जब गोलियों की तड़तड़ाहट से दहल उठा था इटावा, जानिए कैसे बाल-बाल बची थी 'नेताजी' की जान
उत्तर प्रदेश की राजनीति की धुरी और 'धरतीपुत्र' के नाम से विख्यात समाजवादी पार्टी के संस्थापक स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव की पुण्यतिथि पर प्रदेशभर में उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी जा रही है। अखाड़े की मिट्टी से निकलकर देश के रक्षा मंत्रालय और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद तक का सफर तय करने वाले मुलायम सिंह का सियासी जीवन संघर्षों, दांव-पेंचों और कई जानलेवा हमलों के साए में गुजरा। उनके जीवन में एक दौर ऐसा भी आया था जब विरोधियों ने उनकी आवाज को हमेशा के लिए खामोश करने की पूरी साजिश रच ली थी। गोलियों की तड़तड़ाहट से पूरा इलाका गूंज उठा था, लेकिन किस्मत और समर्थकों की जांबाजी ने उन्हें मौत के मुंह से सुरक्षित बाहर निकाल लिया था।
4 मार्च 1982 का वह खौफनाक दिन और मूंज तिराहा
यह रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना 4 मार्च 1982 की है। उस समय मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष थे और पश्चिमी उत्तर प्रदेश व बुंदेलखंड के इलाकों में चौधरी चरण सिंह के सबसे भरोसेमंद सिपहसालार के रूप में अपनी मजबूत पैठ बना रहे थे। उस दिन वे अपने गृह जनपद इटावा के जसवंतनगर विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले मूंज गांव में आयोजित एक वैवाहिक समारोह में शामिल होने गए थे। दोपहर के समय जब वे अपने काफिले के साथ खुली जीप में सवार होकर वापस लौट रहे थे, तभी मूंज तिराहे के पास पहले से घात लगाए बैठे हथियारबंद बदमाशों ने अचानक उनके काफिले को घेर लिया।
अंधाधुंध फायरिंग और जीप की सीट के नीचे छिपने की सूझबूझ
तिराहे पर पहुंचते ही हमलावरों ने नेताजी की जीप को निशाना बनाकर चारों तरफ से ताबड़तोड़ गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। राइफलों और बंदूकों की आवाज से पूरा इलाका थर्रा उठा। गोलियां जीप की बॉडी और विंडशील्ड को चीरती हुई निकल रही थीं। अचानक हुए इस अप्रत्याशित हमले में जीप चला रहे चालक और मुलायम सिंह के साथ बैठे उनके करीबी सहयोगियों ने गजब की सूझबूझ दिखाई। सहयोगियों ने तुरंत चिल्लाकर नेताजी को नीचे झुकने को कहा। मुलायम सिंह यादव बिना एक पल गंवाए जीप की निचली सीट और फर्श के बीच छिप गए। हमलावरों ने जीप पर दर्जनों राउंड फायर झोंक दिए, जिसमें वाहन छलनी हो गया, लेकिन जमीन से सटे रहने के कारण एक भी गोली नेताजी को नहीं छू सकी।
साथी की शहादत और जवाबी गोलीबारी से भागे हमलावर
इस भीषण गोलीबारी में नेताजी के एक बेहद करीबी समर्थक और सुरक्षा में तैनात साथी को कई गोलियां लगीं, जिससे वे मौके पर ही लहूलुहान होकर गिर पड़े और बाद में उन्होंने दम तोड़ दिया। इस बलिदान ने नेताजी की जान बचा ली। इसी बीच काफिले में पीछे चल रही दूसरी गाड़ियों में सवार मुलायम सिंह के समर्थकों और सुरक्षा गार्डों ने मोर्चा संभालते हुए जवाबी फायरिंग शुरू कर दी। खुद को चारों तरफ से घिरता देख और समर्थकों का भारी प्रतिरोध देखकर हमलावर पास के बीहड़ और खेतों की आड़ लेकर मौके से फरार हो गए। इस हमले की खबर जैसे ही लखनऊ और दिल्ली तक पहुंची, राजनीतिक गलियारों में हड़कंप मच गया।
अखाड़े की फुर्ती और बीहड़ के दांव-पेंच से मात खाई मौत
हमले के बाद जब पुलिस और प्रशासन मौके पर पहुंचा, तो पूरी जीप पर गोलियों के निशान देखकर हर कोई स्तब्ध था। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना था कि यह किसी चमत्कार से कम नहीं था कि इतने भीषण हमले के बावजूद मुलायम सिंह यादव सुरक्षित बच निकले। राजनीति के जानकारों का मानना है कि अखाड़े में कुश्ती लड़ते हुए सीखी गई शारीरिक फुर्ती और चंबल के बीहड़ों की भौगोलिक समझ ने उस दिन नेताजी की जान बचाने में निर्णायक भूमिका निभाई। इस जानलेवा हमले के बाद मुलायम सिंह यादव का राजनीतिक कद और तेजी से बढ़ा। जनता के बीच उनके प्रति सहानुभूति और विश्वास की ऐसी लहर चली कि वे उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक अपराजेय जननेता बनकर उभरे।