ईरान को फिर दहलाने चले थे नेतन्याहू, ट्रंप ने ऐन वक्त पर लगाया इमरजेंसी ब्रेक

ईरान को फिर दहलाने चले थे नेतन्याहू, ट्रंप ने ऐन वक्त पर लगाया इमरजेंसी ब्रेक

मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में तनाव एक बार फिर उस खतरनाक मुहाने पर पहुंच गया था, जहां से तीसरा विश्व युद्ध छिड़ने की आशंका जताई जा रही थी। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने ईरान के खिलाफ एक और व्यापक, बहु-दिवसीय और भीषण सैन्य अभियान की पूरी रूपरेखा तैयार कर ली थी। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अक्टूबर के दूसरे सप्ताहांत में इजरायली वायुसेना और मिसाइल यूनिट्स ईरान के सामरिक ठिकानों पर कहर बरपाने के लिए पूरी तरह मुस्तैद थीं। लेकिन इससे पहले कि इजरायली लड़ाकू विमान उड़ान भरते, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सख्त रुख अपनाते हुए इस पूरी योजना पर अचानक 'इमरजेंसी ब्रेक' लगा दिया।

ट्रंप के कड़े विरोध और सीधी चेतावनी के बाद नेतन्याहू को अपने कदम पीछे खींचने पड़े। अमेरिका और इजरायल दोनों देशों की खुफिया व रक्षा एजेंसियों में इस अप्रत्याशित फैसले के बाद हड़कंप मच गया। आइए समझते हैं कि आखिर ऐन वक्त पर वाशिंगटन के हाथ-पांव क्यों फूल गए और ट्रंप को यह सख्त फैसला क्यों लेना पड़ा।

किन ठिकानों पर था इजरायल का निशाना?

खुफिया सूत्रों और राजनयिक रिपोर्टों के अनुसार, इजरायल की यह नई हमला योजना इस साल की शुरुआत में हुए संयुक्त हमलों से भी कहीं अधिक घातक और व्यापक थी। नेतन्याहू सरकार ने ईरान को निर्णायक चोट पहुंचाने के लिए तीन प्रमुख श्रेणियों के ठिकानों की लिस्ट तैयार की थी:

  • ईरानी परमाणु ठिकाने: नतांज और फोर्डो जैसे संवेदनशील भूमिगत यूरेनियम संवर्धन केंद्रों को तबाह करने की योजना।

  • शासन और कमान केंद्र: तेहरान में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के मुख्यालय, बैलिस्टिक मिसाइल लॉन्च पैड्स और एयर डिफेंस सिस्टम्स।

  • ऊर्जा और नागरिक बुनियादी ढांचा: तेल रिफाइनरियां, ऊर्जा संयंत्र और मुख्य बंदरगाह, ताकि ईरानी अर्थव्यवस्था को पूरी तरह पंगु बनाया जा सके।

इजरायली रक्षा तंत्र का मानना था कि ईरान इस समय आर्थिक और सैन्य रूप से बेहद कमजोर स्थिति में है, इसलिए उस पर अंतिम प्रहार करने का यह सबसे मुफीद समय है।

अमेरिका के हाथ-पांव क्यों फूले? ट्रंप के 'इमरजेंसी ब्रेक' की 4 मुख्य वजहें

डोनाल्ड ट्रंप, जो खुद को एक सख्त और आक्रामक नेता के रूप में पेश करते हैं, उन्होंने नेतन्याहू के इस प्लान को मंजूरी देने से साफ इनकार कर दिया। इसके पीछे अमेरिका की अपनी घरेलू और सामरिक मजबूरियां थीं:

  • 3 नवंबर के अमेरिकी मध्यावधि चुनाव (Midterm Elections): अमेरिका में 3 नवंबर को होने जा रहे महत्वपूर्ण मध्यावधि चुनावों से ठीक पहले ट्रंप प्रशासन किसी नए युद्ध में नहीं उलझना चाहता। चुनावी माहौल में युद्ध शुरू होने से अमेरिकी वोटरों में भारी नाराजगी फैल सकती थी, जिसका सीधा नुकसान रिपब्लिकन पार्टी को उठाना पड़ता।

  • ग्लोबल ऑयल क्राइसिस और महंगाई का खौफ: यदि इजरायल ईरान के तेल रिफाइनरी और बुनियादी ढांचे पर हमला करता, तो ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को बंद कर सकता था। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 120-150 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच जातीं, जिससे अमेरिका सहित पूरी दुनिया में रिकॉर्ड महंगाई भड़क उठती।

  • मिसाइल डिफेंस और इंटरसेप्टर्स की भारी कमी: पेंटागन के सैन्य अधिकारियों ने व्हाइट हाउस को आगाह किया था कि मध्य पूर्व में तैनात अमेरिकी सेना और सहयोगियों के पास पैट्रियट (Patriot) और थाड (THAAD) इंटरसेप्टर मिसाइलों का भंडार तेजी से घट रहा है। ईरान के पास हजारों बैलिस्टिक मिसाइलें और आत्मघाती ड्रोन हैं। यदि ईरान ने जवाबी हमला किया, तो खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डों की रक्षा करना बेहद मुश्किल हो जाता।

  • व्यापक क्षेत्रीय युद्ध का खतरा: अमेरिकी रणनीतिकारों को डर था कि इस हमले के बाद हिजबुल्लाह, हूती विद्रोही और इराकी शिया मिलिशिया एक साथ सक्रिय होकर पूरे मध्य पूर्व को भीषण आग में झोंक देते, जिससे अमेरिकी सैनिकों की बड़े पैमाने पर जान जा सकती थी।

नेतन्याहू की राजनीतिक मजबूरी: चुनाव से पहले शक्ति प्रदर्शन की चाह

इजरायल के भीतर 27 अक्टूबर को होने वाले संसदीय चुनावों को लेकर राजनीतिक पारा पहले से ही चढ़ा हुआ है। विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अपने घरेलू वोट बैंक को एकजुट करने और अपनी मजबूत छवि पेश करने के लिए ईरान पर बड़ा हमला करने को बेताब थे। युद्ध के माहौल में मतदाताओं का ध्रुवीकरण आसान हो जाता है।

हालांकि, ट्रंप ने हाल ही में सार्वजनिक रूप से नेतन्याहू का समर्थन किया है, लेकिन उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि चुनावी फायदे के लिए अमेरिका को किसी विनाशकारी युद्ध की आग में नहीं धकेला जा सकता। उप व्हाइट हाउस प्रवक्ता ने भी संकेत दिए कि मध्यावधि चुनावों से पहले किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई की अनुमति नहीं दी जाएगी।

क्या टल गया है युद्ध या केवल कुछ हफ्तों का विराम?

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान पर हमला पूरी तरह रद्द नहीं हुआ है, बल्कि इसे केवल कुछ समय के लिए टाला गया है। इजरायली सेना के सूत्रों का कहना है कि नए लक्ष्यों की सूची पूरी तरह तैयार है।

यदि अमेरिकी मध्यावधि चुनाव संपन्न हो जाते हैं या इजरायल में नई सरकार का गठन हो जाता है, तो नवंबर या दिसंबर के महीनों में यह तनाव दोबारा भड़क सकता है। फिलहाल के लिए ट्रंप के इस सख्त वीटो ने मध्य पूर्व को एक भीषण तबाही से बचा लिया है, लेकिन दोनों देशों के बीच बारूद का ढेर जस का तस बना हुआ है, जिसमें कभी भी एक छोटी सी चिंगारी बड़ा विस्फोट कर सकती है।