UGC समता नियमों पर अगड़ों-पिछड़ों की रार में फंसी BJP: सवर्णों की नाराजगी के बीच केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में समीक्षा कमेटी का दिया प्रस्ताव
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए लाए गए 'समता विनियम 2026' (Equity Regulations 2026) ने भारतीय जनता पार्टी के सामने बड़ा सामाजिक और चुनावी संकट खड़ा कर दिया है। जहां एक तरफ भाजपा का पारंपरिक और कोर वोटर माना जाने वाला सवर्ण (सामान्य वर्ग) समाज इन नियमों में झूठी शिकायतों के दुरुपयोग और एकतरफा दंडात्मक कार्रवाई की आशंका जताते हुए सड़क पर उतर आया है, वहीं दूसरी तरफ अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), अनुसूचित जाति (SC) और जनजाति (ST) संगठन इसे अपने संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा का रक्षा-कवच मानकर इसके समर्थन में खड़े हैं।
इस चौतरफा रार और अंदरूनी बगावत के बीच केंद्र की मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक उच्चस्तरीय 'समीक्षा कमेटी' (Review Committee) गठित करने की पेशकश की है, जिसे आगामी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा के 'डैमेज कंट्रोल' के तौर पर देखा जा रहा है।
क्या है विवाद की मुख्य जड़? 2012 बनाम 2026 के नियम
यूजीसी विवाद की जड़ दरअसल भेदभाव की नई परिभाषा और सुरक्षा के दायरे में बदलाव से जुड़ी है:
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पुराना ढांचा (2012): 2012 के पुराने नियमों में केवल एससी (SC) और एसटी (ST) वर्ग के विद्यार्थियों के लिए कैंपस में भेदभाव विरोधी सुरक्षा प्रावधान थे।
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नया नियम (2026): जनवरी 2026 में जारी नए दिशा-निर्देशों में जातिगत भेदभाव से सुरक्षा के दायरे में पहली बार ओबीसी (OBC) वर्ग को भी शामिल कर लिया गया।
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सवर्ण संगठनों की आपत्ति: सामान्य वर्ग के छात्रों, प्रबुद्ध मंचों और विधिक विशेषज्ञों की मुख्य आपत्ति रेगुलेशन 3(1)(c) को लेकर है। उनका तर्क है कि इसमें सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों को भेदभाव से सुरक्षा नहीं दी गई है। साथ ही, यदि कोई छात्र द्वेषवश किसी प्रोफेसर या साथी छात्र पर झूठा या मनगढ़ंत आरोप लगा दे, तो झूठी शिकायत करने वाले के खिलाफ दंड का कोई स्पष्ट व कड़ा प्रावधान नहीं रखा गया है। सवर्ण समाज को आशंका है कि यह नियम परिसरों में 'रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन' को बढ़ावा देगा।
मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी को इन नियमों के अमल पर अंतरिम रोक (Stay) लगा दी थी, यह टिप्पणी करते हुए कि यह व्यवस्था पहली नजर में समाज को बांटने वाली प्रतीत होती है।
यूपी का चुनावी गणित: 22% सवर्ण बनाम 43% पिछड़ा वर्ग
इस पूरे विवाद का सबसे ज्यादा सियासी असर उत्तर प्रदेश में देखने को मिल रहा है:
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जातीय संरचना: यूपी में सवर्ण मतदाताओं की आबादी करीब 20 से 22 प्रतिशत है (जिसमें 10-11% ब्राह्मण, 7% क्षत्रिय और 3-4% वैश्य व अन्य हैं)। वहीं, ओबीसी की आबादी करीब 43% और एससी समुदाय की करीब 21% हिस्सेदारी है।
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125 सीटों पर अगड़ों का प्रभाव: राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, प्रदेश की करीब 125 विधानसभा सीटों पर सवर्ण मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
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दोधारी तलवार: 2024 के लोकसभा चुनाव में यूपी में 62 से घटकर 33 सीटों पर सिमटने वाली भाजपा 2027 के चुनाव से पहले किसी भी सूरत में अपने कोर सवर्ण आधार को खोने का जोखिम नहीं ले सकती। दूसरी ओर, यदि सरकार नियमों को पूरी तरह रद्द करती है, तो सपा-कांग्रेस गठबंधन को यह नैरेटिव बनाने का मौका मिल जाएगा कि भाजपा आरक्षण और पिछड़ा-दलित विरोधी है।
हाल ही में प्रयागराज में उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के कार्यक्रम में यूजीसी पर सवाल पूछने वाले एक ब्राह्मण युवक को भाजपा पार्षद द्वारा थप्पड़ मारने और उसके बाद भाजपा विधायक हर्षवर्धन बाजपेयी द्वारा "यूजीसी का विरोध करना हर ब्राह्मण का अधिकार है" का बयान देने से पार्टी के भीतर की रार खुलकर सतह पर आ गई है।
संघ (RSS) की एंट्री और 'समीक्षा कमेटी' का फॉर्मूला
भाजपा के वैचारिक संरक्षक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने भी इस मामले में सीधे हस्तक्षेप किया है। इंदौर में हुई संघ की बैठक के बाद राष्ट्रीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने स्पष्ट कहा कि यूजीसी का यह सर्कुलर असंतुलित था और जमीनी फीडबैक के आधार पर सरकार का ध्यान इस ओर दिलाया गया था।
इसी दबाव के चलते केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को आश्वस्त किया है कि वह सभी पक्षों, विधिक जानकारों और शिक्षाविदों को शामिल करते हुए एक 'समीक्षा समिति' (Review Committee) का गठन करने जा रही है। समिति का मुख्य काम झूठी शिकायतों से बचाव (Safe Guard Provisions) और सभी वर्गों के विद्यार्थियों के हितों की रक्षा सुनिश्चित करने के लिए नए सिरे से ड्राफ्ट तैयार करना होगा।
विपक्ष का हमला: 'यूपी चुनाव के खौफ में पीछे खींचे कदम'
विपक्षी दलों ने सरकार के समीक्षा कमेटी बनाने के फैसले को चुनावी मजबूरी और दिखावा करार दिया है।
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सपा और विपक्ष का रुख: समाजवादी पार्टी का कहना है कि भाजपा सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्गों के हक के प्रति कभी ईमानदार नहीं रही। चुनाव आते ही वह अपने सामाजिक समीकरणों को बिखरता देख कमेटियों के पीछे छिपने की कोशिश कर रही है।
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प्रियंका चतुर्वेदी का वार: शिवसेना (UBT) सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने तंज कसते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के आगामी विधानसभा चुनावों में हार के डर ने सरकार को सुप्रीम कोर्ट में जाकर बैकफुट पर आने और समीक्षा कमेटी बनाने का प्रस्ताव देने पर मजबूर कर दिया है।
भाजपा के लिए यह कमेटी अब वक्त हासिल करने (Time-buying mechanism) का माध्यम बनी है, ताकि अदालत और कमेटी के सहारे इस संवेदनशील मुद्दे को शांत रखकर चुनाव तक अपने सामाजिक गठबंधन को टूटने से बचाया जा सके।