चार मेडिकल कॉलेजों में SC आरक्षण पर हाईकोर्ट की रोक, भड़कीं मायावती ने योगी सरकार की लचर पैरवी पर फोड़ा ठीकरा
उत्तर प्रदेश के चार राजकीय मेडिकल कॉलेजों में नीट-यूजी (NEET-UG) दाखिले के दौरान अनुसूचित जाति (SC) के लिए तय कोटे पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ द्वारा अंतरिम रोक लगाए जाने के बाद सूबे में सियासी घमासान तेज हो गया है। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने इस अदालती झटके का पूरा ठीकरा उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार की लचर और कमजोर कानूनी पैरवी पर फोड़ा है। सोशल मीडिया मंच 'एक्स' पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया साझा करते हुए मायावती ने न केवल सरकार के वकीलों की रणनीति पर सवाल खड़े किए, बल्कि दलित और वंचित वर्ग के छात्रों के हितों की रक्षा के लिए राज्य सरकार को तत्काल देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की स्पष्ट सलाह भी दी है।
'स्पेशल कम्पोनेंट प्लान' की दलील मजबूती से रखती सरकार, तो न लगती रोक: मायावती
बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने विस्तृत बयान में कहा कि बहुचर्चित सामाजिक न्याय की जरूरत और मांग यही थी कि उत्तर प्रदेश सरकार अदालत में इस तथ्य की पुरजोर और प्रभावी पैरवी करती कि सहारनपुर, अंबेडकरनगर, कन्नौज और जालौन में स्थापित मेडिकल कॉलेज आम फंड से नहीं, बल्कि विशेष रूप से अनुसूचित जाति के कल्याण व उत्थान के लिए निर्धारित 'स्पेशल कम्पोनेंट प्लान' (SCP) के धन से बनाए गए हैं।
मायावती ने तर्क दिया कि चूंकि इन चारों मेडिकल कॉलेजों की स्थापना का मूल उद्देश्य ही अनुसूचित जाति का शैक्षणिक विकास था, इसलिए यहां एससी वर्ग के लिए दी गई अतिरिक्त आरक्षण की व्यवस्था 50 प्रतिशत की सामान्य आरक्षण सीमा से अलग और विशेष श्रेणी में आती है। इस व्यवस्था से ही स्पेशल कम्पोनेंट प्लान के बजटीय आवंटन की वास्तविक उपयोगिता और सार्थकता सिद्ध होती है। मायावती ने अफसोस जताते हुए कहा कि यदि सरकार के कानूनी नुमाइंदों ने इस संवैधानिक और सामाजिक पहलू को हाईकोर्ट के समक्ष सही ढंग से प्रस्तुत किया होता, तो शायद अदालत इस पर जरूर सकारात्मक रुख अपनाती और दाखिला प्रक्रिया पर अंतरिम रोक नहीं लगाती।
क्या है पूरा मामला और हाईकोर्ट ने क्यों लगाई रोक?
दरअसल, उत्तर प्रदेश सरकार ने नीट-यूजी 2026 की काउंसलिंग के तहत इन चार विशिष्ट मेडिकल कॉलेजों में राज्य कोटे की सीटों पर विशेष आरक्षण नीति लागू की थी, जिसके चलते कुल आरक्षण का दायरा बढ़कर लगभग 91.76 प्रतिशत तक पहुंच गया था। इसमें अकेले अनुसूचित जाति के अभ्यर्थियों के लिए 50 प्रतिशत से अधिक की विशेष सीटें आरक्षित की गई थीं।
इस नीति को सामान्य और अन्य वर्ग के नीट अभ्यर्थियों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में चुनौती दी थी। याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क था कि सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक 'इंद्रा साहनी' फैसले के तहत किसी भी स्थिति में कुल आरक्षण 50 प्रतिशत की अधिकतम सीमा को पार नहीं कर सकता। इसके अलावा, सरकार ने पिछले शैक्षणिक सत्र में भी अदालत को आश्वासन दिया था कि आरक्षण नियमों को वैधानिक ढांचे के अनुरूप ढाला जाएगा। न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने याचियों की दलीलों को स्वीकार करते हुए 91% के विशेष कोटे पर अंतरिम रोक लगा दी। हालांकि, छात्रों के भविष्य को देखते हुए अदालत ने काउंसलिंग पूरी तरह रद्द करने के बजाय इसे प्रदेश के सामान्य आरक्षण नियमों (21% SC, 2% ST और 27% OBC) के आधार पर आगे बढ़ाने की अनुमति दे दी है।
दाखिला प्रक्रिया प्रभावित, मायावती बोलीं- 'तुरंत सुप्रीम कोर्ट जाए यूपी सरकार'
अदालती आदेश के बाद इन चारों प्रमुख मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश की दिशा बदल जाने पर मायावती ने गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट की पाबंदी के बाद हजारों योग्य दलित छात्रों के मेडिकल प्रवेश का हक सीधे तौर पर प्रभावित हुआ है।
बसपा प्रमुख ने सरकार को कड़ा परामर्श देते हुए लिखा:
"अब जबकि माननीय हाईकोर्ट ने इस पर पाबंदी लगा दी है और मेडिकल दाखिला भी इससे प्रभावित हो गया है, तो ऐसे में यूपी सरकार के लिए यही उचित और न्यायसंगत होगा कि वह अपने फैसले के बचाव में और दलित छात्रों को अपेक्षित राहत दिलाने के लिए बिना किसी देरी के तुरंत माननीय सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल करे।"
अफसरों को अवमानना नोटिस और गरमाई यूपी की राजनीति
इस अदालती फैसले ने प्रशासनिक हलकों में भी हड़कंप मचा दिया है। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के चिकित्सा शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए यह तक पूछ लिया है कि पिछले साल अदालत को दिए गए अंडरटेकिंग का उल्लंघन करने के लिए उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए। वहीं दूसरी ओर, इस मुद्दे पर मायावती के आक्रामक रुख ने स्पष्ट कर दिया है कि विपक्षी दल इसे दलित अधिकारों और सामाजिक न्याय के साथ धोखे के रूप में पेश करने की पूरी तैयारी में हैं। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या योगी सरकार हाईकोर्ट के आदेश को स्वीकार कर सामान्य कोटे से दाखिले पूरे करेगी या मायावती की सलाह पर सुप्रीम कोर्ट का रुख करेगी।