Ramayana: रामानंद सागर ने कैसे 'उड़ाया' था पुष्पक विमान? बिना CGI-VFX के ऐसे चला था देसी जुगाड़

Ramayana: रामानंद सागर ने कैसे 'उड़ाया' था पुष्पक विमान? बिना CGI-VFX के ऐसे चला था देसी जुगाड़

साल 1987 में जब दूरदर्शन पर रामानंद सागर की 'रामायण' का प्रसारण शुरू हुआ था, तब रविवार की सुबह देश की सड़कें पूरी तरह सूनी हो जाया करती थीं। लोग हाथ जोड़कर और जूते-चप्पल उतारकर टीवी सेट के आगे बैठते थे। उस दौर में न तो कंप्यूटर जनरेटेड इमेजरी यानी आज का एडवांस CGI मौजूद था और न ही हॉलीवुड जैसे भारी-भरकम बजट वाले डिजिटल विजुअल इफेक्ट्स (VFX)। इसके बावजूद जब स्क्रीन पर रावण का 'पुष्पक विमान' बादलों को चीरता हुआ उड़ता दिखाई देता था, तो करोड़ों दर्शक दांतों तले उंगलियां दबा लेते थे। आज के आधुनिक युग में जब सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च करके भी स्क्रीन पर असली जैसा प्रभाव नहीं दिखता, तब यह सवाल हर किसी के जेहन में उठता है कि आखिर रामानंद सागर और उनकी तकनीकी टीम ने बिना किसी हाई-एंड तकनीक के उस पुष्पक विमान को आसमान में कैसे उड़ाया था।

उस समय के फिल्म निर्माण में दिमाग, कला और सीमित संसाधनों का ऐसा बेहतरीन संगम देखने को मिलता था जिसे आज हम 'देसी तकनीकी जुगाड़' कहते हैं। रामानंद सागर ने पौराणिक कथाओं के सबसे दिव्य और जटिल दृश्यों को पर्दे पर सजीव करने के लिए कैमरे की बुनियादी तकनीकों और ऑप्टिकल इल्यूजन का ऐसा अद्भुत जाल बुना था, जिसने तकनीक के अभाव को कभी दर्शकों के सामने जाहिर ही नहीं होने दिया।

पुष्पक विमान की बनावट: थर्माकोल, प्लाईवुड और मिनीचर मॉडल

पुष्पक विमान को स्क्रीन पर दिखाने के लिए रामानंद सागर की टीम ने एक नहीं, बल्कि दो अलग-अलग तरह के विमान तैयार किए थे। पहला मॉडल था एक छोटा मिनीचर मॉडल, जिसे बेहद बारीकी से तराशा गया था। इस छोटे मॉडल को हल्के वजन वाले थर्माकोल, पतली प्लाईवुड, कार्डबोर्ड और सुनहरे गोटे-किनारी से तैयार किया गया था। इस मिनीचर विमान को एक पतले, पारदर्शी नायलॉन के धागे यानी फिशिंग वायर से बांधा जाता था, जो उस दौर के कैमरों की नजर में नहीं आता था।

वहीं दूसरा मॉडल था एक बड़ा, वास्तविक आकार का कटआउट और ढांचा। जब रावण द्वारा सीता हरण के बाद उन्हें विमान में ले जाने का दृश्य फिल्माना होता था, या भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण के लंका विजय के बाद अयोध्या लौटने का क्लोज-अप दृश्य शूट करना होता था, तब इस बड़े लकड़ी के ढांचे का इस्तेमाल किया जाता था। इस ढांचे को जमीन से कुछ फीट ऊपर लकड़ी के मजबूत मचानों पर टिकाया जाता था ताकि कलाकारों के हाव-भाव और डायलॉग डिलीवरी को आसानी से रिकॉर्ड किया जा सके।

क्रोमा की शुरुआत और 'ब्लू स्क्रीन' का जादुई इस्तेमाल

रामानंद सागर भारतीय टेलीविजन पर क्रोमा तकनीक का शुरुआती और सबसे प्रभावशाली इस्तेमाल करने वाले निर्देशकों में से एक थे। 80 के दशक के उत्तरार्ध में गुजरात के उमरगांव स्टूडियो में रामायण की शूटिंग के दौरान 'ब्लू स्क्रीन' (जिसे क्रोमा-की कहा जाता है) का एक बेसिक सेटअप लगाया गया था। पुष्पक विमान के क्लोज-अप शॉट्स के लिए कलाकारों को उस बड़े डमी मॉडल पर बैठाया जाता था और उनके पीछे नीला पर्दा लगा दिया जाता था।

शूटिंग के दौरान टेबल फैन और बड़े पंखों की मदद से कलाकारों के बालों और कपड़ों में हवा का ऐसा बहाव दिया जाता था, जिससे लगे कि विमान सचमुच हजारों फीट की ऊंचाई पर तेज गति से उड़ रहा है। इसके बाद वीडियो एडिटिंग टेबल पर एनालॉग वीडियो मिक्सर की मदद से नीले रंग को हटाकर उसकी जगह पहले से रिकॉर्ड किए गए आसमान और तैरते हुए बादलों के फुटेज को बैकग्राउंड में सुपरइम्पोज कर दिया जाता था। इस तकनीक को उस दौर में 'ऑप्टिकल कंपोजिटिंग' कहा जाता था।

शीशे, धूपबत्ती का धुआं और 'मिरर ट्रिक' का अनोखा तालमेल

मिनीचर पुष्पक विमान को बादलों के बीच उड़ता दिखाने के लिए एक और अनोखा और सस्ता फॉर्मूला अपनाया गया था। स्टूडियो के एक अंधेरे कमरे में टेबल पर शीशा बिछाया जाता था और उस पर सूखी बर्फ (ड्राई आइस) या अगरबत्ती और धूपबत्ती का गाढ़ा धुआं छोड़ा जाता था। यह धुआं देखने में बिल्कुल रूई के गोलों जैसे तैरते हुए बादलों जैसा प्रतीत होता था।

इसके बाद पतले तार से बंधे उस छोटे सुनहरे पुष्पक विमान को कैमरे के सामने धीरे-धीरे एक निश्चित कोण (एंगल) से सरकाया जाता था। कैमरे को इस तरह सेट किया जाता था कि धुआं नीचे रहे और विमान ऊपर से गुजरता दिखे। जब तेज रोशनी उस सुनहरे मॉडल पर पड़ती थी, तो वह चमकता हुआ सोने का विमान जैसा आभास देता था। एडिटिंग के समय इस मिनीचर फुटेज को एक्टर्स वाले ब्लू स्क्रीन शॉट के साथ इतनी सफाई से जोड़ दिया जाता था कि टीवी स्क्रीन पर देखने वाले दर्शक को यही लगता था कि सचमुच दिव्य विमान आसमान की सैर कर रहा है।

सीमित बजट में तकनीक की मिसाल बनी रामानंद सागर की सोच

रामानंद सागर के बेटे आनंद सागर और प्रेम सागर ने कई साक्षात्कारों में यह साझा किया है कि उस दौर में उनके पास हॉलीवुड जैसी महंगी मोशन-कंट्रोल मशीनें नहीं थीं। उनके पास केवल एक सीमित बजट वाला विशेष प्रभाव विभाग था, जिसकी कमान कुछ उत्साही तकनीशियनों के हाथों में थी। पुष्पक विमान ही नहीं, बल्कि उड़ते हुए हनुमान जी, समुद्र पर तैरते पत्थर और युद्ध के दौरान टकराते दिव्य बाणों के दृश्यों को भी इसी तरह के विजुअल इल्यूजन, स्टॉप-मोशन और ग्लास पेंटिंग के जरिए बनाया गया था।

आज जब फिल्म निर्माता सैकड़ों करोड़ रुपये के आधुनिक कंप्यूटर ग्राफिक्स का उपयोग करने के बावजूद कई बार किरदारों और दृश्यों में स्वाभाविकता नहीं ला पाते, तब रामानंद सागर का यह चार दशक पुराना काम एक मिसाल बनकर उभरता है। बिना किसी कंप्यूटर और सॉफ्टवेयर के केवल थर्माकोल, पंखे, धूप के धुएं और धागों के सहारे पुष्पक विमान को आसमान में तैरा देना यह साबित करता है कि सच्ची रचनात्मकता साधनों की मोहताज नहीं होती, बल्कि कल्पना शक्ति और समर्पण से जन्म लेती है।