किसानों की आमदनी बढ़ाने का नया जरिया: गोशालाओं के लिए खेतों से सीधा हरा चारा खरीदेगी सरकार

किसानों की आमदनी बढ़ाने का नया जरिया: गोशालाओं के लिए खेतों से सीधा हरा चारा खरीदेगी सरकार

उत्तर प्रदेश के ग्रामीण अंचल में अन्नदाताओं की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करने और गोवंश के बेहतर स्वास्थ्य प्रबंधन को लेकर राज्य सरकार ने एक नई और ऐतिहासिक पहल धरातल पर उतार दी है। गोआश्रय स्थलों यानी कान्हा गोशालाओं और ग्रामीण गोसंरक्षण केंद्रों में संरक्षित बेसहारा पशुओं को अब साल के बारहों महीने पौष्टिक और ताजा हरा चारा उपलब्ध कराया जाएगा। इसके लिए बाहरी निजी फर्मों पर निर्भर रहने के बजाय स्थानीय स्तर पर गांवों के मेहनती किसानों से सीधा अनुबंध (एग्रीमेंट) करने की रणनीति बनाई गई है। जनपद जौनपुर से शुरू हुई इस अभिनव योजना के तहत गोशालाओं के आसपास स्थित गांवों के किसानों के खेतों में उगाया जाने वाला हरा चारा सरकार खुद सीधे तय दरों पर खरीदेगी। इस व्यवस्था से जहां एक ओर सरकारी गोशालाओं में रह रहे मवेशियों को पौष्टिक आहार मिलने से उनकी सेहत में तेजी से सुधार होगा, वहीं दूसरी ओर पारंपरिक खेती के साथ-साथ हरा चारा उगाकर किसान अपनी नियमित आमदनी में बंपर इजाफा कर सकेंगे।

2 से 3 रुपये प्रति किलो की दर से सीधा भुगतान, बड़ी कंपनियों के टेंडर का एकाधिकार खत्म

पशुपालन विभाग और स्थानीय जिला प्रशासन द्वारा तैयार की गई नई नीति के अनुसार गोआश्रय स्थलों के नजदीक रहने वाले प्रगतिशील किसानों से अनुबंध कर उन्हें हरा चारा उगाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। सरकार किसानों से हरा चारा 2 रुपये से लेकर 3 रुपये प्रति किलोग्राम की निर्धारित दर पर सीधे खरीदेगी। किसान अपनी मुख्य फसलों के साथ ही मेड़ों, खाली पड़े खेतों या अतिरिक्त रकबे में नेपियर घास, बरसीम, चरी और ज्वार जैसे अत्यधिक पौष्टिक हरे चारे की बुवाई करेंगे। इसके बाद गोआश्रय स्थलों की दैनिक आवश्यकता और मांग के आधार पर किसान सीधे अपने खेतों से काटकर गोशालाओं तक चारे की ताजी आपूर्ति सुनिश्चित करेंगे। अब तक गोशालाओं में सूखा भूसा और साइलेज की भारी आपूर्ति के लिए बड़ी-बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों और बड़े ठेकेदारों को लाखों-करोड़ों के टेंडर जारी किए जाते थे, जिससे सरकारी खजाने का बड़ा हिस्सा बिचौलियों की जेब में चला जाता था। इस नई व्यवस्था ने कॉरपोरेट कंपनियों के एकाधिकार को पूरी तरह समाप्त कर दिया है, जिससे सीधे गांव के छोटे और सीमांत किसानों को उनकी उपज का नकद भुगतान मिलेगा और ग्रामीण स्तर पर स्थानीय रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।

जौनपुर में 30 किसानों से 35 हेक्टेयर का हुआ अनुबंध, पूर्वांचल के अन्य जिलों के लिए बना मॉडल

इस कल्याणकारी योजना के पहले चरण में पूर्वांचल के जौनपुर जिले ने अभूतपूर्व सफलता हासिल करते हुए राज्य के सामने एक मिसाल कायम की है। जनपद में अब तक लगभग 30 उत्साही किसानों के साथ कुल 35 हेक्टेयर भूमि पर पूरे साल हरा चारा उगाने और गोआश्रयों को आपूर्ति करने का औपचारिक अनुबंध सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है। प्रशासन का लक्ष्य आने वाले महीनों में इस दायरे को और अधिक विस्तारित करना है ताकि जिले के सभी ब्लॉकों में गोशालाओं के 5 किलोमीटर के दायरे में स्थित किसानों को इस नेटवर्क से जोड़ा जा सके। अनुबंध करने वाले किसानों का कहना है कि गेहूं और धान जैसी फसलों की तुलना में हरे चारे की फसलें बहुत कम समय में तैयार हो जाती हैं और इनकी कई बार कटाई की जा सकती है, जिससे हर महीने एक बंधी-बंधाई और सुनिश्चित आय उनके बैंक खातों में ट्रांसफर होगी। जौनपुर मॉडल की सफलता को देखते हुए प्रदेश के अन्य जिलों में भी इसी तर्ज पर किसानों के साथ सीधे एग्रीमेंट करने की प्रशासनिक प्रक्रिया तेज कर दी गई है।

68 गोशालाओं के 11750 गोवंश को मिलेगा पौष्टिक आहार, सूखे भूसे से मिलेगी मुक्ति

जौनपुर जनपद के आधिकारिक प्रशासनिक आंकड़ों के अनुसार वर्तमान में जिले की 68 सक्रिय गोशालाओं में कुल 11,750 निराश्रित गोवंश को आश्रय दिया गया है। अब तक की व्यवस्था में इन गोआश्रयों में संरक्षित पशुओं को आहार के नाम पर मुख्य रूप से केवल चार किलोग्राम सूखा भूसा ही प्रतिदिन परोसा जाता था। लगातार महीनों तक केवल सूखा भूसा खाने की वजह से जहां मवेशी उसे चाव से नहीं खाते थे और आधा भूसा खुरली में ही बर्बाद हो जाता था, वहीं आवश्यक विटामिन, मिनरल्स और प्रोटीन से युक्त पौष्टिक आहार के अभाव में गोवंश अत्यधिक कमजोर, कुपोषित और बीमारियों के शिकार हो रहे थे। सूखे चारे की इस गंभीर समस्या को दूर करने के लिए प्रशासन ने अब गोशालाओं में सूखे भूसे के साथ-साथ उच्च गुणवत्ता वाला साइलेज और खेतों से आया ताजा हरा चारा मिलाकर संतुलित आहार देने की अनिवार्य व्यवस्था पूरी तरह लागू कर दी है। हरा चारा आसानी से पचने योग्य होता है, जिससे दुधारू पशुओं के दूध उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ अन्य मवेशियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कई गुना मजबूत होगी।

गो-संरक्षण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को जोड़ेगा सरकार का यह नया विजन

सरकार का यह कदम केवल पशु कल्याण तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बहुत बड़ा रणनीतिक कदम है। जब गोशालाओं का संचालन स्थानीय किसानों की आजीविका से सीधे जुड़ जाएगा, तो समाज की गोशालाओं के प्रति संवेदनशीलता और जवाबदेही अपने आप कई गुना बढ़ जाएगी। किसानों को अपने ही गांव के गोआश्रय स्थल से नियमित बिक्री का पक्का बाजार उपलब्ध होगा, जिससे उन्हें अपनी फसल बेचने के लिए दूर की मंडियों में भटकने या परिवहन पर अतिरिक्त खर्च करने की आवश्यकता नहीं होगी। इसके अलावा गोशालाओं से निकलने वाले गोबर और गोमूत्र को खाद के रूप में पुन: किसानों के खेतों में डालने की योजना भी बनाई जा रही है, जिससे रासायनिक खादों पर निर्भरता कम होगी और जैविक खेती को भी जमीनी स्तर पर जबर्दस्त बढ़ावा मिलेगा।