अरब सागर में ड्रैगन की शह पर पाकिस्तान की नई चाल, स्टील्थ पनडुब्बी 'PNS हैंगोर' ने किया खतरनाक मिसाइल परीक्षण

अरब सागर में ड्रैगन की शह पर पाकिस्तान की नई चाल, स्टील्थ पनडुब्बी 'PNS हैंगोर' ने किया खतरनाक मिसाइल परीक्षण

समुद्र के भीतर दक्षिण एशिया के सामरिक समीकरणों में एक बड़ा और चौंकाने वाला घटनाक्रम सामने आया है। पाकिस्तान की नौसेना ने चीन की सहायता से हासिल की गई अपनी पहली अत्याधुनिक स्टील्थ 'PNS हैंगोर' (PNS Hangor) पारंपरिक डीजल पनडुब्बी से एंटी-शिप मिसाइल का पहला सफल परीक्षण कर लिया है। पाकिस्तानी नौसेना ने इस सफल परीक्षण का आधिकारिक वीडियो भी जारी किया है, जिसके बाद से अरब सागर की भू-राजनीतिक और सामरिक हलचल तेज हो गई है। चीन के साथ हुए एक बड़े रक्षा सौदे के तहत पाकिस्तान को ऐसी कुल आठ स्टील्थ पनडुब्बियां मिलनी हैं, और इस ताजा मिसाइल टेस्ट ने भारतीय नौसेना के रणनीतिकारों के माथे पर चिंता की गहरी लकीरें खींच दी हैं।

यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब भारतीय नौसेना की आधुनिक पनडुब्बी निर्माण से जुड़ी बहुप्रतीक्षित योजना 'प्रजेक्ट-75 (इंडिया)' पिछले नौ वर्षों से विभिन्न प्रशासनिक और तकनीकी अड़चनों के कारण अटकी हुई है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अरब सागर के पानी में चीन समर्थित पाकिस्तानी नौसेना की यह बढ़ती मारक क्षमता भारत के पश्चिमी नौसेनिक बेड़े के लिए एक नई और गंभीर चुनौती पेश कर रही है, जिससे निपटने के लिए भारत को अपनी रक्षा तैयारियों और खरीद प्रक्रियाओं को और अधिक तीव्र करना होगा।

क्या है चीन की युआन क्लास 'PNS हैंगोर' की खासियत? AIP तकनीक से लैस है पनडुब्बी

पाकिस्तान ने साल 2015 में चीन के साथ कुल आठ (08) 'युआन क्लास' पारंपरिक डीजल पनडुब्बियों की खरीद का एक मेगा रक्षा सौदा किया था। इस समझौते के तहत शुरुआती चार पनडुब्बियों का निर्माण सीधे चीन में किया जाना है, जबकि शेष चार पनडुब्बियों को चीन के तकनीकी सहयोग से पाकिस्तान के कराची शिपयार्ड में तैयार किया जा रहा है। इसी क्रम में पहली 'PNS हैंगोर' पनडुब्बी को कुछ महीने पहले ही पाकिस्तानी नौसेना के बेड़े में शामिल किया गया था, और अब अरब सागर में इसके पहले एंटी-शिप मिसाइल परीक्षण ने इसे ऑपरेशनल रूप से सक्रिय कर दिया है।

चीन ने इन सभी आठों युआन क्लास पनडुब्बियों को बेहद उन्नत और घातक 'एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन' (AIP) तकनीक से लैस किया है। पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों की यह बड़ी सीमा होती है कि उन्हें अपनी बैटरी चार्ज करने के लिए हर 24 से 48 घंटे के भीतर समुद्र की सतह पर आना पड़ता है, जिससे वे दुश्मन के रडार और सैटेलाइट की पकड़ में आ सकती हैं। लेकिन एआईपी (AIP) तकनीक के होने के कारण यह स्टील्थ पनडुब्बी बिना सतह पर आए कई दिनों तक पानी के भीतर बेहद खामोशी से रहकर गश्त लगा सकती है, जिससे इसे डिटेक्ट करना बेहद कठिन हो जाता है।

हालिया समुद्री झड़प और नेवल कमांडर्स कॉन्फ्रेंस के बीच बढ़ी तनातनी

पाकिस्तान ने चीन निर्मित इस पनडुब्बी को ऐसे संवेदनशील समय में अरब सागर में तैनात किया है, जब कुछ समय पहले ही पाकिस्तानी नौसेना के एक जहाज ने भारतीय नौसेना के फ्रंटलाइन युद्धपोत 'INS कोलकाता' को खतरनाक तरीके से टक्कर मार दी थी। इस घटना को लेकर भारत ने इस्लामाबाद के समक्ष अपनी कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी। इसके अलावा, हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Storm of Hormuz) के पास अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने भी क्षेत्र की सुरक्षा को और अधिक संवेदनशील बना दिया है।

इन तमाम समसामयिक चुनौतियों और समुद्री सुरक्षा के मुद्दों की व्यापक समीक्षा के लिए राजधानी नई दिल्ली में आयोजित उच्चस्तरीय 'नेवल कमांडर्स कॉन्फ्रेंस' के दौरान विशेष मंथन किया गया। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान सहित देश के शीर्ष सैन्य नेतृत्व की मौजूदगी में भारतीय नौसेना की ऑपरेशनल तैयारियों, समुद्री निगरानी और युद्धक क्षमताओं का गहन जायजा लिया गया। बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि हिंद महासागर और अरब सागर में चीन के बढ़ते प्रभाव और पाकिस्तान की आक्रामक नौसैनिक गतिविधियों का प्रभावी ढंग से मुकाबला करने के लिए देश की समुद्री सीमाओं को अत्याधुनिक हथियारों से लैस करना समय की सबसे बड़ी मांग है।

प्रोजेक्ट-75 (I) में देरी भारत के लिए चिंता का सबब, जर्मनी के साथ सौदे पर अंतिम निर्णय का इंतजार

अरब सागर में पनडुब्बियों की इस रेस के बीच भारत के भीतर रक्षा उत्पादन की गति को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। भारतीय नौसेना का अति-महत्वपूर्ण 'प्रोजेक्ट-75 (इंडिया)' पिछले नौ वर्षों से लाल फीताशाही और प्रक्रियागत देरी का शिकार बना हुआ है। इस प्रोजेक्ट के तहत जर्मनी की प्रतिष्ठित रक्षा कंपनी 'थाइसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स' (TKMS) की मदद से भारत के मुंबई स्थित मझगांव डॉकयार्ड (MDL) में AIP तकनीक से लैस छह अत्याधुनिक स्टील्थ पनडुब्बियों का स्वदेशी 'मेक इन इंडिया' के तहत निर्माण किया जाना है।

इस बहुचर्चित रक्षा सौदे को अंतिम रूप देने के लिए दोनों देशों के बीच तकनीकी, वित्तीय और वाणिज्यिक स्तर पर लगातार गहन बातचीत चल रही है। इसी साल की शुरुआत में जर्मनी के शीर्ष नेतृत्व की भारत यात्रा के दौरान भी इस रक्षा सौदे को लेकर उच्चस्तरीय चर्चाएं हुई थीं, लेकिन अभी तक इस पर अंतिम मुहर लगना बाकी है। रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि यदि भारत अपनी पनडुब्बी निर्माण और अधिग्रहण की प्रक्रियाओं में तेजी नहीं लाता है, तो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन और पाकिस्तान की बढ़ती नौसैनिक धमक भारत की सुरक्षा के लिए एक बड़ी सामरिक चुनौती बन सकती है।