8.2 IMDb रेटिंग वाली ये मास्टरपीस 13 साल बाद OTT पर हुई रिलीज: 2 नेशनल अवॉर्ड जीतने वाली इस फिल्म को मिस न करें

8.2 IMDb रेटिंग वाली ये मास्टरपीस 13 साल बाद OTT पर हुई रिलीज: 2 नेशनल अवॉर्ड जीतने वाली इस फिल्म को मिस न करें

सिनेमा जगत में कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों से कहीं आगे निकलकर समाज के रोंगटे खड़े कर देती हैं और इतिहास के पन्नों में अमर हो जाती हैं। अगर आप वीकेंड पर सच्ची घटनाओं पर आधारित संजीदा, झकझोर देने वाला और वास्तविकता से भरा सिनेमा देखना पसंद करते हैं, तो ओटीटी की दुनिया से आपके लिए एक बेहद बड़ी और बहुप्रतीक्षित खबर सामने आई है। सिनेमाघरों में रिलीज होने के पूरे 13 साल के लंबे इंतजार के बाद आखिरकार 8.2 की शानदार IMDb रेटिंग वाली बहुचर्चित बायोग्राफिकल ड्रामा फिल्म ने ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दस्तक दे दी है। दो-दो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (National Film Awards) जीत चुकी इस कल्ट क्लासिक फिल्म को अब प्रमुख ओटीटी प्लेटफॉर्म अमेजन प्राइम वीडियो पर स्ट्रीम कर दिया गया है।

13 साल बाद ओटीटी पर लौटी राजकुमार राव की कल्ट क्लासिक फिल्म 'शाहिद'

हम जिस फिल्म की बात कर रहे हैं, उसका नाम है 'शाहिद' (Shahid)। साल 2013 में जब यह फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी, तब इसने भारतीय सिनेमा में यथार्थवादी कोर्टरूम ड्रामा की परिभाषा ही बदल दी थी। फिल्म का निर्देशन जाने-माने फिल्मकार हंसल मेहता ने किया था, जबकि कहानी और पटकथा को अपूर्व असरानी ने लिखा था। अनुराग कश्यप और रॉनी स्क्रूवाला के प्रोडक्शन में बनी इस फिल्म को रिलीज के समय आलोचकों और दर्शकों की तरफ से जबरदस्त सराहना मिली थी। हालांकि, सिनेमाघरों से उतरने के बाद यह फिल्म किसी भी प्रमुख डिजिटल स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर आधिकारिक रूप से लंबे समय तक उपलब्ध नहीं हो पाई थी। अब 13 साल के अंतराल के बाद जब यह प्राइम वीडियो पर आई है, तो सिनेमा प्रेमियों के बीच इसे लेकर भारी उत्साह देखने को मिल रहा है।

कौन थे शाहिद आजमी: एक वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता की रूह कंपा देने वाली दास्तान

फिल्म 'शाहिद' किसी काल्पनिक कहानी पर नहीं, बल्कि दिवंगत वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता शाहिद आजमी के संघर्षपूर्ण जीवन पर आधारित एक सच्ची बायोपिक है। शाहिद आजमी की साल 2010 में मुंबई स्थित उनके ही दफ्तर में अज्ञात हमलावरों द्वारा गोली मारकर बेरहमी से हत्या कर दी गई थी।

फिल्म की शुरुआत 1992 के मुंबई दंगों से होती है, जहां मासूम शाहिद और उसका परिवार भयानक सांप्रदायिक हिंसा का शिकार बनता है। इस खौफनाक मंजर से व्यथित होकर शाहिद कश्मीर चला जाता है और कुछ समय के लिए एक चरमपंथी कैंप में पहुंच जाता है। लेकिन वहां की क्रूरता और हत्याओं को देखकर उसका मोहभंग हो जाता है और वह तुरंत मुंबई लौट आता है। हालांकि, मुंबई लौटते ही उस पर टाडा (TADA) कानून के तहत मुकदमा दर्ज कर दिया जाता है और उसे दिल्ली की तिहाड़ जेल भेज दिया जाता है, जहां वह सात साल की लंबी सजा काटता है।

जेल की कालकोठरी से कोर्टरूम तक का सफर: बेगुनाहों के मसीहा बनने की कहानी

तिहाड़ जेल की सलाखों के पीछे बिताए गए समय ने शाहिद की जिंदगी को पूरी तरह बदल दिया। जेल में ही उन्हें उच्च शिक्षा प्राप्त करने की प्रेरणा मिली। जब वे सभी आरोपों से बरी होकर बाहर आए, तो उन्होंने कानून की पढ़ाई पूरी की और आपराधिक मामलों के वकील बने।

वकील बनने के बाद शाहिद आजमी ने अपनी पूरी जिंदगी उन गरीब और बेकसूर मुस्लिम युवकों को कानूनी इंसाफ दिलाने में झोंक दी, जिन्हें आतंकवाद और मकोका जैसे कड़े कानूनों के तहत झूठे मामलों में फंसा दिया गया था। उन्होंने 26/11 मुंबई आतंकी हमलों के आरोपियों के केस से लेकर कई बड़े मानवाधिकार मामलों की वकालत की। कोर्ट के भीतर और बाहर लगातार मिल रही जान से मारने की धमकियों के बावजूद वे न्याय की लड़ाई लड़ते रहे, जब तक कि उन्हें गोलियों से भून नहीं दिया गया।

दो राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजी गई थी यह फिल्म: राजकुमार राव का मील का पत्थर अभिनय

फिल्म 'शाहिद' को भारतीय सिनेमा में उसके असाधारण योगदान के लिए साल 2014 में 61वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में दो बड़े सम्मान प्राप्त हुए थे। हंसल मेहता को 'बेस्ट डायरेक्शन' के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, वहीं मुख्य भूमिका निभाने वाले अभिनेता राजकुमार राव को 'बेस्ट एक्टर' (सर्वश्रेष्ठ अभिनेता) के नेशनल अवॉर्ड से नवाजा गया था।

राजकुमार राव ने शाहिद आजमी के दर्द, गुस्से, लाचारी और अदालती जिरह की दृढ़ता को इतनी बारीकी और सहजता से पर्दे पर जिया कि यह उनके करियर का सबसे बेहतरीन और यादगार अभिनय माना गया। राजकुमार के अलावा फिल्म में मोहम्मद जीशान अय्यूब, प्रभलीन संधू, के के मेनन और बलजिंदर कौर जैसे दिग्गज कलाकारों ने भी अपने किरदारों में जान फूंक दी थी।

ओटीटी रिलीज में देरी पर मेकर्स ने उठाए थे तीखे सवाल

इतनी प्रतिष्ठित और राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म को डिजिटल प्लेटफॉर्म मिलने में 13 साल का लंबा वक्त क्यों लग गया, इसे लेकर फिल्म के राइटर-एडिटर अपूर्व असरानी ने हाल ही में सोशल मीडिया पर अपनी गहरी निराशा व्यक्त की थी। उन्होंने पोस्ट शेयर करते हुए सवाल उठाया था कि जिस फिल्म ने देश का सर्वोच्च सिनेमाई सम्मान जीता और जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया, उसे किसी भी बड़े स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर जगह पाने के लिए 13 साल तक संघर्ष क्यों करना पड़ा। अब जब प्राइम वीडियो ने इसे अपनी लाइब्रेरी में शामिल किया है, तो दर्शकों को एक बार फिर इस बेजोड़ कृति को देखने का मौका मिल रहा है।

वीकेंड पर क्यों मस्ट-वॉच है 'शाहिद'?

अगर आप सतही कमर्शियल फिल्मों, फूहड़ कॉमेडी और मसाला एक्शन से हटकर किसी ऐसी कहानी की तलाश में हैं जो आपकी अंतरात्मा को झकझोर दे, तो 'शाहिद' इस वीकेंड आपकी पहली पसंद होनी चाहिए। यह फिल्म न्याय व्यवस्था की जटिलताओं, सामाजिक पूर्वाग्रहों और एक अकेले इंसान की व्यवस्था से जंग को बिना किसी लाग-लपेट के बेहद ईमानदारी से दिखाती है।