'पाकिस्तान का औजार मत बनो', OIC के मुस्लिम देशों को भारत का दो टूक जवाब; जम्मू-कश्मीर पर बयान को बताया झूठा
इस्लामी सहयोग संगठन यानी ओआईसी (Organisation of Islamic Cooperation) द्वारा जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में पारित किए गए प्रस्ताव पर भारत सरकार ने बेहद सख्त और बेबाक रुख अपनाया है। भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने ओआईसी के इस कदम को सीधे तौर पर भारत के आंतरिक मामलों में अवांछित हस्तक्षेप करार देते हुए सिरे से खारिज कर दिया। नई दिल्ली ने साफ शब्दों में कहा कि 57 मुस्लिम बहुल देशों का यह समूह एक बार फिर पाकिस्तान के संकीर्ण राजनीतिक एजेंडे और भारत-विरोधी दुर्भावनापूर्ण दुष्प्रचार का औजार बन गया है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों से यह स्पष्ट कर दिया कि इस तरह के बेबुनियाद प्रस्तावों और बयानों की न तो कोई कानूनी वैधता है और न ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई साख।
विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता ने मीडिया ब्रीफिंग में तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत का अभिन्न, अविभाज्य और अटूट हिस्सा थे, हैं और हमेशा रहेंगे। भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से जुड़े मामलों पर किसी तीसरे पक्ष या बाहरी संगठन को बयानबाजी करने का कोई नैतिक या संवैधानिक अधिकार हासिल नहीं है।
'पाकिस्तान की कठपुतली न बने संगठन', भारत की दो टूक नसीहत
भारत ने ओआईसी सदस्य देशों को आईना दिखाते हुए स्पष्ट चेतावनी दी कि वे खुद को पाकिस्तान के हाथों का मोहरा न बनने दें। विदेश मंत्रालय ने कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय संगठन अपने मंच का इस्तेमाल एक ऐसे मुल्क को करने दे रहा है, जिसका पूरा अस्तित्व ही सीमा पार आतंकवाद, धार्मिक उन्माद और झूठे आख्यानों पर टिका हुआ है। पाकिस्तान अपनी घरेलू विफलताओं, चरमराती अर्थव्यवस्था और मानवाधिकार हनन के गंभीर मामलों से वैश्विक ध्यान भटकाने के लिए ओआईसी जैसे बहुपक्षीय मंचों का दुरुपयोग करता आ रहा है।
भारत ने मुस्लिम राष्ट्रों से अपील की कि वे जमीनी हकीकत को समझें और पाकिस्तान के दुर्भावनापूर्ण प्रचार में फंसने के बजाय अपने राजनयिक संबंधों को निष्पक्षता और परिपक्वता के साथ आगे बढ़ाएं। प्रवक्ता ने कहा कि एक ऐसे देश के इशारे पर भारत के लोकतांत्रिक ढांचे पर उंगली उठाना हास्यास्पद है, जहां लोकतंत्र खुद सैन्य हुकूमत और चरमपंथियों की दया पर निर्भर रहता है।
जम्मू-कश्मीर में तेज गति से बदलती जमीनी हकीकत का दिया हवाला
भारतीय राजनयिकों ने ओआईसी को वास्तविकता का पाठ पढ़ाते हुए रेखांकित किया कि पिछले कुछ वर्षों में जम्मू-कश्मीर ने विकास, शांति और लोकतांत्रिक मजबूती का एक नया दौर देखा है। अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण के बाद घाटी में हिंसा, पथराव और अलगाववादी बंद की घटनाओं पर पूरी तरह लगाम लगी है। वहां रिकॉर्ड संख्या में स्थानीय नागरिकों ने विधानसभा और पंचायती चुनावों में हिस्सा लेकर भारतीय लोकतांत्रिक प्रणाली में अपना अटूट विश्वास जताया है।
विदेश मंत्रालय ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि आज का जम्मू-कश्मीर इंफ्रास्ट्रक्चर, आधुनिक शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, रिकॉर्ड तोड़ पर्यटन और विदेशी निवेश का प्रमुख केंद्र बन चुका है। खाड़ी देशों की कई प्रतिष्ठित कंपनियों ने खुद श्रीनगर और जम्मू में बड़े निवेश प्रोजेक्ट्स शुरू किए हैं। ऐसे समय में जब स्थानीय कश्मीरी युवा मुख्यधारा से जुड़कर भारत की विकास यात्रा में कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं, ओआईसी का पुराना, घिसा-पिटा और नकारात्मक नैरेटिव केवल पाकिस्तान के झूठे प्रोपेगैंडा को जिंदा रखने की नाकाम कोशिश भर है।
पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद और पीओके के मानवाधिकार संकट पर घेरा
भारत ने ओआईसी के प्रस्ताव को बेनकाब करते हुए इस बात पर गहरा क्षोभ जताया कि यह संगठन कभी भी पाकिस्तान द्वारा अवैध रूप से कब्जाए गए कश्मीर (PoK) और गिलगित-बाल्टिस्तान में हो रहे भीषण अत्याचारों पर एक शब्द नहीं बोलता। PoK में लगातार हो रहे जन-आंदोलन, बुनियादी सुविधाओं का अभाव और वहां की जनता पर पाकिस्तानी सेना द्वारा किए जाने वाले दमनकारी रवैये पर ओआईसी ने हमेशा रहस्यमयी चुप्पी साध रखी है।
विदेश मंत्रालय ने दो टूक कहा कि यदि ओआईसी को वास्तव में कश्मीर के लोगों के अधिकारों की फिक्र है, तो उसे सबसे पहले पाकिस्तान से कहना चाहिए कि वह भारतीय भूभाग पर किए गए अपने अवैध और जबरन कब्जे को तुरंत खाली करे। इसके अलावा, सीमा पार से आतंकियों की घुसपैठ कराना, हथियार और नशीले पदार्थों की तस्करी करना और भारत में बेकसूर नागरिकों को निशाना बनाने वाले आतंकी ठिकानों को पनाह देना बंद करे। जब तक पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद पर बात नहीं होती, तब तक शांति और अधिकारों पर ओआईसी का कोई भी उपदेश केवल दोगलापन ही कहलाएगा।
वैश्विक कूटनीति में अलग-थलग पड़ता पाकिस्तान का प्रोपेगैंडा
भारत के इस आक्रामक और स्पष्ट रुख से यह साफ हो गया है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश अब किसी भी मंच पर अपने आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। विशेष रूप से संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सऊदी अरब और अन्य प्रमुख मध्य-पूर्व के देशों के साथ भारत के द्विपक्षीय रिश्ते वर्तमान में रणनीतिक, आर्थिक और ऊर्जा क्षेत्र में ऐतिहासिक ऊंचाइयों पर हैं। इन देशों के साथ भारत की साझेदारी इतनी मजबूत हो चुकी है कि पाकिस्तान ओआईसी के मंचों से औपचारिक प्रस्ताव तो पास करवा लेता है, लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर खाड़ी के प्रभावशाली देश भारत के खिलाफ किसी भी कदम से पूरी तरह दूरी बनाए रखते हैं।
कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का यह पलटवार यह संदेश देने के लिए पर्याप्त है कि जम्मू-कश्मीर का मुद्दा अब अंतरराष्ट्रीय बहस का विषय नहीं रह गया है। यह भारत का आंतरिक मामला है और देश की संसद तथा न्यायपालिका ही इसके भविष्य का फैसला करने के लिए पूर्णतः सक्षम हैं। पाकिस्तान द्वारा अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में रोना रोने की आदत पुरानी हो चुकी है, और भारत के इस मुंहतोड़ जवाब ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि झूठे प्रोपेगैंडा की उम्र बहुत छोटी होती है।