अच्छी हिंदी बोलने के बावजूद 'रामायण' में क्यों डब हुई यश की आवाज? माता सीता के लिए इस आर्टिस्ट ने दिए डायलॉग

अच्छी हिंदी बोलने के बावजूद 'रामायण' में क्यों डब हुई यश की आवाज? माता सीता के लिए इस आर्टिस्ट ने दिए डायलॉग

बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्डतोड़ कमाई कर रही निर्देशक नितेश तिवारी की भव्य फिल्म 'रामायण: भाग 1' में जहां एक तरफ कलाकारों के अभिनय की जमकर तारीफ हो रही है, वहीं दूसरी तरफ किरदारों की आवाज और संवाद अदायगी भी सिनेमा प्रेमियों के बीच चर्चा का सबसे बड़ा विषय बनी हुई है। फिल्म में कन्नड़ सिनेमा के 'रॉकिंग स्टार' यश ने लंकापति रावण का खूंखार और रौद्र किरदार निभाया है। यश अपनी फिल्मों के प्रमोशन और साक्षात्कारों में बेहद सहज और स्पष्ट हिंदी बोलते नजर आते हैं, ऐसे में दर्शकों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक था कि जब यश खुद अच्छी हिंदी बोल लेते हैं, तो मेकर्स को रावण के लिए अलग से वॉइस आर्टिस्ट की मदद क्यों लेनी पड़ी? इस सवाल का जवाब खुद फिल्म की कोर क्रिएटिव टीम और डबिंग करने वाले दिग्गज अभिनेता शरद केलकर के अनुभवों से सामने आया है। आम बोलचाल की हिंदी और एक महाकाव्य के सबसे विद्वान, वेदों के ज्ञाता व अहंकारी महापंडित रावण के संवादों में जमीन-आसमान का फर्क होता है। यश हिंदी में अपनी बात भले ही बखूबी रख लेते हैं, लेकिन उनकी स्वाभाविक आवाज और टोन में दक्षिण भारतीय (कन्नड़) प्रभाव का हल्का सा टच आता है। नितेश तिवारी और निर्माता नमित मल्होत्रा रामायण जैसी पावन गाथा में भाषा, उच्चारण और ठहराव को लेकर तनिक भी जोखिम नहीं उठाना चाहते थे। रावण के संवादों में क्लिष्ट हिंदी और संस्कृतनिष्ठ शब्दावली का भारी प्रयोग था, जिसके लिए एक ऐसे भारी-भरकम, गूंजते हुए और शुद्ध उच्चारण वाले बेस (Baritone) की दरकार थी, जो थिएटर में बैठे दर्शक के रोंगटे खड़े कर दे। यही वजह रही कि यश के शानदार स्क्रीन प्रेजेंस के साथ शरद केलकर की वज्र जैसी आवाज को जोड़ने का बड़ा और साहसिक फैसला लिया गया।

माता सीता के लिए किस वॉइस आर्टिस्ट ने दिए मधुर और शुद्ध हिंदी डायलॉग?

फिल्म में जिस तरह रावण के किरदार की डबिंग को लेकर उत्सुकता थी, ठीक वैसा ही कौतूहल माता सीता का पावन किरदार निभाने वाली दक्षिण भारतीय अभिनेत्री साई पल्लवी की आवाज को लेकर भी बना हुआ था। साई पल्लवी अपनी सादगी, प्राकृतिक अभिनय और चेहरे के सौम्य भावों के लिए पूरे देश में पसंद की जाती हैं। उन्होंने पर्दे पर जनकपुत्री सीता के रूप में अपनी उपस्थिति से हर किसी को भावुक कर दिया। लेकिन साई पल्लवी मूल रूप से दक्षिण भारत से आती हैं और उनकी पहली भाषा तमिल व तेलुगु रही है। यद्यपि उन्होंने सेट पर अपने सभी सीन्स को लाइव डायलॉग्स के साथ शूट किया था, लेकिन जब बात उत्तर भारतीय दर्शकों के सामने एक पौराणिक देवी के पवित्र और अत्यंत शुद्ध उच्चारण की आई, तो मेकर्स ने कोई भी भाषाई कमी न रहने देने का निर्णय लिया। हिंदी पट्टी के दर्शकों के लिए माता सीता के संवादों की डबिंग मुंबई की जानी-मानी सीनियर वॉइस आर्टिस्ट और डबिंग डायरेक्टर द्वारा बेहद संवेदनशीलता के साथ कराई गई। वॉइस इंडस्ट्री की दिग्गज आर्टिस्ट ने साई पल्लवी के होठों के तालमेल (Lip-sync) और उनकी आंखों के भावों को ध्यान में रखते हुए सीता के संवादों में वह अलौकिक ठहराव, करुणा, मर्यादा और आंतरिक शक्ति घोली, जिसने 'सिया राम' के मिलन और वनवास के दृश्यों को सिनेमाघरों में बेहद मार्मिक बना दिया। डबिंग आर्टिस्ट ने इस बात का विशेष ध्यान रखा कि आवाज में किसी भी प्रकार का बनावटीपन न झलके, बल्कि वह सीधे साई पल्लवी के चेहरे और व्यक्तित्व का हिस्सा लगे।

पौराणिक महाकाव्यों में डबिंग का पैमाना: क्यों आम एक्टिंग से अलग है यह प्रक्रिया?

भारतीय सिनेमा में जब भी कोई आधुनिक या शहरी पृष्ठभूमि की फिल्म बनती है, तो किरदारों के लहजे में थोड़ी-बहुत भाषाई छूट (Colloquial Accent) चल जाती है। लेकिन जब विषय 'रामायण' जैसा अमर महाकाव्य हो, तो वहां एक भी गलत मात्रा, अशुद्ध 'श' और 'ष' का उच्चारण या गलत विराम दर्शकों की धार्मिक और सिनेमाई भावनाओं को आहत कर सकता है। रामानंद सागर के ऐतिहासिक धारावाहिक 'रामायण' के दौर से ही दर्शकों के कानों में एक खास तरह की काव्यात्मक और अनुशासित हिंदी सुनने की आदत रची-बसी है। नितेश तिवारी की फिल्म में संवाद लेखक और गीतकार ने जिस स्तर की विशुद्ध अवधि, ब्रज और संस्कृत-मिश्रित हिंदी का ताना-बाना बुना था, उसे बिना किसी त्रुटि के बोलना किसी भी गैर-हिंदी भाषी कलाकार के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती थी। यही कारण है कि देश भर से आए श्रेष्ठ कलाकारों की विजुअल परफॉर्मेंस को वॉइस इंडस्ट्री के सबसे मंझे हुए दिग्गजों की आवाज से सजाया गया, ताकि पैन-इंडिया स्तर पर कोई भी दर्शक भाषा के स्तर पर अधूरापन महसूस न करे।

शरद केलकर और डबिंग टीम की कड़ी मेहनत: जब स्टूडियो में बहा पसीना

शरद केलकर ने हाल ही में साझा किया कि रावण के लिए अपनी आवाज को ढालना उनके जीवन का सबसे कठिन काम साबित हुआ। उन्होंने केवल संवाद नहीं पढ़े, बल्कि यश के हर एक भाव को री-क्रिएट करने के लिए स्टूडियो में घंटों तक चीखने, गरजने और सांसों को नियंत्रित करने का अभ्यास किया। ठीक इसी तरह माता सीता की डबिंग करने वाली टीम को भी कई दिनों तक केवल डायलॉग्स के मॉड्यूलेशन पर काम करना पड़ा, ताकि अशोक वाटिका और सीता स्वयंवर जैसे महत्वपूर्ण प्रसंगों में देवी सीता के मुख से निकलने वाला प्रत्येक शब्द दर्शकों के अंतर्मन को छू सके। विजुअल के साथ ऑडियो का यह सटीक संगम ही इस बात की सबसे बड़ी गवाही देता है कि 'रामायण' को केवल एक फिल्म के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक धरोहर के सबसे भव्य दस्तावेज के रूप में तैयार किया गया है।