अगले 5 साल में अंतरिक्ष बनेगा नया जंग का मैदान: सैटेलाइट्स पर मंडराया महायुद्ध का खतरा
धरती, समंदर और आसमान के बाद अब मानव इतिहास का अगला सबसे बड़ा और विनाशकारी युद्ध अंतरिक्ष के शून्य में छिड़ने की कगार पर पहुंच गया है। वैश्विक रक्षा एवं अंतरिक्ष विशेषज्ञों ने एक बेहद सनसनीखेज और गंभीर चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि अगले पांच वर्षों के भीतर पृथ्वी की कक्षा महाशक्तियों के बीच शक्ति प्रदर्शन का मुख्य अखाड़ा बन जाएगी। अमेरिका, ब्रिटेन, रूस और चीन की तेजी से बढ़ती आक्रामक सैन्य गतिविधियों ने दुनिया भर के सुरक्षा विश्लेषकों की नींद उड़ा दी है। यदि अंतरिक्ष में चक्कर काट रहे संचार और नेविगेशन उपग्रहों पर सीधा हमला होता है, तो आधुनिक मानव सभ्यता की जीवन रेखा मानी जाने वाली तमाम आवश्यक सेवाएं—जैसे ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (GPS), हाई-स्पीड इंटरनेट, टीवी ब्रॉडकास्टिंग, मौसम का पूर्वानुमान, हवाई यातायात नियंत्रण (ATC) और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बैंकिंग प्रणालियां पलक झपकते ही पूरी तरह ठप पड़ जाएंगी।
इन 5 खतरनाक हथियारों और तकनीकों से अंतरिक्ष में लड़ी जाएगी अगली जंग
सैन्य विशेषज्ञों ने उन पांच मुख्य रणनीतियों और तकनीकों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया है, जिनके जरिए महाशक्तियां अंतरिक्ष में अपनी सर्वोच्चता स्थापित करने और विरोधी देशों के उपग्रहों को पंगु बनाने की तैयारी कर रही हैं:
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डायरेक्ट-एसेंट एंटी-सैटेलाइट मिसाइल (ASAT): उपग्रहों को सीधे मिसाइल से नष्ट करने की यह तकनीक सबसे घातक मानी जाती है। चीन ने वर्ष 2007 में अपने ही एक पुराने मौसम उपग्रह को जमीन से मिसाइल दागकर मार गिराया था। इसके अलावा अमेरिका, रूस और भारत भी लाइव सैटेलाइट को अंतरिक्ष में सटीक निशाना बनाकर नष्ट करने की अचूक क्षमता का सफल प्रदर्शन कर चुके हैं। हालांकि, इस तरह के सीधे मिसाइल हमलों से अंतरिक्ष में हजारों टुकड़ों का खतरनाक मलबा (स्पेस डेब्री) फैल जाता है, जो अनियंत्रित गति से घूमते हुए अन्य सभी देशों के असैन्य और वाणिज्यिक उपग्रहों के लिए भी बड़ा खतरा बन जाता है।
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सिग्नल जैमिंग से संचार व्यवस्था ठप करना: जमीन या विमानों से शक्तिशाली रेडियो संकेतों का इस्तेमाल करके जीपीएस और संचार उपग्रहों से आने वाले सिग्नलों को बाधित किया जा सकता है। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और जीपीएस सिग्नल जैमिंग की कई घटनाएं पहले ही दर्ज की जा चुकी हैं, जिससे नागरिक उड्डयन, कॉमर्शियल उड़ानों और समुद्री जहाजों के सुरक्षित नेविगेशन पर सीधा संकट खड़ा हुआ था।
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स्पूफिंग के जरिए नकली सिग्नलों से भ्रम फैलाना: यह साइबर और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध का बेहद शातिर तरीका है, जिसके तहत हमलावर किसी विमान, ड्रोन, मिसाइल या सैन्य बेस को फर्जी और छेड़छाड़ किए गए उपग्रह संकेत भेजता है। इस स्पूफिंग तकनीक से रिसीवर डिवाइस को गलत भौगोलिक स्थिति और समय का इनपुट मिलता है, जिससे पूरा नेविगेशन सिस्टम दिशा भ्रमित होकर दुर्घटनाग्रस्त हो सकता है।
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ग्राउंड कमांड और कंट्रोल सेंटर पर साइबर स्ट्राइक: किसी भी उपग्रह को नियंत्रित करने के लिए धरती पर स्थित कंट्रोल स्टेशन सबसे संवेदनशील कड़ी होते हैं। हैकर्स और विशेष सैन्य साइबर इकाइयां इन ग्राउंड स्टेशनों के कंप्यूटर नेटवर्क को निशाना बनाकर उपग्रह से संपर्क तोड़ सकती हैं, गोपनीय सैन्य डेटा चुरा सकती हैं या फिर उपग्रह के थ्रस्टर्स को सक्रिय करके उसे अनियंत्रित कर अंतरिक्ष में भटका सकती हैं।
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किलर सैटेलाइट्स और प्रॉक्सिमिटी ऑपरेशंस: अंतरिक्ष में किसी अन्य उपग्रह के बिल्कुल नजदीक अपने उपग्रह को ले जाकर उसकी जासूसी करना या उसे सीधे नुकसान पहुंचाना सबसे आधुनिक रणनीति बन गई है। चीन, रूस और अमेरिका पहले ही यह क्षमता प्रदर्शित कर चुके हैं, जहां एक उपग्रह दूसरे उपग्रह के पास जाकर उसकी सौर ऊर्जा पैनलों को ब्लॉक कर सकता है या इलेक्ट्रॉनिक हस्तक्षेप पैदा कर सकता है।
चीन के 5 उपग्रहों का अंतरिक्ष में युद्धाभ्यास, रोबोटिक आर्म से उपग्रह पकड़ने की तैयारी
यूनाइटेड स्टेट्स स्पेस फोर्स की हालिया खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, चीन के पांच सैन्य उपग्रहों ने हाल ही में पृथ्वी की कक्षा में एक-दूसरे के बेहद करीब जाकर जटिल युद्धाभ्यास और समन्वय का अभ्यास किया है। ड्रैगन अब ऐसी आधुनिक रोबोटिक तकनीक विकसित कर रहा है जिसमें उपग्रहों में लगे विशेष मैकेनिकल आर्म (रोबोटिक हाथ) विरोधी उपग्रहों को अंतरिक्ष में ही पकड़कर उनकी कक्षा बदल सकते हैं या उन्हें नष्ट कर सकते हैं। वहीं दूसरी तरफ, अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने एक और सनसनीखेज अंदेशा जताया है कि रूस द्वारा वर्ष 2022 में प्रक्षेपित किए गए 'कॉसमॉस-2553' (Cosmos-2553) उपग्रह में परमाणु हथियार या एंटी-सैटेलाइट न्यूक्लियर पेलोड के कुछ महत्वपूर्ण घटक भेजे गए थे, जो एक बड़े इलाके में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक पल्स (EMP) पैदा करके एक साथ दर्जनों उपग्रहों के इलेक्ट्रॉनिक्स को भस्म करने में सक्षम है।
ब्रिटेन की स्पेस एयरफोर्स का गठन, लेजर गन और स्पेस शील्ड पर भारी निवेश
अंतरिक्ष में छिड़ती इस नई शीत युद्ध जैसी होड़ से निपटने के लिए ब्रिटेन की रॉयल एयरफोर्स ने सितंबर में आधिकारिक तौर पर अपनी पहली विशेष सैन्य अंतरिक्ष इकाई (UK Space Command Unit) का गठन किया है। ब्रिटिश रक्षा मंत्रालय ने अपनी राष्ट्रीय उपग्रह संपत्तियों की रक्षा के लिए एस्ट्रोस्केल (Astroscale) और ऑर्बिट फैब (Orbit Fab) जैसी अग्रणी निजी अंतरिक्ष सुरक्षा कंपनियों के साथ रणनीतिक साझेदारी की है, ताकि दुश्मन के किलर उपग्रहों की 24 घंटे लाइव निगरानी की जा सके और जरूरत पड़ने पर उन्हें निष्क्रिय किया जा सके। इसके साथ ही यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) ने भी अपने वैज्ञानिक अभियानों में सुरक्षात्मक और सैन्य उपयोग के घटकों को शामिल करना शुरू कर दिया है। विभिन्न देश अब प्रत्यक्ष मिसाइल हमलों से बचते हुए गैर-विनाशकारी हथियारों, जैसे हाई-एनर्जी लेजर बीम, उच्च-तीव्रता वाली माइक्रोवेव और विद्युत चुंबकीय तरंगों (Directed Energy Weapons) के निर्माण में अरबों डॉलर झोंक रहे हैं, जो बिना कोई मलबा फैलाए दुश्मन के उपग्रह के कैमरों और सेंसरों को अंधा कर सकते हैं।