दिल्ली में प्रदूषण के लिए पंजाब कैसे जिम्मेदार? सांसद मनीष तिवारी ने उठाए गंभीर सवाल

दिल्ली में प्रदूषण के लिए पंजाब कैसे जिम्मेदार? सांसद मनीष तिवारी ने उठाए गंभीर सवाल

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और समूचे एनसीआर में हर साल सर्दी की दस्तक के साथ ही हवा में घुलने वाला जहर केवल लोगों के फेफड़ों पर ही असर नहीं डालता, बल्कि एक तीखी राजनीतिक जंग को भी जन्म देता है। हवा का स्तर 'गंभीर' और 'खतरनाक' श्रेणी में पहुंचते ही हर बार की तरह इस बार भी सारा दोष पंजाब के किसानों और पराली जलाने की घटनाओं पर मढ़ने की कवायद शुरू हो गई है। इसी गरमा-गरम बहस के बीच चंडीगढ़ से कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए इस पूरे नैरेटिव को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सांसद तिवारी ने दो टूक सवाल किया है कि आखिर दिल्ली की जहरीली आबोहवा के लिए हर बार पंजाब को ही खलनायक क्यों बना दिया जाता है? उन्होंने सरकारों और नीति-निर्माताओं को आईना दिखाते हुए कहा कि राजनीतिक बयानबाजी से हटकर वैज्ञानिक तथ्यों की पड़ताल होनी चाहिए और केंद्र व संबंधित सरकारों को अपनी विफलता छुपाने के बजाय वास्तविक जवाबदेही तय करनी चाहिए।

दिल्ली के आसमान पर छाई धुंध की मोटी चादर, आंखों में जलन और सांस लेने में हो रही तकलीफ के बीच जब भी एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 400 के पार पहुंचता है, तो सत्ता के गलियारों से लेकर टीवी बहसों तक केवल पंजाब के खेतों का धुआं ही चर्चा का केंद्र बन जाता है। मनीष तिवारी का कहना है कि यह रुख न केवल पंजाब के मेहनतकश किसानों के प्रति अन्यायपूर्ण है, बल्कि दिल्ली के भीतर मौजूद प्रदूषण के असली और स्थानीय कारकों से आंखें मूंदने जैसा है। जब तक समस्या की जड़ को ईमानदारी से स्वीकार नहीं किया जाएगा, तब तक दिल्लीवासियों को इस सालाना गैस चैंबर से मुक्ति नहीं मिल सकती।

अगर पंजाब से आ रहा है धुआं तो चंडीगढ़ और पंजाब का AQI दिल्ली से बेहतर क्यों?

सांसद मनीष तिवारी ने अपने बयान में वायु गुणवत्ता के आधिकारिक आंकड़ों का हवाला देते हुए एक अत्यंत तार्किक और वैज्ञानिक सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि यदि दिल्ली के प्रदूषण का मुख्य स्रोत पंजाब में जलने वाली पराली ही है, तो फिर पंजाब के अपने शहरों और उससे सटे चंडीगढ़ की हवा दिल्ली जितनी जहरीली क्यों नहीं होती? भौगोलिक दृष्टि से यदि खेतों से भारी मात्रा में धुआं उठ रहा है, तो उसका सबसे पहला और सर्वाधिक घातक असर उन इलाकों पर दिखना चाहिए जहां पराली जल रही है या जो उसके बिल्कुल निकट हैं।

हवा की गुणवत्ता के रिकॉर्ड बताते हैं कि जब दिल्ली में एक्यूआई 450 के करीब ‘अति गंभीर’ स्तर पर दर्ज किया जा रहा होता है, उसी समय पंजाब के अधिकांश जिलों और चंडीगढ़ का एक्यूआई मध्यम या खराब (150 से 250 के बीच) के दायरे में रहता है। ऐसे में यह वैज्ञानिक रूप से समझ से परे है कि पंजाब का धुआं सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय करके सीधे दिल्ली के ऊपर ही ठहर जाए और रास्ते के पूरे भौगोलिक क्षेत्र को छोड़ दे। तिवारी ने स्पष्ट किया कि हवा की गति, तापमान में गिरावट और 'थर्मल इन्वर्जन' जैसी मौसमी घटनाएं प्रदूषण को जमीन के पास रोकती जरूर हैं, लेकिन इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि दिल्ली की अपनी जहरीली गैसों का ठीकरा दूसरे राज्यों के सिर फोड़ दिया जाए।

दिल्ली का अंदरूनी दमघोंटू तंत्र: वाहन, निर्माण कार्य और कचरे के ढेर

राष्ट्रीय राजधानी के प्रदूषण पर विभिन्न वैज्ञानिक संस्थानों, जैसे भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM), सफर (SAFAR) और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के विस्तृत शोध यह साबित कर चुके हैं कि दिल्ली की खराब हवा में सबसे बड़ी हिस्सेदारी स्थानीय स्रोतों की होती है। दिल्ली की सड़कों पर रोजाना दौड़ने वाले लाखों वाहन, अनियंत्रित निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल, औद्योगिक इकाइयों का उत्सर्जन और शहर के विभिन्न कोनों में कचरे व लैंडफिल साइटों पर सुलगती आग इस संकट के प्राथमिक कारण हैं।

मनीष तिवारी ने इसी बिंदु पर सरकार को घेरते हुए कहा कि स्थानीय प्रशासन साल भर इन आंतरिक समस्याओं से निपटने के लिए कोई ठोस दीर्घकालिक नीति नहीं बनाता। सार्वजनिक परिवहन प्रणाली को मजबूत करने, इलेक्ट्रिक वाहनों के वास्तविक उपयोग को बढ़ाने, सड़कों की वैक्यूम क्लीनिंग और धूल नियंत्रण के कड़े नियमों को लागू करने में बरती जाने वाली लापरवाही ही सर्दियों में भारी पड़ती है। जब अक्टूबर और नवंबर में हवा की गति मंद पड़ जाती है, तो दिल्ली का अपना ही धुआं शहर के वायुमंडल में कैद हो जाता है। ऐसे में पंजाब पर उंगली उठाकर स्थानीय शासन अपनी प्रशासनिक कमजोरियों और नीतिगत नाकामियों पर पर्दा डालने का आसान रास्ता चुन लेता है।

अन्नदाता को विलेन बनाना बंद करे व्यवस्था: किसानों की तकनीकी मजबूरी

सांसद तिवारी ने किसानों के पक्ष को मानवीय दृष्टिकोण से समझने पर जोर दिया। धान की कटाई (झोना) और गेहूं की बिजाई के बीच पंजाब के किसानों के पास महज 10 से 15 दिनों का बेहद सीमित समय होता है। इस छोटे से अंतराल में यदि खेत समय पर तैयार न हों, तो अगली फसल की पैदावार पर सीधा असर पड़ता है। पराली प्रबंधन के लिए आवश्यक मशीनें जैसे हैप्पी सीडर, सुपर सीडर, स्ट्रॉ बेलर और मल्चर आज भी आम और छोटे किसानों की पहुंच से बाहर हैं।

हालांकि सरकारी स्तर पर इन मशीनों पर सब्सिडी देने के दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि डीजल की बढ़ती लागत और मशीनों के भारी किराए के चलते एक साधारण किसान के लिए प्रति एकड़ हजारों रुपये अतिरिक्त खर्च करना आर्थिक रूप से संभव नहीं हो पाता। तिवारी ने कहा कि जो किसान पूरे देश का पेट भरने के लिए दिन-रात मेहनत करता है, उसे चंद हफ्तों के लिए 'प्रदूषण फैलाने वाला अपराधी' करार दे देना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। यदि सरकारें सचमुच पराली का हल चाहती हैं, तो उन्हें किसानों पर दंडात्मक कार्रवाई या एफआईआर दर्ज करने के बजाय उन्हें सीधे वित्तीय प्रोत्साहन और हर गांव में निःशुल्क मशीनरी की व्यवस्था उपलब्ध करानी चाहिए।

केंद्र और राज्यों के बीच ब्लेम-गेम: समाधान की जगह सियासी नूराकुश्ती

उत्तर भारत का वायु प्रदूषण अब स्वास्थ्य संकट से अधिक अंतर-राज्यीय राजनीति का अखाड़ा बन चुका है। केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार और पंजाब सरकार के बीच हर वर्ष एक-दूसरे पर आरोप मढ़ने का खेल शुरू हो जाता है। सुप्रीम कोर्ट और वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) द्वारा बार-बार फटकार लगाए जाने के बावजूद राजनीतिक दल केवल चुनाव और वोट बैंक के नजरिए से बयानबाजी करते नजर आते हैं।

सांसद मनीष तिवारी ने कहा कि जब तक केंद्र सरकार समन्वयक की भूमिका निभाते हुए सभी हितधारकों को एक मंच पर नहीं लाती, तब तक कोई भी योजना सफल नहीं हो सकती। पंजाब सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में पराली जलाने की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी लाने के दावे किए हैं, लेकिन इसके बावजूद सारा ध्यान केवल पंजाब पर ही केंद्रित रखा जाता है। तिवारी ने सवाल दागा कि जब हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के सीमावर्ती क्षेत्रों में भी कृषि और औद्योगिक गतिविधियां होती हैं, तो सिर्फ पंजाब को ही निशाना बनाने के पीछे क्या कोई विशेष राजनीतिक मंशा काम कर रही है?

स्थायी समाधान की दरकार: फसल विविधीकरण और संपूर्ण एयरशेड मैनेजमेंट

दिल्ली और पूरे उत्तर भारत को स्वच्छ हवा देने के लिए तात्कालिक पैचवर्क के बजाय बुनियादी बदलावों की जरूरत है। मनीष तिवारी के अनुसार, इस समस्या का स्थायी समाधान पंजाब में फसल विविधीकरण (Crop Diversification) को जमीनी स्तर पर लागू करने में निहित है। पंजाब का किसान भूजल के दोहन और पराली की समस्या के बावजूद धान लगाने के लिए इसलिए मजबूर है क्योंकि उसे इस पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और सुनिश्चित खरीद की गारंटी मिलती है। यदि केंद्र सरकार मक्का, दालों और तिलहन जैसी फसलों पर लाभकारी एमएसपी और खरीद की ठोस गारंटी दे, तो किसान खुद-ब-खुद धान की खेती से हट जाएंगे, जिससे पराली का मुद्दा हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।

इसके साथ ही पूरे उत्तर भारत को एक साझा 'एयरशेड' मानकर संयुक्त नीति बनाई जानी चाहिए। प्रदूषण किसी राज्य की भौगोलिक सीमा का पाबंद नहीं होता। जब तक दिल्ली अपने वाहनों, निर्माण कार्यों और कचरा प्रबंधन पर सख्त और निरंतर निगरानी नहीं रखेगी और जब तक किसानों को पराली के निपटान के लिए व्यावहारिक विकल्प नहीं मिलेंगे, तब तक हर साल करोड़ों नागरिकों को जहरीली हवा में सांस लेने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। सांसद मनीष तिवारी ने स्पष्ट किया कि अब समय आ गया है कि सरकारें बहानेबाजी छोड़कर अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाएं और जनता के जीवन के अधिकार की रक्षा करें।