राम मंदिर के पहले CEO पद पर नृपेन्द्र मिश्र की पहली पसंद थे रिटायर्ड IAS या IPS: फिर 5,585 दिग्गजों को पछाड़कर कैसे एयर मार्शल जीतेंद्र मिश्र के हाथों में आई अयोध्या की कमान
अयोध्या में प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर के गर्भगृह से लेकर 70 एकड़ के समूचे परिसर में इन दिनों एक बड़े प्रशासनिक कायाकल्प की गूंज सुनाई दे रही है। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने जब भारतीय वायुसेना के पूर्व एयर मार्शल जीतेंद्र मिश्र को मंदिर का पहला मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) घोषित किया, तो प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में हर कोई हैरान रह गया। इस नियुक्ति की सबसे दिलचस्प और चौंकाने वाली बात यह है कि मंदिर निर्माण समिति के चेयरमैन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पूर्व प्रधान सचिव रहे नृपेन्द्र मिश्र की व्यक्तिगत और रणनीतिक राय इससे बिल्कुल अलग थी। नृपेन्द्र मिश्र का दृढ़ मानना था कि अयोध्या जैसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय महत्व के संवेदनशील धार्मिक स्थल पर व्यवस्थाओं को संभालने के लिए किसी रिटायर्ड आईएएस (IAS) या वरिष्ठ आईपीएस (IPS) अधिकारी को ही कमान सौंपी जानी चाहिए।
नृपेन्द्र मिश्र का तर्क नौकरशाही के व्यावहारिक अनुभवों पर आधारित था। उनका मानना था कि उत्तर प्रदेश शासन, केंद्रीय मंत्रालयों, जिला प्रशासन और पुलिस तंत्र के साथ रोजाना समन्वय साधने में एक सिविल सेवा अधिकारी सबसे अधिक प्रभावी साबित हो सकता है। प्रोटोकॉल प्रबंधन, सरकारी नियमों की तकनीकी समझ, वीआईपी सुरक्षा और स्थानीय स्तर पर आने वाली प्रशासनिक अड़चनों को सुलझाने में आईएएस-आईपीएस संवर्ग का कोई सानी नहीं माना जाता। नृपेन्द्र मिश्र ने ट्रस्ट की उच्चस्तरीय बैठकों में अपने इस सुझाव को प्रमुखता से रखा भी था। लेकिन जब अंतिम निर्णय की घड़ी आई, तो ट्रस्टियों की सर्वोच्च परिषद ने नौकरशाही के पारंपरिक ढर्रे को दरकिनार करते हुए भारतीय सेना के शीर्ष लड़ाकू विमान चालक और रणनीतिकार एयर मार्शल जीतेंद्र मिश्र के नाम पर सर्वसम्मति की मुहर लगा दी।
5,585 आवेदनों की छंटनी और 3 सदस्यीय सर्च कमेटी: पर्दे के पीछे कैसे तैयार हुआ गोपनीय पैनल?
राम मंदिर के पहले सीईओ की यह चयन प्रक्रिया किसी भी कॉर्पोरेट या संवैधानिक संस्था की नियुक्ति से कहीं अधिक पारदर्शी, सख्त और प्रतिस्पर्धी रही है। देशभर से इस गरिमामयी पद के लिए कुल 5,585 योग्य व विशिष्ट हस्तियों ने अपने आवेदन भेजे थे। आवेदकों में केंद्र सरकार के कई रिटायर्ड सचिव, पूर्व मुख्य सचिव, पूर्व डीजीपी, अर्धसैनिक बलों के महानिदेशक, सैन्य जनरल्स और शीर्ष कॉरपोरेट कंपनियों के प्रबंध निदेशक शामिल थे। इतने विशाल पैमाने पर आए आवेदनों की निष्पक्ष जांच और मेरिट के आधार पर छंटनी के लिए ट्रस्ट ने तीन सदस्यीय उच्चस्तरीय सर्च कमेटी का गठन किया था।
इस सर्च कमेटी की अगुवाई सिक्किम व झारखंड उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति प्रमोद कोहली कर रहे थे, जबकि पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल वी. के. चतुर्वेदी और पूर्व परमाणु वैज्ञानिक डॉ. सुरेश हावड़े इसके सदस्य थे। चयन समिति ने कई हफ्तों तक चले सघन बैकग्राउंड वेरिफिकेशन, सेवा रिकॉर्ड और व्यक्तिगत साक्षात्कारों के बाद शीर्ष आवेदकों को तीन अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित कर दिया— पहली श्रेणी सिविल सेवा (आईएएस/राज्य सिविल सेवा), दूसरी श्रेणी पुलिस व आंतरिक सुरक्षा (आईपीएस), और तीसरी श्रेणी रक्षा बल (थल, नौ और वायुसेना के शीर्ष कमांडर)। सर्च कमेटी ने इन तीनों वर्गों से सबसे योग्य अभ्यर्थियों का एक अत्यंत संक्षिप्त पैनल तैयार कर ट्रस्ट के पटल पर रखा। इस पैनल में सैन्य श्रेणी से एयर मार्शल जीतेंद्र मिश्र का नाम शीर्ष पर था, जिसके सामने आते ही ट्रस्टियों ने एकमत होकर फौजी नेतृत्व के पक्ष में अपना फैसला सुरक्षित कर लिया।
चढ़ावा चोरी विवाद और SIT की सिफारिश: नौकरशाही के बजाय फौजी अनुशासन पर ट्रस्ट ने क्यों लगाया दांव?
इस ऐतिहासिक फैसले के पीछे सिर्फ पद की गरिमा नहीं, बल्कि हाल के महीनों में राम मंदिर परिसर में उपजे विवाद और उससे हुई किरकिरी का कड़वा सच भी छिपा हुआ था। पिछले दिनों राम मंदिर में दान और चढ़ावे की कथित चोरी व गबन का सनसनीखेज मामला सामने आया था, जिसके बाद कई लोगों की गिरफ्तारी हुई थी और तत्कालीन महासचिव चंपत राय पर भी सवाल उठे थे। इस विवाद के बाद गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) ने अपनी विस्तृत जांच रिपोर्ट में स्पष्ट सिफारिश की थी कि मंदिर के आंतरिक वित्तीय प्रबंधन, ऑडिट, सुरक्षा और दैनिक व्यवस्था को साधने के लिए एक बेहद सख्त, पारदर्शी और पेशेवर प्रशासनिक ढांचा खड़ा किया जाए।
एसआईटी की इसी सिफारिश के बाद सीईओ पद के सृजन का रास्ता साफ हुआ। ट्रस्ट इस बात को भलीभांति समझ रहा था कि यदि किसी पूर्व आईएएस या आईपीएस को कमान दी गई, तो उन पर किसी न किसी राजनीतिक दल, विचारधारा या क्षेत्रीय लॉबी से जुड़े होने के आरोप लगना बेहद आसान होगा। दूसरी ओर, किसी सैन्य अधिकारी—विशेषकर चार दशकों तक देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले जांबाज एयर मार्शल—की निष्ठा, ईमानदारी और अराजनीतिक छवि पर समाज का कोई भी वर्ग या राजनीतिक दल उंगली उठाने की हिम्मत नहीं कर सकता था। सेना का कड़ा अनुशासन और 'जीरो टॉलरेंस' वाला चरित्र ही वह सबसे बड़ा कारण बना, जिसने नृपेन्द्र मिश्र के आईएएस/आईपीएस वाले विकल्प को पीछे धकेल दिया।
कौन हैं रिटायर्ड एयर मार्शल जीतेंद्र मिश्र? करगिल से लेकर 'ऑपरेशन सिंदूर' तक के जांबाज की प्रोफाइल
श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के पहले मुख्य कार्यपालक अधिकारी बने एयर मार्शल जीतेंद्र मिश्र का जीवन भारतीय वायुसेना में शौर्य, असाधारण नेतृत्व और उच्च तकनीकी दक्षता की एक गौरवशाली दास्तान है। मूल रूप से उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के भाटपाररानी क्षेत्र स्थित भोपतपुरा गांव के रहने वाले जीतेंद्र मिश्र एक साधारण शिक्षक परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता नथुनी मिश्रा दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में लेक्चरर रहे हैं। राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) खड़कवासला और बेंगलुरु के प्रतिष्ठित एयर फोर्स टेस्ट पायलट्स स्कूल के पूर्व छात्र रहे जीतेंद्र मिश्र को 6 दिसंबर 1986 को भारतीय वायुसेना की फाइटर स्ट्रीम में एक लड़ाकू पायलट के रूप में कमीशन मिला था।
अपने 38 वर्षों से अधिक के शानदार सैन्य सफर के दौरान उन्होंने 18 से अधिक विभिन्न प्रकार के लड़ाकू विमानों में 3,000 घंटे से ज्यादा उड़ान भरने का असाधारण अनुभव हासिल किया। वे न केवल एक फाइटर कॉम्बैट लीडर रहे, बल्कि हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के चीफ टेस्ट पायलट के तौर पर उन्होंने सुखोई-30 एमकेआई (Su-30 MKI) और ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल के इंटीग्रेशन जैसे रणनीतिक प्रोजेक्ट्स का भी सफल नेतृत्व किया। वर्ष 1999 के करगिल युद्ध में अहम भूमिका निभाने के साथ-साथ जनवरी 2025 में उन्होंने भारतीय वायुसेना की सबसे संवेदनशील 'पश्चिमी वायु कमान' (Western Air Command) के एयर ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ का दायित्व संभाला। सीमा पार आतंकी ठिकानों के खिलाफ चले बेहद गोपनीय 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान वे ही वेस्टर्न कमांड के रणनीतिक प्रमुख थे। 30 अप्रैल 2026 को सेवानिवृत्त हुए इस जांबाज कमांडर को राष्ट्रपति द्वारा सर्वोत्तम युद्ध सेवा मेडल, अति विशिष्ट सेवा पदक और विशिष्ट सेवा पदक से अलंकृत किया जा चुका है।
क्राउड मैनेजमेंट, 70 एकड़ का सुरक्षा घेरा और गैर-विवादित छवि: चयन के 5 सबसे निर्णायक कारण
ट्रस्ट के शीर्ष सूत्रों के अनुसार, चयन समिति और ट्रस्टियों ने एयर मार्शल जीतेंद्र मिश्र के पक्ष में पांच ऐसे ठोस कारण पाए, जहां सिविल अधिकारी उनके मुकाबले कमजोर पड़ रहे थे:
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विशाल भीड़ का वैज्ञानिक नियंत्रण: अयोध्या में रोजाना औसतन सवा से डेढ़ लाख और पर्व-त्योहारों पर 3 से 5 लाख श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं। इतने बड़े जनसैलाब को व्यवस्थित और सुरक्षित ढंग से दर्शन कराना किसी उच्च-दबाव वाले सैन्य लॉजिस्टिक्स ऑपरेशन जैसा है। एयर मार्शल के पास दबाव की स्थिति में जटिल पब्लिक ऑपरेशंस और क्राउड फ्लो संभालने का दशकों का अनुभव है।
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त्रि-स्तरीय सुरक्षा तंत्र का सुदृढ़ीकरण: राम मंदिर परिसर लगातार आतंकी संगठनों के निशाने पर रहता है। मंदिर की सुरक्षा में यूपी पुलिस, पीएसी, सीआरपीएफ, एसएसएफ और निजी सुरक्षा एजेंसियां एक साथ तैनात हैं। इन बहु-एजेंसी सुरक्षा बलों के बीच सटीक तालमेल और खुफिया इनपुट्स पर त्वरित कार्रवाई केवल वही व्यक्ति कर सकता है जो तीनों सेनाओं के एकीकृत रक्षा स्टाफ (IDS) के उप-प्रमुख स्तर का नेतृत्व संभाल चुका हो।
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वित्तीय शुचिता और पारदर्शी व्यवस्था: दान, चढ़ावे, डिजिटल पेमेंट और बहुमूल्य आभूषणों के रोजाना आने वाले करोड़ों के प्रवाह को एक सुरक्षित, आधुनिक और बिना किसी मानवीय छेड़छाड़ वाली व्यवस्था में बदलना सेना के 'वॉल्ट प्रोटोकॉल' से ही संभव है।
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70 एकड़ परिसर का इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट: मुख्य मंदिर के निर्माण के बाद अब परकोटा, शेषावतार मंदिर, यात्री सुविधा केंद्र और अंतरराष्ट्रीय स्तर के सभागारों का निर्माण अंतिम चरण में है। डिफेंस प्रोजेक्ट्स के डायरेक्टर रह चुके एयर मार्शल टाइम-बाउंड इंजीनियरिंग लक्ष्यों को समय पर पूरा कराने में माहिर माने जाते हैं।
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स्थानीय जुड़ाव और निष्पक्ष व्यक्तित्व: पूर्वी उत्तर प्रदेश (देवरिया) का मूल निवासी होने के कारण वे अवध और पूर्वांचल की स्थानीय संस्कृति, भाषा और जनभावनाओं से गहराई से जुड़े हैं। इसके साथ ही, उनका पूरा जीवन राजनीतिक निष्पक्षता और राष्ट्र सेवा का प्रतीक रहा है, जिससे किसी भी पक्षपात का अंदेशा समाप्त हो जाता है।
राम मंदिर ट्रस्ट का नया युग: नए ट्रस्टियों, डिप्टी सीईओ और बदले हुए ढांचे के साथ नई शुरुआत
एयर मार्शल जीतेंद्र मिश्र की नियुक्ति के साथ ही श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने अपने संपूर्ण संगठनात्मक ढांचे में बड़े बदलावों को अंतिम रूप दिया है। पूर्व महासचिव चंपत राय के पद छोड़ने के बाद अब ट्रस्ट के नए महासचिव का दायित्व कोषाध्यक्ष रहे स्वामी गोविंद देव गिरी जी महाराज संभाल रहे हैं। इसके साथ ही प्रशासनिक कार्यों के विकेंद्रीकरण के लिए सीईओ के अधीन डिप्टी सीईओ (Dy CEO) का पद भी सृजित किया गया है, जिसकी नियुक्ति भी जल्द ही एक पारदर्शी चयन प्रक्रिया के माध्यम से की जाएगी।
ट्रस्ट में सामाजिक समावेश और नई ऊर्जा का संचार करने के लिए तीन नए ट्रस्टियों को भी शामिल किया गया है— जिनमें शिकोहाबाद की डॉ. निर्मला यादव, अयोध्या के वरिष्ठ अधिवक्ता मदन मोहन पांडेय और दिल्ली के उद्योगपति महेश भागचंदका शामिल हैं। इस ऐतिहासिक बदलाव के बाद गुरुवार को एयर मार्शल जीतेंद्र मिश्र खुद अयोध्या पहुंचे और उन्होंने रामघाट स्थित कार्यशाला व ट्रस्ट कार्यालय में औपचारिक उपस्थिति दर्ज कराई। उन्होंने स्पष्ट किया है कि वे ट्रस्ट के सभी अधिकारियों व सुरक्षा एजेंसियों के साथ बिंदुवार समीक्षा बैठकें कर एक अभेद्य और सुगम दर्शन व्यवस्था का नया ब्लूप्रिंट लागू करेंगे। यह साफ संकेत है कि अयोध्या का राम मंदिर अब पारंपरिक ढर्रे से बाहर निकलकर पूर्णतः आधुनिक, पारदर्शी और सैन्य अनुशासन से लैस वैश्विक स्तर की प्रशासनिक व्यवस्था की ओर अग्रसर हो चुका है।