'समझौता बहुत करीब, लेकिन होगा सबसे अलग', भारत के साथ ऐतिहासिक ट्रेड डील पर डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा बयान
लंबे समय से वैश्विक कूटनीति और कारोबारी गलियारों में प्रतीक्षित भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौते (Bilateral Trade Agreement) को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बड़ा और सकारात्मक बयान दिया है। व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस में पत्रकारों से बातचीत करते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने पुष्टि की कि नई दिल्ली और वाशिंगटन एक व्यापक व्यापारिक समझौते को अंतिम रूप देने के मुहाने पर पहुंच चुके हैं। ट्रंप ने कहा, "भारत समझौता करना चाहता है और हम भी समझौता करने जा रहे हैं। हम इसके बेहद करीब हैं"। इसके साथ ही उन्होंने एक बेहद महत्वपूर्ण संकेत देते हुए कहा कि यह आने वाला समझौता अतीत में अमेरिका द्वारा किए गए किसी भी पारंपरिक समझौते की तुलना में 'काफी अलग' (A much different kind of deal) साबित होगा।
मार्को रुबियो के भारत दौरे के बीच आई यह अहम घोषणा: तकनीकी बारीकियों पर सहमति अंतिम दौर में
राष्ट्रपति ट्रंप का यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो भारत के आधिकारिक दौरे पर हैं और मुंबई व नई दिल्ली में उच्चस्तरीय वार्ताओं में जुटे हुए हैं। रुबियो ने भी भारतीय विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर के साथ चर्चा के बाद स्पष्ट किया था कि दोनों देश समझौते के इतने करीब हैं जितना किसी आधिकारिक हस्ताक्षर से ठीक पहले हुआ जा सकता है। उन्होंने बताया कि वार्ता अब केवल कुछ बारीक कानूनी और तकनीकी शब्दों (Technical Details) को अंतिम रूप देने तक सीमित रह गई है।
इससे पूर्व भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने भी नई दिल्ली में आयोजित इकोनॉमिक फोरम में कहा था कि सभी बड़े मुद्दों और रूपरेखा पर दोनों पक्षों में पहले ही आम सहमति बन चुकी है। वहीं, भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी द्विपक्षीय वार्ताओं की प्रगति पर संतोष व्यक्त करते हुए कहा था कि दोनों देश बातचीत के ठोस और सकारात्मक 'लैंडिंग पॉइंट' की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं।
पिछली डील्स से कैसे 'अलग' होगा यह समझौता?
राष्ट्रपति ट्रंप के 'सबसे अलग' वाले बयान को व्यापार और नीति विशेषज्ञ कई कोणों से देख रहे हैं:
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पारंपरिक एफटीए से हटकर रणनीतिक ढांचा: पारंपरिक मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) में अक्सर सभी वस्तुओं पर आंख मूंदकर शुल्क घटाने पर जोर होता है। इसके विपरीत, भारत-अमेरिका का यह समझौता दोनों देशों की घरेलू प्राथमिकताओं को संतुलित करते हुए तैयार किया जा रहा है, ताकि भारत के छोटे व्यापारियों (MSMEs) और किसानों के हितों को कोई नुकसान न पहुंचे।
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टैरिफ रेशनलाइजेशन और ड्यूटी-फ्री एक्सेस: समझौते के तहत भारतीय इंजीनियरिंग उत्पादों, टेक्सटाइल, फार्मास्यूटिकल्स और जेम्स एंड ज्वैलरी को अमेरिकी बाजारों में कम या शून्य आयात शुल्क का लाभ मिल सकता है। बदले में अमेरिका को उच्च तकनीक वाले औद्योगिक उपकरणों, एविएशन पार्ट्स और चुनिंदा कृषि उत्पादों के लिए भारतीय बाजार में आसान पहुंच मिलेगी।
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क्रिटिकल टेक्नोलॉजी और सप्लाई चेन पार्टनरशिप: यह केवल सामानों की खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, 5G/6G टेलीकॉम नेटवर्क और डिफेंस को-प्रोडक्शन जैसी रणनीतिक तकनीकों की विश्वसनीय सप्लाई चेन बनाने पर केंद्रित होगा।
रूसी तेल पर 100% टैरिफ छूट से साफ हुआ समझौते का रास्ता
इस बहुप्रतीक्षित ट्रेड डील के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा हाल ही में अमेरिकी संसद (कांग्रेस) द्वारा प्रस्तावित ग्राहम एक्ट था, जिसके तहत रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक का भारी-भरकम दंडात्मक टैरिफ लगाने का प्रावधान किया गया था। यदि यह लागू होता तो भारतीय निर्यात और अर्थव्यवस्था को भारी झटका लग सकता था।
हालांकि, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रणनीतिक समझदारी दिखाते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रीय हित का हवाला देकर भारत जैसे प्रमुख साझीदारों को इस दंडात्मक टैरिफ से पूरी तरह छूट (Sanctions Waiver) प्रदान कर दी। अमेरिकी प्रशासन ने माना कि भारत जैसे बड़े देश रातों-रात अपनी ऊर्जा जरूरतों के स्रोत नहीं बदल सकते। ट्रंप के इस कदम ने दोनों देशों के बीच व्यापार वार्ता के विश्वास को कई गुना मजबूत किया और गतिरोध को समाप्त कर दिया।
दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं और वैश्विक व्यापार पर क्या होगा असर?
भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार पहले ही रिकॉर्ड 190 से 200 अरब डॉलर के स्तर को छूने की ओर अग्रसर है। यदि यह 'अलग प्रकार का समझौता' अगले कुछ हफ्तों के भीतर औपचारिक रूप से हस्ताक्षरित हो जाता है, तो यह आने वाले वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार को 300 से 500 अरब डॉलर के नए मुकाम तक ले जा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक अनिश्चितता और चीनी विनिर्माण पर निर्भरता घटाने (China Plus One) की दौड़ में यह ट्रेड डील भारत को वैश्विक सप्लाई चेन का सबसे बड़ा केंद्र बनाने में मदद करेगी। ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मजबूत व्यक्तिगत संबंधों के साए में होने जा रही यह डील न केवल आर्थिक दृष्टि से ऐतिहासिक होगी, बल्कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भू-राजनीतिक स्थिरता को भी नया बल प्रदान करेगी।