मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर 'कार सेवा' का शंखनाद? अयोध्या से महंत नृत्यगोपाल दास का ऐतिहासिक ऐलान: 'अगर संतों ने लिया फैसला तो पहली पंक्ति में रहूंगा मौजूद'

मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर 'कार सेवा' का शंखनाद? अयोध्या से महंत नृत्यगोपाल दास का ऐतिहासिक ऐलान: 'अगर संतों ने लिया फैसला तो पहली पंक्ति में रहूंगा मौजूद'

अयोध्या में प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर निर्माण का सपना साकार होने के बाद अब सनातन जगत की नजरें कान्हा की पावन क्रीड़ास्थली मथुरा पर टिक गई हैं। राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट और श्रीकृष्ण जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास महाराज ने मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि को लेकर एक ऐसा हुंकार भरा बयान दिया है, जिसने पूरे देश के धार्मिक और सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। अयोध्या स्थित अपनी छावनी 'मणिराम दास की छावनी' में पत्रकारों और शिष्यों से बातचीत के दौरान महंत जी ने दो टूक शब्दों में कहा कि यदि देश के साधु-संत, धर्माचार्य और हिंदू संगठन मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि की पूर्ण मुक्ति के लिए 'कार सेवा' करने का सामूहिक निर्णय लेते हैं, तो वे स्वयं सबसे आगे खड़े दिखाई देंगे।

महंत नृत्यगोपाल दास के इस खुले ऐलान ने एक बार फिर 90 के दशक के उस दौर की यादें ताजा कर दी हैं, जब अयोध्या आंदोलन के समय 'कार सेवा' का आह्वान किया गया था। अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के बाद से ही विश्व हिंदू परिषद और विभिन्न संत संगठनों के बीच 'मथुरा-काशी' को लेकर सुगबुगाहट चल रही थी, लेकिन राम मंदिर ट्रस्ट के सर्वोच्च पदाधिकारी द्वारा सार्वजनिक मंच से 'कार सेवा' शब्द का सीधा उच्चारण करना इस बात का पुख्ता संकेत माना जा रहा है कि पर्दे के पीछे साधु-संतों का मन अब केवल अदालती कार्यवाहियों तक सीमित रहने का नहीं है। इस बयान के सामने आते ही उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली तक के सियासी समीकरणों में भारी तपिश महसूस की जाने लगी है।

1990 के राम मंदिर आंदोलन की यादें ताजा: क्या मथुरा में भी दोहराया जाएगा इतिहास?

राम जन्मभूमि आंदोलन के अग्रदूतों में शुमार रहे महंत नृत्यगोपाल दास केवल एक पीठाधीश्वर नहीं हैं, बल्कि वे उस दौर के जीवित इतिहास हैं जब अशोक सिंघल, परमहंस रामचंद्र दास और लालकृष्ण आडवाणी जैसे दिग्गजों ने देश भर में जन-जागरण की अलख जगाई थी। 1989 से 1992 के बीच अयोध्या में हुई कार सेवा के प्रमुख रणनीतिकारों और प्रत्यक्षदर्शियों में महंत जी का नाम सबसे आगे रहा है। उन्होंने अयोध्या में वह दौर भी देखा जब निहत्थे कारसेवकों पर गोलियां चली थीं और वह ऐतिहासिक पल भी देखा जब गर्भगृह में रामलला विराजमान हुए।

अब ठीक वही भाषा और संकल्प मथुरा के संदर्भ में दोहराया जाना सामान्य घटना नहीं है। संतों का एक बड़ा वर्ग लंबे समय से यह नारा देता रहा है कि 'अयोध्या तो केवल झांकी है, काशी-मथुरा अभी बाकी है।' विश्लेषकों का मानना है कि महंत नृत्यगोपाल दास के इस आह्वान से उन लाखों युवाओं और कारसेवकों को एक नई दिशा मिल सकती है जो मथुरा के कटरा केशव देव मंदिर और शाही ईदगाह के विवाद पर किसी बड़े जन-आंदोलन का इंतजार कर रहे हैं। यदि संत समाज सचमुच कार सेवा की औपचारिक रूपरेखा तैयार करता है, तो यह स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े धार्मिक आंदोलनों में से एक का रूप ले सकता है।

86 वर्ष की उम्र और अस्वस्थ शरीर, फिर भी संकल्प अडिग: 'कान्हा के लिए पहली पंक्ति में खड़ा रहूंगा'

महंत नृत्यगोपाल दास की उम्र इस समय 86 वर्ष के पार हो चुकी है। पिछले कुछ वर्षों में वे कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझे हैं और उन्हें नियमित रूप से चिकित्सकीय देखरेख में रहना पड़ता है। डॉक्टरों द्वारा लगातार आराम करने की सलाह दिए जाने के बावजूद, उनके चेहरे का तेज और धर्म के प्रति उनका अडिग संकल्प आज भी किसी युवा योद्धा जैसा दिखाई देता है। जब उनसे पत्रकारों ने पूछा कि इस उम्र और स्वास्थ्य की स्थिति में वे आंदोलन का हिस्सा कैसे बनेंगे, तो उनका जवाब भावविभोर कर देने वाला था।

महंत जी ने कहा, "शरीर नश्वर है, यह आज है और कल नहीं रहेगा, लेकिन कान्हा की जन्मभूमि का गौरव युगों-युगों तक अक्षुण्ण रहना चाहिए। यदि धर्म की रक्षा और कान्हा के मूल गर्भगृह को मुक्त कराने के लिए संतों की सभा कार सेवा का आदेश देती है, तो मेरी यह देह पीछे नहीं हटेगी। मैं किसी पद या प्रतिष्ठा के लिए नहीं, बल्कि एक सामान्य कारसेवक के रूप में सबसे आगे वाली कतार में बैठकर कान्हा के चरणों में अपनी हाजिरी लगाऊंगा।" इस भावुक और आक्रामक तेवर ने अयोध्या से लेकर मथुरा तक के साधु-संतों में एक नई ऊर्जा और उत्साह का संचार कर दिया है।

शाही ईदगाह बनाम श्रीकृष्ण जन्मभूमि: अदालत की चौखट से लेकर धर्म संसद तक कानूनी और जमीनी जंग

मथुरा का यह विवाद वर्तमान में केवल संतों की जुबान पर नहीं है, बल्कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय और देश की सर्वोच्च अदालत की चौखट पर भी मजबूती से लड़ा जा रहा है। हिंदू पक्ष का दावा है कि 13.37 एकड़ के कटरा केशव देव परिसर में ही भगवान श्रीकृष्ण का वास्तविक जन्मस्थान और कंस का वह कारागार था, जिसे मुगल आक्रांता औरंगजेब ने 1670 में तोड़कर उसके ऊपर शाही ईदगाह मस्जिद का अवैध निर्माण करा दिया था। हिंदू पक्ष ने 1968 में श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ और शाही ईदगाह ट्रस्ट के बीच हुए समझौते को पूरी तरह गैर-कानूनी और मिलीभगत करार देते हुए पूरी जमीन हिंदुओं को सौंपने और मस्जिद को हटाने की मांग को लेकर दो दर्जन से ज्यादा मुकदमे दायर कर रखे हैं।

इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा ज्ञानवापी की तर्ज पर मथुरा में भी कोर्ट कमिश्नर और वैज्ञानिक सर्वेक्षण (Advocate Commissioner Survey) कराने के आदेश के बाद मुस्लिम पक्ष (इंतजामिया कमेटी और वक्फ बोर्ड) ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। हालांकि 1991 के 'प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट' (उपासना स्थल अधिनियम) की संवैधानिक वैधता पर भी सुप्रीम कोर्ट में लगातार बहस चल रही है। अदालती प्रक्रिया अपनी गति से चल रही है, लेकिन संतों का धैर्य अब जवाब देता दिख रहा है। उनका कहना है कि जिस तरह अयोध्या में सदियों तक कानूनी लड़ाई लड़ी गई, वैसे ही मथुरा में भी अनिश्चितकालीन इंतजार करने के बजाय जन-आंदोलन और जन-चेतना के जरिए समाधान का मार्ग प्रशस्त किया जाना चाहिए।

साधु-संतों की लामबंदी और विहिप का रुख: क्या तैयार हो रहा है नया जन-आंदोलन?

महंत नृत्यगोपाल दास के इस बयान के बाद ब्रज मंडल के प्रमुख धर्माचार्यों, अखाड़ों के महामंडलेश्वरों और संत संगठनों ने अपनी प्रतिक्रियाएं देनी शुरू कर दी हैं। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के कई वरिष्ठ संतों ने महंत जी के बयान का खुलकर समर्थन किया है। संतों का तर्क है कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण कार सेवा और अपनी सांस्कृतिक धरोहर की पुनर्स्थापना की मांग करना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है।

दूसरी ओर, विश्व हिंदू परिषद (VHP) इस समय फूंक-फूंक कर कदम रख रही है। विहिप का आधिकारिक रुख यह रहा है कि वह पहले अदालत में चल रहे कानूनी साक्ष्यों और सर्वेक्षणों के माध्यम से दूध का दूध और पानी का पानी होने देना चाहती है। हालांकि, विहिप के अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि यदि कानूनी रास्ते में अनावश्यक अड़ंगे लगाए गए या निर्णय में लंबा विलंब हुआ, तो संत उच्चाधिकार समिति किसी भी समय देशव्यापी आंदोलन की घोषणा कर सकती है। महंत नृत्यगोपाल दास का यह बयान उस संभावित आंदोलन की पहली रणनीतिक चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।

देश की राजनीति पर सीधा असर: 2027 से पहले पूर्वांचल और ब्रज के गलियारों में मची खलबली

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव और राष्ट्रीय राजनीति के परिप्रेक्ष्य में यह बयान बेहद संवेदनशील समय पर आया है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) हमेशा से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और अयोध्या-काशी-मथुरा के पुनरुद्धार को अपने वैचारिक एजेंडे का मूल हिस्सा मानती रही है। योगी आदित्यनाथ सरकार ने पहले ही मथुरा-वृंदावन क्षेत्र को तीर्थ स्थल घोषित कर वहां मांस-मदिरा की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगा रखा है और बड़े स्तर पर 'ब्रज तीर्थ विकास परिषद' के जरिए करोड़ों की विकास योजनाएं चलाई जा रही हैं।

विपक्षी दल, विशेषकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस, इसे ध्रुवीकरण की रणनीति करार दे रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि बेरोजगारी, महंगाई और जनसमस्याओं से ध्यान भटकाने के लिए जानबूझकर धार्मिक मुद्दों को हवा दी जा रही है। लेकिन दूसरी तरफ, जमीनी हकीकत यह है कि उत्तर प्रदेश की आम जनता और खासकर ब्रज क्षेत्र के मतदाताओं के लिए कान्हा की जन्मभूमि एक अत्यंत भावुक और आत्मीय विषय है। महंत नृत्यगोपाल दास के इस ऐलान ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले समय में मथुरा का मुद्दा केवल अदालतों की फाइलों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह देश के राजनीतिक और सांस्कृतिक विमर्श का सबसे बड़ा केंद्र बिंदु बनने जा रहा है।