देवरिया के बरहज में खतरे के निशान से 75 सेमी ऊपर बह रही सरयू, दियारा के गांवों में घुसा बाढ़ का पानी
उत्तर प्रदेश में मानसून के अंतिम चरण के बीच नदियों के मिजाज में दो बिल्कुल विपरीत और हैरान करने वाली तस्वीरें सामने आ रही हैं। एक तरफ जहां पूर्वी उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में सरयू (घाघरा) नदी अपने रौद्र रूप में आ चुकी है और तटवर्ती बस्तियों की ओर तेजी से कदम बढ़ा रही है, वहीं दूसरी तरफ संगम नगरी प्रयागराज के बाशिंदों के लिए राहत की बड़ी खबर आई है। प्रयागराज में गंगा और यमुना के जलस्तर में दो दिनों से मचे हाहाकार की सबसे बड़ी वजह बनी सहायक नदियां टोंस और बेलन अब शांत होने लगी हैं, जिससे शहर में बाढ़ का चढ़ता पानी स्थिर हो गया है। राज्य के कई जिलों में एक साथ जलप्रलय और जलस्तर के उतार-चढ़ाव ने जिला प्रशासन, सिंचाई विभाग और राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की टीमों को हाई अलर्ट पर ला खड़ा किया है।
देवरिया और आसपास के कछारी इलाकों में जहां ग्रामीण अपनी जान-माल, फसलों और मवेशियों को बचाने के लिए छतों और तटबंधों की तरफ भाग रहे हैं, वहीं प्रयागराज के निचले मोहल्लों में पानी के रुकने से हजारों परिवारों ने राहत की सांस ली है। हालांकि, राहत शिविरों में बढ़ती शरणार्थियों की संख्या और जलजनित बीमारियों के खतरे ने स्वास्थ्य महकमे के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। पूर्वांचल के मैदानी भागों में नदियों के बढ़ते दबाव और मध्य उत्तर प्रदेश में स्थिर होते जलस्तर के बीच आगामी 48 घंटे बेहद संवेदनशील माने जा रहे हैं।
देवरिया के बरहज में खतरे के निशान से 75 सेमी ऊपर सरयू: दियारा के दर्जनों टोले घिरे, सैकड़ों एकड़ फसलें जलमग्न
देवरिया जिले की सीमा में प्रवेश करते ही सरयू नदी का उफान विकराल रूप धारण कर चुका है। बरहज नगर क्षेत्र के ऐतिहासिक थाना घाट पर स्थापित जलस्तर मापक यंत्र के आंकड़े यह साफ बता रहे हैं कि हालात कितने चिंताजनक हैं। गुरुवार की शाम दर्ज किए गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, सरयू नदी का जलस्तर 67.25 मीटर पर पहुंच गया है, जो कि खतरे के निर्धारित लाल निशान 66.50 मीटर से पूरे 75 सेंटीमीटर ऊपर है। नदी के जलस्तर में हो रही इस अनवरत बढ़ोतरी ने बरहज के सभी पक्के घाटों की सीढ़ियों को पूरी तरह अपनी जलधारा में समा लिया है। श्मशान घाट से लेकर स्नान घाटों तक सिर्फ मटमैला तेज बहाव नजर आ रहा है।
प्रशासनिक स्तर पर भले ही यह दावा किया जा रहा हो कि स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि नदी के फैलते दायरे से तटवर्ती गांवों के किसान और ग्रामीण बुरी तरह सहमे हुए हैं। सरयू का पानी दियारा क्षेत्र के समतल मैदानी इलाकों और खेतों में तेजी से फैल रहा है। विशुनपुर देवार, परसिया देवार और आसपास के आधा दर्जन से अधिक मजरों और टोलों के चारों तरफ बाढ़ का पानी भर गया है, जिससे कई बस्तियों का मुख्य मार्गों से संपर्क टूट चुका है। किसानों की लगभग डेढ़ सौ से दो सौ एकड़ में खड़ी धान, तिल और सब्जियों की फसलें पूरी तरह जलमग्न हो चुकी हैं। ग्रामीणों का कहना है कि पानी के तेज फैलाव के बीच आवागमन के लिए पर्याप्त मात्रा में सरकारी नावें उपलब्ध नहीं कराई गई हैं, जिसके कारण उन्हें जान जोखिम में डालकर कामचलाऊ नावों से जरूरी सामान निकालना पड़ रहा है।
परसिया देवार और कपरवार संगम पर गहराया संकट: राप्ती-सरयू के दबाव से दौला तटबंध पर खतरा, अलर्ट पर प्रशासन
देवरिया में बाढ़ का संकट केवल दियारा के निचले खेतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अब मजबूत सुरक्षा तटबंधों के लिए भी गंभीर परीक्षा बनता जा रहा है। सरयू नदी का पानी तेजी से परसिया देवार तटबंध की ओर बढ़ रहा है, जिससे बांध पर पानी का दबाव बढ़ता जा रहा है। उधर, कपरवार संगम तट पर स्थिति और भी ज्यादा संवेदनशील बनी हुई है। यहां राप्ती और सरयू नदी का संगम होता है, और दोनों नदियां मिलकर इस समय दौला तटबंध पर जबरदस्त हाइड्रोलिक दबाव बना रही हैं। संगम पर लहरों की तेज मार से तटबंधों के किनारे मिट्टी का कटाव शुरू होने की आशंका जताई जा रही है।
नदियों के इस आक्रामक रुख को देखते हुए देवरिया जिला प्रशासन पूरी तरह मुस्तैद हो गया है। संबंधित तहसीलों के उपजिलाधिकारी, तहसीलदार और सिंचाई विभाग के अभियंता लगातार नावों और पैदल तटबंधों का निरीक्षण कर रहे हैं। संवेदनशील कपरवार और दौला क्षेत्र में बनाई गई बाढ़ चौकियों को 24 घंटे के लिए सक्रिय कर दिया गया है। तटबंधों पर निगरानी रखने के लिए ग्राम प्रहरियों और राजस्व कर्मियों की शिफ्टवार ड्यूटी लगाई गई है। किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए संवेदनशील जगहों पर जियो-बैग्स (रेत भरी बोरियां), बोल्डर और बांस की बल्लियों का आपातकालीन स्टॉक तैयार रखा गया है, ताकि यदि कहीं रिसाव या कटान की स्थिति बने तो उसे तुरंत नियंत्रित किया जा सके।
प्रयागराज को मिली बड़ी राहत: बेलन और टोंस नदी का पानी घटा, फाफामऊ-नैनी में स्थिर हुआ जलस्तर
दूसरी ओर, तीर्थराज प्रयागराज से आई खबर ने लाखों नागरिकों को बड़ी मानसिक राहत पहुंचाई है। पिछले दो दिनों से संगम नगरी में गंगा और यमुना के जलस्तर में जो अप्रत्याशित उछाल देखा जा रहा था, उसकी मुख्य वजह मध्य प्रदेश और विंध्य क्षेत्र से आने वाली टोंस नदी थी। टोंस नदी को उफनाने में बेलन नदी के भारी पानी की अहम भूमिका थी। गुरुवार की शाम होते-होते इन दोनों सहायक नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों में बारिश थमने के कारण इनका जलस्तर तेजी से नीचे खिसकने लगा है।
कोहड़ार घाट पर स्थापित मापक के अनुसार, पिछले छह घंटों के भीतर टोंस नदी का जलस्तर 12 सेंटीमीटर कम दर्ज किया गया, जबकि इसी अवधि में बेलन नदी का पानी 34 सेंटीमीटर नीचे उतर गया। इन दोनों नदियों का पानी कम होने का सीधा और सकारात्मक प्रभाव शाम चार बजे फाफामऊ, छतनाग और नैनी में देखने को मिला। सुबह आठ बजे तक गंगा-यमुना के बढ़ने की जो रफ्तार बनी हुई थी, वह शाम होते-होते पूरी तरह थम गई। शाम के बुलेटिन के मुताबिक, फाफामऊ में गंगा का जलस्तर 82.96 मीटर, छतनाग में 82.20 मीटर और नैनी में यमुना का जलस्तर 82.55 मीटर पर पूरी तरह स्थिर हो गया है। जलस्तर में ठहराव आने से कछारी इलाकों के मकानों में पानी घुसने की गति रुक गई है, जिससे बघाड़ा, सलोरी और राजापुर के निवासियों ने राहत महसूस की है।
बुंदेलखंड से राहत के संकेत: हमीरपुर और चिल्लाघाट में घटी यमुना, बेतवा शांत तो केन में दर्ज हुआ हल्का उछाल
प्रयागराज में यमुना के जलस्तर के थमने के पीछे बुंदेलखंड क्षेत्र की नदियों का शांत होना भी एक प्रमुख वजह बना है। सिंचाई विभाग के बाढ़ प्रखंड कंट्रोल रूम से जारी ताजा बुलेटिन के अनुसार, हमीरपुर और बांदा के चिल्लाघाट में यमुना नदी का जलस्तर लगातार घट रहा है। यमुना की सबसे प्रमुख सहायक नदी बेतवा के ऊपरी बांधों से अतिरिक्त पानी का डिस्चार्ज बंद होने के कारण उसका जलस्तर भी नीचे की ओर खिसक चुका है।
हालांकि, बुंदेलखंड की दूसरी महत्वपूर्ण नदी केन में अभी पूरी तरह शांति नहीं है। मध्य प्रदेश के पन्ना और छतरपुर अंचल में हुई स्थानीय वर्षा के चलते केन नदी के जलस्तर में सुबह के समय करीब 20 सेंटीमीटर की हल्की वृद्धि दर्ज की गई है। जल विशेषज्ञों का कहना है कि केन नदी में आया यह हल्का उछाल प्रयागराज में यमुना के स्तर को दोबारा बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं करेगा, क्योंकि मुख्य यमुना और बेतवा दोनों में पानी का प्रवाह काफी कमजोर पड़ चुका है। इसके चलते प्रयागराज से लेकर मिर्जापुर और वाराणसी तक गंगा के जलस्तर में अगले 24 घंटों के भीतर गिरावट दर्ज होने की पूरी संभावना बन गई है।
स्वास्थ्य और राहत शिविरों पर बढ़ता दबाव: जलजनित बीमारियों का खतरा और आगामी 48 घंटों की चुनौती
भले ही प्रयागराज और बुंदेलखंड में पानी उतरने की उम्मीदें जगी हों, लेकिन बाढ़ प्रभावित इलाकों में असली प्रशासनिक और मानवीय चुनौती अब शुरू हो रही है। प्रयागराज और देवरिया दोनों ही जिलों के बाढ़ राहत शिविरों में विस्थापित परिवारों की संख्या में इजाफा हुआ है। जब नदियां उतरती हैं, तो अपने पीछे भारी मात्रा में गाद, कीचड़ और सड़ती हुई वनस्पतियां छोड़ जाती हैं, जिससे हैजा, डायरिया, टायफाइड और विभिन्न त्वचा संक्रमणों के फैलने का गंभीर खतरा पैदा हो जाता है।
स्वास्थ्य विभाग ने बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में ब्लीचिंग पाउडर, चूने का छिड़काव और क्लोरीन की गोलियों का वितरण तेज कर दिया है। डॉक्टरों की मोबाइल टीमों को नावों के जरिए उन दूरदराज के मजरों में भेजा जा रहा है जो अब भी पानी से घिरे हुए हैं। प्रशासन ने पशुपालन विभाग को भी अलर्ट किया है ताकि बाढ़ में फंसे गोवंश और दुधारू पशुओं को गलघोंटू और खुरपका जैसी जानलेवा बीमारियों से बचाने के लिए टीकाकरण अभियान चलाया जा सके। जब तक देवरिया में सरयू नदी का उफान पूरी तरह थम नहीं जाता और प्रयागराज की गलियों से आखिरी बूंद पानी निकल नहीं जाता, तब तक आपदा प्रबंधन से जुड़े सभी विभागों को चौबीसों घंटे फील्ड में तैनात रहने के सख्त निर्देश दिए गए हैं।