डोनाल्ड ट्रंप के हारते पाकिस्तान ने उठाया कटोरा, सऊदी ने दिया खैरात तभी मिलेगी रोटी

डोनाल्ड ट्रंप के हारते पाकिस्तान ने उठाया कटोरा, सऊदी ने दिया खैरात तभी मिलेगी रोटी

अमेरिकी चुनावों के बाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति में आए भारी फेरबदल और डोनाल्ड ट्रम्प की हार के बाद पाकिस्तान की राजनीतिक व आर्थिक बुनियाद पूरी तरह से हिल गई है। ट्रम्प प्रशासन के दौरान मिलने वाली परोक्ष मदद और राहत की उम्मीदें धूमिल होते ही इस्लामाबाद के हुक्मरानों के सामने एक बार फिर से कंगाली और दिवालिया होने का भयानक भूत आकर खड़ा हो गया है। देश का विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserve) तेजी से खाली हो रहा है, महंगाई अपने रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी है और आम जनता के लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम करना मुश्किल होता जा रहा है। इस महासंकट से उबरने के लिए पाकिस्तानी हुकूमत ने एक बार फिर अपना पुराना रवैया अपनाते हुए मित्र राष्ट्रों के सामने कटोरा फैला दिया है। हालांकि, इस बार अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर हालात काफी बदल चुके हैं, क्योंकि कोई भी देश अब बिना किसी ठोस गारंटी और कड़ी शर्तों के पाकिस्तान को एक डॉलर की मदद देने के लिए भी तैयार नजर नहीं आ रहा है।

सऊदी अरब ने पाकिस्तान को दी खैरात, लेकिन रख दी ऐसी सख्त शर्तें जिनके बिना नहीं मिलेगी रोटी

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री और वित्त मंत्रालय के आला अधिकारियों ने डूबती अर्थव्यवस्था को तिनके का सहारा देने के लिए तुरंत सऊदी अरब का रुख किया। रियाद में हुई उच्चस्तरीय बैठकों के बाद सऊदी अरब ने पाकिस्तान को कुछ अरब डॉलर की वित्तीय सहायता और उधारी पर कच्चा तेल (Deferred Oil Facility) देने पर सहमति तो जता दी है, लेकिन इस बार यह आर्थिक मदद किसी तोहफे या खैरात की तरह नहीं मिली है। सऊदी क्राउन प्रिंस और वहां के वित्तीय संस्थानों ने पाकिस्तान के सामने बेहद सख्त और कठोर शर्तें रख दी हैं। सऊदी अरब ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि पाकिस्तान अपनी आर्थिक नीतियों में कड़े वित्तीय सुधार (Financial Reforms), सरकारी खर्चों में कटौती, कर ढांचे में बड़े बदलाव और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की शर्तों को पूरी तरह से लागू नहीं करता है, तो यह मदद तुरंत रोक दी जाएगी। रियाद के इस सख्त रवैये ने पाकिस्तान के सरकारी गलियारों में तहलका मचा दिया है, क्योंकि अब देश की जनता को पेट भरने के लिए भी सऊदी की इन शर्तों के आगे पूरी तरह झुकना पड़ेगा।

आईएमएफ और मित्र देशों के कड़े तेवरों से घिरा इस्लामाबाद, आर्थिक बर्बादी के कगार पर आम जनता

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था इस समय कर्ज के उस जाल में फंसी हुई है, जहां से बिना कठोरतम कदम उठाए बाहर निकलना नामुमकिन सा लग रहा है। एक तरफ जहां अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) नए राहत पैकेज के बदले सब्सिडी खत्म करने, बिजली और ईंधन की कीमतें बेतहाशा बढ़ाने का दबाव बना रहा है, वहीं दूसरी तरफ सऊदी अरब जैसे पारंपरिक मददगार देशों ने भी साफ कह दिया है कि मुफ्त में पैसे बांटने का दौर अब हमेशा के लिए खत्म हो चुका है। इन कड़ी शर्तों को मानने का सीधा मतलब है कि पाकिस्तान में आने वाले दिनों में पेट्रोल, डीजल, आटा, दाल और रसोई गैस की कीमतों में आग लगेगी, जिससे आम नागरिकों की कमर पूरी तरह से टूट जाएगी। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सऊदी अरब से मिलने वाली इस सशर्त खैरात का सही इस्तेमाल नहीं किया गया, तो पाकिस्तान में श्रीलंका से भी बदतर हालात पैदा होने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा।

वैश्विक कूटनीति में अलग-थलग पड़ा पाकिस्तान, अमेरिकी चुनावों के नतीजों ने बढ़ाईं शहबाज सरकार की मुश्किलें

डोनाल्ड ट्रम्प के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव हारने और वाशिंगटन में नई सत्ता के आने से पाकिस्तान की विदेश नीति को भी बहुत बड़ा झटका लगा है। ट्रम्प के कार्यकाल में पाकिस्तान को रणनीतिक सौदेबाजी और आतंकवाद पर दिखावटी कार्रवाई के नाम पर जो ढील मिल जाती थी, वह अब पूरी तरह बंद हो चुकी है। अमेरिकी प्रशासन ने साफ संदेश दे दिया है कि पाकिस्तान को अपनी धरती पर पल रहे आतंकवादी नेटवर्क पर निर्णायक कार्रवाई करनी होगी और अपनी अर्थव्यवस्था को अपने पैरों पर खड़ा करना होगा। चीन के सीपेक (CPEC) प्रोजेक्ट्स का काम धीमा पड़ने और अमेरिकी मदद बंद होने के बाद अब केवल खाड़ी देशों की खैरात ही पाकिस्तान का एकमात्र सहारा बची है। यही वजह है कि सऊदी अरब की हर छोटी-बड़ी शर्त को मानने के अलावा पाकिस्तानी नेतृत्व के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है।

निष्कर्ष: शर्तों वाली खैरात से कुछ समय की मोहलत, लेकिन भविष्य के रास्ते बेहद कठिन

संक्षेप में कहें तो अमेरिकी राजनीति में बदलाव के बाद पैदा हुए इस नए संकट ने पाकिस्तान के खोखले दावों की पोल खोल दी है। सऊदी अरब से मिली सशर्त खैरात ने भले ही पाकिस्तान को तुरंत दिवालिया होने से बचा लिया हो, लेकिन आने वाले समय में आम जनता को भारी महंगाई और भुखमरी का सामना करना पड़ेगा। यह देखना बेहद अहम होगा कि शहबाज सरकार सऊदी की इन कड़वी शर्तों को कैसे लागू करती है।