'IAS मत बनना', बच्चों को ऐसी सलाह क्यों दे रहे हैं तुकाराम मुंढे? जननेता और उद्यमी बनने का दिया नया विजन
महाराष्ट्र कैडर के 2005 बैच के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी और वर्तमान में राज्य के एफडीए (खाद्य एवं औषधि प्रशासन) आयुक्त तुकाराम मुंढे अपनी सख्त कार्यप्रणाली, भ्रष्टाचार विरोधी कड़े कदमों और अनुशासनप्रिय छवि के लिए जाने जाते हैं। हाल ही में पिंपरी-चिंचवड़ में आयोजित 'ग्लोबल मराठा बिजनेस एक्सपो' के दौरान जब उनसे पूछा गया कि यदि उनके बच्चे उनसे पूछें कि उन्हें आईएएस बनना चाहिए या उद्यमी, तो उनकी क्या सलाह होगी? इस पर मुंढे ने बेबाकी से जवाब दिया कि यदि उनके बच्चे उनसे आईएएस बनने की सलाह मांगेंगे, तो उनका सीधा और स्पष्ट जवाब होगा—'आईएएस मत बनना'।
इस बयान ने सिविल सेवा की तैयारी कर रहे लाखों युवाओं और प्रशासनिक गलियारों को हैरान कर दिया है। तुकाराम मुंढे ने खुद कड़े संघर्ष और गरीबी से निकलकर यूपीएससी में ऑल इंडिया 20वीं रैंक हासिल की थी। ऐसे मुकाम पर पहुंचकर अपने ही बच्चों को इस सेवा से बचने की सलाह देने के पीछे उनके 21 साल के सेवाकाल का कटु अनुभव और पारिवारिक त्याग मुख्य वजह है।
बच्चों को आईएएस न बनने की सलाह क्यों दे रहे हैं तुकाराम मुंढे?
तुकाराम मुंढे ने प्रशासनिक सेवा की उस अंधेरी हकीकत को उजागर किया, जिसकी कीमत अक्सर एक अधिकारी के पूरे परिवार को चुकानी पड़ती है। उन्होंने इसके पीछे मुख्य रूप से निम्नलिखित कारण बताए:
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लगातार तबादलों का दंश: अपने करीब 21 साल के करियर में तुकाराम मुंढे का 25 बार से ज्यादा तबादला हो चुका है। जब कोई अधिकारी नियमों और कानूनों पर अडिग रहता है, तो राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव के चलते उसे बार-बार स्थानांतरित किया जाता है।
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बच्चों की पढ़ाई और मानसिक स्थिरता पर असर: मुंढे ने अपनी निजी जिंदगी का उदाहरण देते हुए साझा किया कि लगातार होने वाले तबादलों के कारण उनके बेटे को 5वीं कक्षा में पहुंचने से पहले ही 6 बार स्कूल बदलना पड़ा। बार-बार नए शहर में जाना, नए माहौल में ढलना और पुराने दोस्तों से बिछड़ना बच्चों के मानसिक विकास और सामाजिक स्थिरता को बुरी तरह प्रभावित करता है।
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परिवार की निजी योजनाओं की कुर्बानी: उन्होंने बताया कि प्रशासनिक सेवा का चुनाव उन्होंने अपनी मर्जी से किया था और वे संघर्षों के लिए मानसिक रूप से तैयार थे, लेकिन उनकी पत्नी और बच्चों को बिना किसी गलती के अपनी घरेलू व निजी योजनाओं को बार-बार कुर्बान करना पड़ा।
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प्रशासनिक बंदिशें और निर्णय लेने की सीमित आजादी: नौकरशाही में रहने के बावजूद नियमों, प्रक्रियाओं और लालफीताशाही की कई ऐसी सीमाएं होती हैं जो किसी अधिकारी की स्वतंत्र सोच और सीधे प्रभाव डालने की क्षमता को सीमित कर देती हैं। मुंढे नहीं चाहते कि उनके बच्चे ऐसी व्यवस्था में बंधकर अपनी स्वतंत्रता खोएं।
आईएएस नहीं, तो क्या बनने की दी सलाह?
तुकाराम मुंढे ने केवल मनाही ही नहीं की, बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि वे अपने बच्चों और आज की युवा पीढ़ी (Gen-Z) को किस दिशा में आगे बढ़ते देखना चाहते हैं:
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जननेता (Public Leader): मुंढे ने कहा कि आईएएस बनकर व्यवस्था के भीतर बंधने से कहीं बेहतर है कि व्यक्ति एक 'जननेता' यानी पब्लिक लीडर बने। समाज के विकास में योगदान देने के लिए सरकारी कुर्सी की जरूरत नहीं होती; एक स्वतंत्र नेता के रूप में जनता के बीच रहकर बिना किसी प्रशासनिक दबाव के समाज में बड़ा और स्थायी बदलाव लाया जा सकता है।
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सफल उद्यमी (Entrepreneur): उन्होंने युवाओं को उद्यमिता का रास्ता चुनने की प्रेरणा दी। उद्यमी बनकर युवा न केवल अपने विचारों को धरातल पर उतार सकते हैं और रोजगार सृजित कर सकते हैं, बल्कि वे निर्णय लेने की पूरी आजादी के साथ देश की अर्थव्यवस्था और समाज को सीधे लाभ पहुंचा सकते हैं।
आज की 'जेन-जी' (Gen-Z) पीढ़ी पर जताया भरोसा
तुकाराम मुंढे ने आज की युवा पीढ़ी की क्षमताओं की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि वर्तमान पीढ़ी के पास असीमित ऊर्जा, उन्नत ज्ञान और सूचनाओं का अकूत भंडार है। यह पीढ़ी बेहद तेज है और एक ही जगह बंधकर काम करना पसंद नहीं करती।
मुंढे के अनुसार, आज के युवाओं को ऐसे करियर चुनने चाहिए जहां वे अपनी प्रतिभा का पूरा इस्तेमाल कर सकें और बिना किसी प्रशासनिक बेड़ियों के समाज के लिए खुलकर काम कर सकें। उन्होंने स्पष्ट किया कि करियर का फैसला अंततः बच्चों का खुद का होना चाहिए, लेकिन एक पिता और अनुभवी सिविल सेवक के रूप में वे उन्हें नौकरशाही के बजाय स्वतंत्र नेतृत्व का रास्ता चुनने की ही सलाह देंगे।