कभी 30 रुपये दिहाड़ी पर पेट्रोल पंप पर बेचती थीं कॉफी, आज 5 नेशनल अवॉर्ड जीतकर बनाया अटूट रिकॉर्ड
भारतीय सिनेमा के इतिहास में जब भी संजीदा अभिनय, यथार्थवादी किरदारों और समानांतर सिनेमा (Parallel Cinema) की बात होती है, तो एक नाम सबसे पहले जेहन में उभरता है—शबाना आजमी। अपनी सधी हुई अदाकारी से दर्शकों के दिलों पर राज करने वाली शबाना आजमी के नाम भारतीय फिल्म उद्योग का एक ऐसा ऐतिहासिक और ऑल-टाइम रिकॉर्ड दर्ज है, जिसे आज तक देश का कोई भी दूसरा अभिनेता या अभिनेत्री नहीं तोड़ सका है। वह भारतीय सिनेमा की इकलौती ऐसी कलाकार हैं जिन्होंने 'सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री' (Best Actress) की श्रेणी में एक या दो बार नहीं, बल्कि पूरे 5 बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार अपने नाम किया है। हालांकि, सफलता और सम्मान के इस सर्वोच्च शिखर तक पहुंचने का उनका शुरुआती सफर आसान नहीं था, और कभी उन्होंने अपनी पॉकेट मनी जुटाने के लिए रोजाना महज 30 रुपये की दिहाड़ी पर कॉफी तक बेची थी।
कभी 30 रुपये की दिहाड़ी पर पेट्रोल पंप पर बेचती थीं कॉफी
शबाना आजमी का जन्म 18 सितंबर 1950 को हैदराबाद में एक बेहद प्रतिष्ठित और साहित्यिक परिवार में हुआ था। उनके पिता कैफी आजमी देश के मशहूर शायर व गीतकार थे और मां शौकत आजमी थिएटर जगत की जानी-मानी अभिनेत्री थीं। घर में कला और साहित्य का समृद्ध माहौल होने के बावजूद शबाना ने कभी विशेषाधिकारों पर निर्भर रहना पसंद नहीं किया।
कॉलेज के दिनों में अपनी खुद की पॉकेट मनी निकालने और आत्मनिर्भर बनने के लिए उन्होंने मुंबई के एक पेट्रोल पंप पर 'कॉफी प्रमोटर' के रूप में काम शुरू किया था। वहां आने वाले राहगीरों और ग्राहकों को कॉफी बेचने के बदले उन्हें रोजाना मात्र 30 रुपये मेहनताना मिलता था। शबाना आजमी अक्सर अपने साक्षात्कारों में इस बात का जिक्र करती हैं कि उस शुरुआती संघर्ष और साधारण लोगों के बीच बिताए वक्त ने उन्हें आम जिंदगी की वास्तविकताओं और मानवीय संवेदनाओं को बेहद करीब से समझने की दृष्टि दी, जिसने आगे चलकर उनके अभिनय को बेमिसाल गहराई प्रदान की।
FTII से गोल्ड मेडल और पहली ही फिल्म 'अंकुर' से रचा इतिहास
शबाना आजमी ने अभिनय की बारीकियां सीखने के लिए पुणे स्थित देश के प्रतिष्ठित संस्थान 'फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया' (FTII) में दाखिला लिया। संस्थान में अपनी असाधारण प्रतिभा के दम पर उन्होंने एक्टिंग कोर्स पूरा करते हुए गोल्ड मेडल हासिल किया। इसके बाद साल 1974 में निर्देशक श्याम बेनेगल की कालजयी फिल्म 'अंकुर' के जरिए उन्होंने हिंदी सिनेमा के बड़े पर्दे पर कदम रखा।
अपनी डेब्यू फिल्म 'अंकुर' में शबाना ने एक ग्रामीण महिला 'लक्ष्मी' का ऐसा जीवंत और यथार्थवादी किरदार निभाया कि पूरी फिल्म इंडस्ट्री दंग रह गई। पहली ही फिल्म के लिए उन्हें 'सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री' का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला, जिसने यह साफ कर दिया कि भारतीय सिनेमा को एक नया और क्रांतिकारी चेहरा मिल चुका है।
इन 5 कालजयी फिल्मों के लिए मिला 'बेस्ट एक्ट्रेस' का राष्ट्रीय पुरस्कार
शबाना आजमी ने 1980 के दशक में लगातार तीन साल नेशनल अवॉर्ड जीतकर एक अनोखी हैट्रिक भी अपने नाम की थी:
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अंकुर (1974): श्याम बेनेगल के निर्देशन में बनी पहली ही फिल्म में जमींदारी प्रथा और ग्रामीण शोषण के खिलाफ आवाज उठाती महिला का किरदार।
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अर्थ (1982): महेश भट्ट की इस क्लासिक फिल्म में उन्होंने वैवाहिक धोखे, तलाक के दर्द और एक आत्मनिर्भर महिला के आत्मसम्मान को पर्दे पर अमर कर दिया।
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खंडहर (1983): मृणाल सेन द्वारा निर्देशित इस गंभीर फिल्म में उनकी खामोश और संजीदा अदाकारी को देश भर में सराहा गया।
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पार (1984): गौतम घोष की इस फिल्म में 'रामा' के किरदार में बिहार के वंचित तबके के अस्तित्व और संघर्ष को दिखाकर उन्होंने लगातार तीसरा राष्ट्रीय पुरस्कार जीता।
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गॉडमदर (1998): विनय शुक्ला की इस फिल्म में पोरबंदर की माफिया गॉडमदर 'रामबाई' की बेहद दबंग, राजनीतिक और जटिल भूमिका निभाकर उन्होंने 5वीं बार नेशनल अवॉर्ड अपने नाम किया।
अमिताभ बच्चन और ममूटी भी इस रिकॉर्ड में रह गए पीछे
भारतीय सिनेमा में सबसे ज्यादा राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने के मामले में शबाना आजमी पुरुष अभिनेताओं से भी आगे हैं। बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन और मलयालम सिनेमा के सुपरस्टार ममूटी ने चार-चार बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार जीता है। वहीं, शबाना आजमी ने 5 बार यह प्रतिष्ठित खिताब जीतकर भारतीय सिनेमा के इतिहास में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज करा लिया है।
पांच राष्ट्रीय पुरस्कारों के अलावा शबाना आजमी को भारत सरकार द्वारा देश के शीर्ष नागरिक सम्मानों पद्म श्री (1988) और पद्म भूषण (2012) से भी सम्मानित किया जा चुका है। 30 रुपये की दिहाड़ी से शुरू होकर सिनेमा और सामाजिक सक्रियता के शिखर तक पहुंचने वाली शबाना आजमी की यह कहानी आज भी लाखों युवाओं और कलाकारों के लिए प्रेरणा का एक अटूट स्रोत है।