LIC ने कहा- बीमारी छिपाई इसलिए नहीं मिलेगा क्लेम; उपभोक्ता आयोग ने फटकार लगाते हुए पलटा फैसला, अब देने होंगे 5 लाख
जीवन बीमा पॉलिसी लेते समय नियमों का हवाला देकर क्लेम खारिज करने वाली बीमा कंपनियों की मनमानी पर उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (Consumer Disputes Redressal Commission) ने एक बार फिर कड़ा चाबुक चलाया है। भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) द्वारा एक पॉलिसीधारक के निधन के बाद 'पहले से मौजूद बीमारी' (Pre-existing disease) छिपाने का आरोप लगाते हुए क्लेम की रकम देने से इनकार कर दिया गया था। इस मामले की विस्तृत सुनवाई करते हुए उपभोक्ता आयोग ने एलआईसी के फैसले को अनुचित व्यापार व्यवहार और सेवा में गंभीर लापरवाही मानते हुए पूरी तरह पलट दिया है। आयोग ने बीमा कंपनी को निर्देश दिया है कि वह मृतक की नॉमिनी को बीमा राशि के पूरे 5 लाख रुपये ब्याज सहित अदा करे, साथ ही मानसिक प्रताड़ना और कानूनी खर्च के रूप में अतिरिक्त मुआवजा भी दे।
क्या है पूरा मामला और एलआईसी ने क्यों अटकाया था क्लेम?
यह मामला एक पॉलिसीधारक द्वारा ली गई 5 लाख रुपये की जीवन बीमा पॉलिसी से जुड़ा है। पॉलिसी शुरू होने के कुछ समय बाद अचानक तबीयत बिगड़ने के कारण पॉलिसीधारक का निधन हो गया। इसके बाद आश्रित नॉमिनी ने तमाम आवश्यक मृत्यु प्रमाण पत्र और मेडिकल दस्तावेज संलग्न कर क्लेम के लिए आवेदन किया।
हालांकि, एलआईसी ने क्लेम खारिज (Repudiate) करते हुए दलील दी कि पॉलिसीधारक ने फॉर्म भरते समय अपने स्वास्थ्य से जुड़े तथ्यों को जानबूझकर छिपाया था। बीमा निगम ने आरोप लगाया कि मृतक व्यक्ति पॉलिसी लेने से पहले ही हाइपरटेंशन (उच्च रक्तचाप), मधुमेह (शुगर) और अन्य पुरानी बीमारियों से ग्रसित था, जिसकी जानकारी प्रपोजल फॉर्म में नहीं दी गई थी। एलआईसी ने इसे अनुबंध की शर्तों और 'परम सद्भाव के सिद्धांत' (Utmost Good Faith) का उल्लंघन बताते हुए क्लेम राशि देने से साफ इनकार कर दिया।
उपभोक्ता आयोग की सख्त टिप्पणी: पॉलिसी बेचते समय जांच क्यों नहीं कराई?
बीमा कंपनी के इस रवैये से आहत होकर पीड़ित परिवार ने उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान आयोग ने पाया कि एलआईसी अपनी इस दलील के समर्थन में कोई भी ऐसा ठोस अस्पताल रिकॉर्ड या लैब टेस्ट पेश करने में पूरी तरह नाकाम रही, जिससे यह निर्विवाद रूप से साबित हो सके कि पॉलिसी खरीदते वक्त ग्राहक को उक्त गंभीर बीमारी की पूरी जानकारी थी।
उपभोक्ता अदालत ने बीमा कंपनियों की कार्यप्रणाली पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा:
-
प्रीमियम लेते वक्त ढिलाई, क्लेम देते वक्त कड़ाई: पॉलिसी बेचते समय बीमा कंपनियां एजेंटों के जरिए जल्दबाजी में फॉर्म भरवाकर प्रीमियम वसूल लेती हैं, लेकिन जब संकट की घड़ी में पीड़ित परिवार को क्लेम की जरूरत होती है, तो छोटी-छोटी तकनीकी खामियां ढूंढकर उसे खारिज कर दिया जाता है।
-
मेडिकल जांच की जिम्मेदारी बीमा कंपनी की: यदि बीमा कंपनी को किसी ग्राहक के स्वास्थ्य को लेकर कोई संदेह था, तो पॉलिसी जारी करने से पहले अधिकृत डॉक्टरों के पैनल से उसकी पूरी मेडिकल जांच कराई जानी चाहिए थी। ऐसा न करके केवल अस्पताल के पुराने पर्चों की अस्पष्ट प्रविष्टियों के आधार पर क्लेम रोकना कानूनन सही नहीं है।
-
लाइफस्टाइल बीमारियों को छिपा हुआ नहीं माना जा सकता: आयोग ने कई पूर्ववर्ती न्यायिक फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में ब्लड प्रेशर या हल्का शुगर होना आम जीवनशैली से जुड़ी स्थितियां हैं। इन्हें जानलेवा या दुर्भावनापूर्वक छिपाई गई बीमारी की श्रेणी में रखकर सीधे क्लेम निरस्त नहीं किया जा सकता।
आयोग का अंतिम फैसला: 5 लाख की बीमा राशि के साथ मुआवजा भी चुकाए कंपनी
मामले के सभी पक्षों और साक्ष्यों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद उपभोक्ता आयोग ने एलआईसी को आदेश दिया कि:
-
मृतक पॉलिसीधारक के नॉमिनी को 5 लाख रुपये की पूरी बीमा राशि (Sum Assured) क्लेम अस्वीकार होने की तारीख से 9% वार्षिक ब्याज के साथ 45 दिनों के भीतर अदा की जाए।
-
पीड़ित परिवार को लंबे समय तक दफ्तरों के चक्कर कटवाने और मानसिक कष्ट देने के एवज में मुआवजा राशि अलग से दी जाए।
-
परिवादी को हुई कानूनी भागदौड़ के लिए मुकदमे का खर्च (Litigation Expenses) भी कंपनी वहन करे।
आयोग ने सख्त चेतावनी दी कि यदि तय समयसीमा के भीतर यह भुगतान नहीं किया जाता है, तो ब्याज दर को बढ़ाकर वसूली की कड़ी कार्रवाई की जाएगी। उपभोक्ता अदालत के इस फैसले को उन लाखों बीमाधारकों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है, जो अक्सर क्लेम के समय कंपनियों के अड़ियल रवैये और मनमाने नियमों के चलते परेशान होते हैं।