पावन अवसर पर लगने वाले इस भव्य मेले में जहां देशभर से लाखों श्रद्धालु और व्यापारी जुटते हैं, वहीं इस बार मेले की सबसे बड़ी शान और आकर्षण का केंद्र बने हैं दो बेहद खास और बेशकीमती घोड़े, जिनका नाम 'बादल' और 'चेतक' रखा गया है। मारवाड़ी (Marwari) और गुलजार (Gulzar Line) की दुर्लभ व शुद्ध नस्ल से ताल्लुक रखने वाले इन घोड़ों की खूबसूरती, कद-काठी और शाही चाल को देखकर मेले में आए लोग दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर हो गए हैं। इनकी कीमत इतनी ज्यादा आंकी गई है कि वह किसी भी लग्जरी कार जैसे बीएमडब्ल्यू (BMW) या मर्सिडीज (Mercedes) की कीमत को भी बहुत पीछे छोड़ देती है। इन दोनों अनमोल घोड़ों को देखने के लिए सुबह से ही बटेश्वर मेले के पशु पंडालों के बाहर हजारों शौकीनों और आम लोगों की भारी भीड़ उमड़ रही है।
मारवाड़ी और गुलजार नस्ल की अनोखी खासियत, बीएमडब्ल्यू से भी ज्यादा महंगी है इन घोड़ों की आंकी गई कीमत
बटेश्वर मेले में लाए गए 'बादल' और 'चेतक' नाम के ये दोनों घोड़े कोई आम जानवर नहीं हैं, बल्कि यह भारतीय अश्व नस्लों की सबसे प्रतिष्ठित और दुर्लभ श्रेणियों में शुमार किए जाते हैं। मारवाड़ी नस्ल के घोड़ों की सबसे बड़ी पहचान उनके अंदर की तरफ मुड़े हुए खूबसूरत कान, सुडौल गर्दन, मजबूत छाती और अत्यधिक वफादार स्वभाव होता है। वहीं गुलजार लाइन (Gulzar Breed Line) के घोड़ों की शारीरिक बनावट, चमकदार त्वचा, लंबी छलांग और तेज रफ्तार उन्हें पूरी दुनिया के अश्व पालकों (Horse Breeders) की पहली पसंद बनाती है। इनके मालिक ने मीडिया से बातचीत करते हुए बताया कि इन दोनों घोड़ों के रखरखाव, डाइट और प्रशिक्षण पर हर महीने लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं। इनके खाने में शुद्ध देशी घी, बादाम, चना, दूध और विशेष प्रकार के पौष्टिक चारे शामिल होते हैं। जब मेले में व्यापारियों और रईस शौकीनों ने इन घोड़ों को खरीदने की इच्छा जाहिर की, तो इनकी आंकी गई कीमत सुनकर सभी हैरान रह गए। दोनों घोड़ों की बाजार में संभावित बोली करोड़ों रुपये तक पहुंच चुकी है, जो बाजार में बिकने वाली टॉप-मॉडल बीएमडब्ल्यू कार से भी अधिक महंगी है।
'अगर इस कद-काठी और नस्ल का दूसरा घोड़ा पूरे मेले में मिल जाए तो मान जाऊं', मालिक का खुला चैलेंज
घोड़ों के मालिक ने बटेश्वर मेले के मंच से एक ऐसा खुला चैलेंज (Open Challenge) दे दिया है, जिसने पूरे मेले का माहौल और अधिक गरमा दिया है। गर्व से लबरेज मालिक ने मेले में आए सभी पशुपालकों, व्यापारियों और दूर-दराज से आए जमींदारों को चुनौती देते हुए कहा है कि अगर पूरे उत्तर प्रदेश या देश के किसी भी कोने से लाया गया कोई भी व्यक्ति 'बादल' और 'चेतक' जैसी ऊंचाई, राजसी चाल, बिना दाग वाली चमकदार रंगत और शुद्ध गुलजार-मारवाड़ी नस्ल का दूसरा घोड़ा इस मेले में खोजकर दिखा दे, तो वे मान जाएंगे। मालिक का कहना है कि ये दोनों घोड़े केवल बिक्री के लिए नहीं लाए गए हैं, बल्कि भारतीय संस्कृति और हमारी ऐतिहासिक अश्व धरोहर के गौरव को प्रदर्शित करने के लिए इस प्राचीन मेले में उतारे गए हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे इन घोड़ों को किसी भी कीमत पर बेचने के मूड में नहीं हैं, क्योंकि ये उनके परिवार की शान और विरासत का हिस्सा बन चुके हैं।
400 साल पुराने ऐतिहासिक बटेश्वर मेले की चमक हुई दोगुनी, दूर-दूर से खिंचे चले आ रहे हैं अश्व प्रेमी
आगरा के बाह क्षेत्र में स्थित बटेश्वर मेला सदियों से अपने धार्मिक महत्व और देश के सबसे बड़े पशु मेलों में से एक होने के लिए प्रसिद्ध रहा है। यहां भगवान शिव के 101 मंदिरों की श्रृंखला के दर्शन करने के साथ-साथ लोग घोड़ों, ऊंटों, हाथियों और बेहतरीन नस्ल के मवेशियों का व्यापार करने आते हैं। लेकिन इस बार 'बादल' और 'चेतक' की मौजूदगी ने मेले की चमक में चार चांद लगा दिए हैं। राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश और बिहार से आए बड़े-बड़े राजा-रजवाड़ों के वंशज और आधुनिक हॉर्स ब्रीडर्स केवल इन दो घोड़ों के साथ अपनी फोटो खिंचवाने और उनकी चाल देखने के लिए बटेश्वर पहुंच रहे हैं। मेले के सुरक्षाकर्मियों को भीड़ को नियंत्रित करने के लिए विशेष बैरिकेड्स लगाने पड़े हैं ताकि कोई भी अवांछित स्थिति पैदा न हो और लोग शांतिपूर्वक इन दुर्लभ जानवरों का दीदार कर सकें।
निष्कर्ष: भारतीय अश्व विरासत और सांस्कृतिक गौरव का सबसे बड़ा प्रतीक बना बटेश्वर मेला
संक्षेप में कहें तो ऐतिहासिक बटेश्वर मेले में आए मारवाड़ी और गुलजार लाइन के 'बादल' और 'चेतक' घोड़ों ने यह साबित कर दिया है कि आज के आधुनिक दौर में भी भारतीय नस्ल के जानवरों का कोई मुकाबला नहीं है। बीएमडब्ल्यू से भी अधिक कीमती इन घोड़ों की राजसी शान और मालिक के खुले चैलेंज ने इस साल के बटेश्वर मेले को इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए यादगार बना दिया है।