Microfinance Lending Trends: अब छोटे नहीं बड़े कर्ज ले रहे लोग, माइक्रोफाइनेंस में 17.5% बढ़ा औसत टिकट साइज

Microfinance Lending Trends: अब छोटे नहीं बड़े कर्ज ले रहे लोग, माइक्रोफाइनेंस में 17.5% बढ़ा औसत टिकट साइज

भारत के ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में वित्तीय समावेशन की रीढ़ माने जाने वाले माइक्रोफाइनेंस (MFI) सेक्टर में कर्ज लेने और देने के तौर-तरीकों में एक बड़ा संरचनात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है। कभी ₹10,000 से ₹25,000 के छोटे-छोटे कर्जों पर निर्भर रहने वाले निम्न और मध्यम आय वर्ग के परिवार अब बड़े टिकट साइज के लोन लेने को प्राथमिकता दे रहे हैं। क्रेडिट इंफॉर्मेशन कंपनी क्रिफ हाईमार्क (CRIF) की ताजा 'माइक्रोलेंड' रिपोर्ट के अनुसार, देश में माइक्रोफाइनेंस लोन का औसत आकार (Average Ticket Size) सालाना आधार पर 17.5 प्रतिशत की जोरदार छलांग लगाकर ₹63,100 के स्तर पर पहुंच गया है। यह बदलाव इस बात का स्पष्ट संकेत है कि देश के ग्रामीण और कस्बाई उद्यमी अब केवल दैनिक निर्वाह या गुजारे के लिए कर्ज नहीं ले रहे, बल्कि अपने छोटे व्यवसायों को बड़ा बनाने, इन्वेंट्री बढ़ाने और आय के नए स्रोत स्थापित करने के लिए अधिक पूंजी जुटा रहे हैं।

आंकड़ों की जुबानी: क्यों घट रहे कर्जदार और बढ़ रहा है लोन का आकार?

रिपोर्ट के आंकड़े एक बेहद दिलचस्प विरोधाभास सामने लाते हैं। एक तरफ जहां माइक्रोफाइनेंस उद्योग का कुल लोन पोर्टफोलियो और सक्रिय ग्राहकों की संख्या में थोड़ी नरमी या सतर्कता देखी गई है, वहीं दूसरी ओर प्रति कर्जदार दी जाने वाली रकम में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज हुई है। वर्तमान में सक्रिय कर्जदारों का आधार लगभग 6.4 करोड़ (64 मिलियन) है, लेकिन प्रति लोन औसत एक्सपोजर में 22.7 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि हुई है। इसका सीधा अर्थ यह है कि वित्तीय संस्थान अब नए और अपरीक्षित ग्राहकों को अंधाधुंध छोटे कर्ज बांटने के बजाय अपने उन पुराने और भरोसेमंद ग्राहकों पर दांव लगा रहे हैं, जिनका रीपेमेंट रिकॉर्ड बेदाग रहा है। वित्तीय संस्थानों की इस रणनीति से लोन की प्रोसेसिंग लागत में कमी आ रही है और स्थापित ग्राहकों को भी अपनी व्यावसायिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए एकमुश्त बड़ी पूंजी उपलब्ध हो पा रही है।

एनबीएफसी-एमएफआई का दबदबा बरकरार: बाजार हिस्सेदारी 44% के पार

माइक्रोफाइनेंस बाजार के प्रतिस्पर्धी परिदृश्य पर नजर डालें तो नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनीज-माइक्रोफाइनेंस इंस्टीट्यूशंस (NBFC-MFIs) इस बदलाव की अगुवाई कर रहे हैं। कुल माइक्रोफाइनेंस लोन बुक में एनबीएफसी-एमएफआई की हिस्सेदारी बढ़कर लगभग 44.7 प्रतिशत हो चुकी है, जो बैंकों और स्मॉल फाइनेंस बैंकों (SFBs) की तुलना में अधिक है। एनबीएफसी-एमएफआई की जमीनी पकड़, स्वयं सहायता समूहों (SHG) और संयुक्त देयता समूहों (JLG) के साथ सीधा जुड़ाव उन्हें ग्राहकों की वास्तविक वित्तीय क्षमता को सटीक रूप से आंकने में मदद करता है। यही कारण है कि जब एक महिला उद्यमी किराना दुकान, सिलाई यूनिट, पशुपालन या डेयरी व्यवसाय को छोटे स्तर से बढ़ाकर मध्यम स्तर पर ले जाती है, तो ये संस्थान तुरंत ₹50,000 से ₹1,00,000 तक का अपग्रेडेड लोन स्वीकृत कर देते हैं।

आरबीआई के सख्त दिशा-निर्देश और ओवर-लीवरेजिंग पर ब्रेक

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा माइक्रोफाइनेंस क्षेत्र के लिए जारी किए गए संशोधित नियामक ढांचे ने भी इस नए पैटर्न को आकार देने में अहम भूमिका निभाई है। केंद्रीय बैंक ने साफ निर्देश दिया है कि किसी भी परिवार की कुल मासिक आय के 50 प्रतिशत से अधिक की देनदारी (EMI) नहीं होनी चाहिए। इसके साथ ही एक ही कर्जदार को कई अलग-अलग संस्थानों से बार-बार लोन बांटने की प्रथा पर सख्त लगाम लगाई गई है। रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि जिन कर्जदारों के पास दो या उससे कम एक्टिव लेंडर्स (ऋणदाता) हैं, उनका पोर्टफोलियो में 81.2 प्रतिशत का दबदबा है और उनका डिफॉल्ट रेट (PAR 31-180 दिन) महज 1.9 प्रतिशत है। इसके विपरीत, तीन या उससे अधिक संस्थानों से कर्ज लेने वाले ग्राहकों में डिफॉल्ट दर 4.1% से बढ़कर 6.6% तक पहुंच जाती है। इस जोखिम को कम करने के लिए बैंकों और एमएफआई ने कई छोटे-छोटे लोन बांटने के बजाय केवल एक या दो बड़े और प्रबंधनीय लोन देने की नीति अपनाई है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था की परिपक्वता या कर्ज के जाल का नया जोखिम?

आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि टिकट साइज का ₹63,000 के पार जाना ग्रामीण भारत की क्रय शक्ति और उद्यमशीलता की परिपक्वता को दर्शाता है। पहले जहां ग्रामीण महिलाएं केवल चूल्हा-चौका या घरेलू जरूरतों के लिए ₹15,000-₹20,000 का कर्ज लेती थीं, वहीं अब वे कमर्शियल व्हीकल, एग्री-प्रोसेसिंग मशीनरी और स्थानीय रिटेल शॉप्स के विस्तार के लिए ₹70,000 से ₹1,00,000 तक की पूंजी का कुशलतापूर्वक इस्तेमाल कर रही हैं। हालांकि, इसके साथ एक चेतावनी भी जुड़ी हुई है। यदि ग्रामीण आय में उस अनुपात में टिकाऊ वृद्धि नहीं होती, तो बड़े टिकट साइज के लोन फसल खराबी या स्थानीय आर्थिक सुस्ती के समय परिवारों के लिए रीपेमेंट का गंभीर संकट भी खड़ा कर सकते हैं। फिलहाल, क्रेडिट ब्यूरो के मजबूत सत्यापन और डिजिटल रीपेमेंट के बढ़ते चलन ने इस नए ट्रेंड को स्थिरता प्रदान की है, जिससे भारत का माइक्रोफाइनेंस लैंडस्केप एक अधिक परिपक्व और विकासोन्मुख दौर में प्रवेश करता दिख रहा है।