चीनी ₹60 के पार, प्याज की कीमतों ने निकाले आंसू और सरसों तेल ने बिगाड़ा त्योहार का जायका
देशभर में रोशनी के महापर्व दिवाली और छठ पूजा की तैयारियों के बीच आम नागरिक की रसोई पर महंगाई का चौतरफा हमला हुआ है। त्योहारों के मौसम में जहां हर घर में मिठाइयों, पकवानों और विशेष व्यंजनों की खुशबू महकनी चाहिए थी, वहां आवश्यक खाद्य पदार्थों के तेजी से बढ़ते दामों ने आम और मध्यमवर्गीय परिवारों का मासिक बजट पूरी तरह बिगाड़ कर रख दिया है। थोक और खुदरा दोनों ही बाजारों में मिठास का आधार मानी जाने वाली चीनी के दाम ऐतिहासिक स्तर को छूते हुए ₹60 प्रति किलोग्राम के आंकड़े को पार कर चुके हैं। वहीं सब्जियों की रानी और हर भारतीय रसोई की बुनियादी जरूरत प्याज के तेवरों ने एक बार फिर आम उपभोक्ता की आंखों में आंसू ला दिए हैं। इसके साथ ही पकवानों को तलने और रोजमर्रा के भोजन को पकाने में अनिवार्य भूमिका निभाने वाला सरसों का तेल अचानक तेजी की गिरफ्त में आ चुका है। त्योहारी मांग के चरम पर पहुंचते ही जरूरी खाद्य वस्तुओं की कीमतों में आया यह अप्रत्याशित उछाल न केवल गृहणियों के माथे पर चिंता की गहरी लकीरें खींच रहा है, बल्कि बाजार में त्योहारी उत्साह को भी सुस्त करता नजर आ रहा है। आर्थिक जानकारों का मानना है कि त्योहारी सीजन में हर साल मांग में इजाफा होता है, लेकिन इस बार का परिदृश्य बेहद जटिल और चिंताजनक है। आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) में आई बाधाओं, प्रमुख उत्पादक राज्यों में बेमौसम बारिश के कारण फसलों को पहुंचे नुकसान और अंतरराष्ट्रीय खाद्य तेल बाजारों में आयात शुल्क से जुड़े नीतिगत बदलावों ने मिलकर घरेलू बाजार में एक ऐसा चक्रव्यूह रच दिया है, जिसकी सीधी मार आम आदमी की जेब पर पड़ रही है। मंडी से लेकर रिटेल किराना दुकानों तक कीमतें दिन-ब-दिन बदल रही हैं, जिससे आम उपभोक्ता आवश्यक खरीदारी में भी भारी कटौती करने के लिए विवश हो गया है।
चीनी के दाम ₹60 के पार: त्योहारी मांग के बीच मिलों से सप्लाई में भारी खिंचाव
दिवाली पर लड्डू, बर्फी, गुलाब जामुन और पारंपरिक मिठाइयों की खपत कई गुना बढ़ जाती है, लेकिन इस बार चीनी के खुदरा दामों ने उपभोक्ताओं को सबसे बड़ा झटका दिया है। उत्तर प्रदेश, दिल्ली-एनसीआर, बिहार और मध्य प्रदेश के अधिकांश खुदरा बाजारों में प्रीमियम और सामान्य ग्रेड चीनी की कीमतें ₹58 से ₹62 प्रति किलोग्राम के बीच पहुंच गई हैं। जो चीनी कुछ हफ्तों पहले तक ₹42 से ₹45 प्रति किलो के दायरे में आसानी से मिल रही थी, उसके दाम में 30 से 35 प्रतिशत का सीधा उछाल दर्ज किया गया है। थोक व्यापारियों का कहना है कि मिठाई निर्माताओं (हलवाइयों) और पैकेज्ड फूड कंपनियों की ओर से थोक उठाव बेहद तेज है, लेकिन उसके अनुपात में चीनी मिलों से जारी होने वाला मासिक कोटा बाजार की तात्कालिक मांग को पूरा करने के लिए नाकाफी साबित हो रहा है। इसके अलावा, गन्ने के नए पेराई सत्र (Crushing Season) की शुरुआत में हुई देरी भी कीमतों के भड़कने का एक प्रमुख तकनीकी कारण बनी है। उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के कई चीनी उत्पादक क्षेत्रों में पिछले महीनों हुई अनपेक्षित मानसूनी बारिश के कारण गन्ने की कटाई और मिलों तक ढुलाई का काम तय समय से पिछड़ गया। इसके चलते पुरानी चीनी के बफर स्टॉक पर दबाव बढ़ गया और सटोरियों ने कृत्रिम कमी का फायदा उठाकर थोक कीमतों को हवा दे दी। ग्रामीण और कस्बाई बाजारों में जहां पैकेज्ड चीनी के विकल्प सीमित हैं, वहां उपभोक्ताओं को मजबूरी में ₹62 से ₹64 प्रति किलो तक चुकाने पड़ रहे हैं, जिससे त्योहारी मिठाइयों की लागत में भारी वृद्धि हो चुकी है।
प्याज की कीमतों ने निकाले आंसू: ₹70 से ₹80 प्रति किलो तक पहुंचे भाव
सब्जी मंडी में प्याज का गणित हर साल सर्दियों की शुरुआत में बिगड़ता है, लेकिन इस बार प्याज की कीमतों का उछाल त्योहारों के ठीक मुहाने पर आकर खड़ा हो गया है। देश के प्रमुख महानगरों से लेकर जिला स्तर की मंडियों तक प्याज ₹70 से लेकर ₹85 प्रति किलोग्राम के भाव पर बिक रहा है। नासिक की लासलगांव मंडी, जो देश में प्याज के भाव तय करने का सबसे बड़ा केंद्र मानी जाती है, वहां से थोक आवक में लगभग 40 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। प्याज व्यापारियों का कहना है कि महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और कर्नाटक के उत्पादक बेल्ट में भारी बारिश के चलते खेतों में तैयार खड़ी खरीफ की फसल को भारी नुकसान पहुंचा है, जिससे नई फसल की आवक कम से कम तीन से चार हफ्ते पिछड़ गई है। जब तक कर्नाटक और आंध्र प्रदेश से खरीफ की लाल प्याज की बड़ी खेप उत्तर भारत की मंडियों में नहीं पहुंचती, तब तक बाजार पूरी तरह से कोल्ड स्टोरेज में रखे पुराने 'रबी प्याज' पर टिका हुआ है। चूंकि पुराने प्याज का स्टॉक अब अपने अंतिम चरण में है और नमी के कारण उसमें सड़न की मात्रा बढ़ रही है, इसलिए अच्छी गुणवत्ता वाले प्याज की किल्लत पैदा हो गई है। थोक मंडियों में ही प्याज ₹55 से ₹60 प्रति किलो के भाव पर उतर रहा है, जिसे रिटेल में लाते-लाते ढुलाई, लोडिंग और दुकानदारों के मार्जिन के बाद आम ग्राहक के लिए ₹80 प्रति किलो तक पहुंचना तय हो जाता है। इसने न केवल आम परिवारों का जायका बिगाड़ दिया है, बल्कि रेस्तरां और ढाबा संचालकों के लिए भी प्याज परोसा जाना एक महंगा सौदा बन गया है।
सरसों के तेल में अचानक लगी आग: 140 रुपये से उछलकर ₹175 से ₹190 के पार
दिवाली के दीयों को रोशन करने से लेकर पारंपरिक नमकीन और पूड़ी-पकवान बनाने तक, उत्तर भारतीय घरों में शुद्ध सरसों के तेल का कोई दूसरा विकल्प नहीं होता। लेकिन इस त्योहारी सीजन में सरसों के तेल की कीमतों ने उपभोक्ताओं को हैरान कर दिया है। मात्र एक से डेढ़ महीने के भीतर 1 लीटर सरसों के तेल का पाउच ₹135-₹145 के स्तर से छलांग लगाकर ₹175 से ₹190 प्रति लीटर तक पहुंच चुका है, जबकि प्रीमियम कोल्हू और कच्ची घानी के डिब्बे ₹200 प्रति लीटर के आंकड़े को छू रहे हैं। घरेलू स्तर पर सरसों के तेल में आई इस अचानक तेजी के पीछे केंद्र सरकार द्वारा कच्चे और रिफाइंड पाम ऑयल, सोयाबीन तेल और सूरजमुखी तेल पर बेसिक कस्टम ड्यूटी (आयात शुल्क) बढ़ाने का फैसला सीधे तौर पर जिम्मेदार माना जा रहा है। भारत खाद्य तेलों की अपनी कुल घरेलू जरूरत का 55 प्रतिशत से अधिक हिस्सा विदेशों से आयात करता है। सरकार द्वारा घरेलू तिलहन उत्पादक किसानों को लाभकारी मूल्य दिलाने के उद्देश्य से जब आयातित सस्ते पाम ऑयल और सोया तेल पर ड्यूटी बढ़ाई गई, तो उसका सीधा असर यह हुआ कि रिफाइंड और पाम तेल महंगे हो गए। विदेशी तेलों के महंगे होते ही बाजार में स्थानीय सरसों के तेल की मांग में अचानक भारी उछाल आ गया। देश भर की तेल मिलों में सरसों के बीजों (Mustard Seeds) की पेराई लागत बढ़ गई क्योंकि किसानों और बड़े व्यापारियों ने आगामी दिनों में और ऊंचे दामों की उम्मीद में बीजों की होल्डिंग शुरू कर दी। इसी सप्लाई-डिमांड असंतुलन का खामियाजा अब त्योहारों पर आम जनता को चुकाना पड़ रहा है।
उत्तर प्रदेश और उन्नाव की स्थानीय मंडियों का हाल: जमीनी हकीकत और त्योहारी हलचल
स्थानीय और भौगोलिक धरातल पर नजर डालें तो उत्तर प्रदेश के औद्योगिक व कृषि केंद्र उन्नाव, शुक्लागंज और पड़ोसी राजधानी लखनऊ की नवीन गल्ला मंडियों में भी इस महंगाई का असर साफ दिखाई दे रहा है। उन्नाव की कल्याणी देवी और स्टेशन रोड स्थित किराना बाजार में खुदरा चीनी ₹59 से ₹61 प्रति किलो के भाव पर बिक रही है, जबकि खुली चीनी ₹58 के नीचे नहीं उतर रही। उन्नाव की थोक सब्जी मंडी में नासिक और राजस्थान से आने वाले प्याज की दैनिक गाड़ियों की संख्या आधी रह गई है, जिसके चलते शहर के मुख्य मोहल्लों—आवास विकास, सिविल लाइंस और मगरवारा तक प्याज ₹75 प्रति किलो की दर पर बिक रहा है। उन्नाव और कानपुर के ग्रामीण इलाकों में पारंपरिक रूप से सरसों के तेल की खपत अत्यधिक है। स्थानीय कोल्हू संचालकों का कहना है कि उन्हें इस समय मंडी से सरसों का बीज ही ₹6,200 से ₹6,500 प्रति क्विंटल के भाव मिल रहा है, जिसके चलते तेल निकालने के बाद खली (Oil Cake) की बिक्री के बावजूद शुद्ध तेल की लागत ₹175 प्रति लीटर से नीचे नहीं बैठ पा रही है। स्थानीय हलवाई संघों का कहना है कि खोया, मावा और पनीर पहले से ही महंगे थे, अब चीनी और तेल के दामों में 30 प्रतिशत की तेजी आ जाने से दिवाली पर बिकने वाली पारंपरिक मिठाइयों के प्रति किलो दाम में कम से कम ₹40 से ₹60 का इजाफा करना उनकी मजबूरी बन गया है।
सरकारी दखल, बफर स्टॉक का वितरण और आगे क्या हैं राहत के संकेत?
खाद्य पदार्थों की इस अनियंत्रित तेजी पर काबू पाने और त्योहारी सीजन में जनता को फौरी राहत देने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने आपातकालीन स्तर पर कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन महासंघ (NAFED) और राष्ट्रीय उपभोक्ता सहकारी महासंघ (NCCF) को अपने 3 लाख टन के रणनीतिक बफर स्टॉक से प्याज को सीधे उपभोग वाले प्रमुख शहरों में उतारने के निर्देश दिए हैं। सरकार द्वारा प्रमुख रेलवे स्टेशनों, मोबाइल वैनों और केंद्रीय भंडार के आउटलेट्स पर ₹35 प्रति किलोग्राम की रियायती दर पर प्याज बेचने का अभियान शुरू किया गया है, हालांकि यह व्यवस्था बड़े शहरों के चुनिंदा केंद्रों तक ही सीमित होने के कारण छोटे कस्बों और सामान्य मोहल्लों में इसका कोई खास असर नहीं दिख रहा है। खाद्य विशेषज्ञों और कमोडिटी विश्लेषकों के अनुसार, चीनी और तेल की कीमतों में नरमी आने में अभी कम से कम 15 से 20 दिनों का समय लग सकता है। जब नवंबर के दूसरे पखवाड़े में उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र की मिलों में गन्ने की पेराई अपनी पूरी क्षमता पर शुरू हो जाएगी, तब चीनी की नई सप्लाई बाजार में उतरते ही दामों में ₹4 से ₹6 प्रति किलो तक की गिरावट आ सकती है। ठीक इसी प्रकार, मध्य नवंबर तक राजस्थान और मध्य प्रदेश से नई खरीफ प्याज की भारी आवक मंडियों में पहुंचते ही प्याज के भाव दोबारा ₹35 से ₹40 के सामान्य स्तर पर लौटने की उम्मीद है। लेकिन तब तक आम उपभोक्ताओं को दिवाली और छठ के इस पावन पर्व पर अपनी जेब ढीली करते हुए महंगाई के इस तीखे कड़वे घूंट को पीने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।