गौतम गंभीर के सिर पर 'कांटों का ताज' देखकर कीवी दिग्गज ने माना लोहा
विश्व क्रिकेट में किसी भी राष्ट्रीय टीम की कोचिंग करना पेशेवर जिम्मेदारी हो सकता है, लेकिन भारतीय पुरुष क्रिकेट टीम का मुख्य कोच बनना एक ऐसा इम्तिहान है जहां हर दिन, हर सत्र और हर निर्णय पर 140 करोड़ क्रिकेट प्रेमियों की तीखी नजरें गड़ी होती हैं। जब से पूर्व सलामी बल्लेबाज गौतम गंभीर ने टीम इंडिया के हेड कोच का पदभार संभाला है, तब से वे लगातार चर्चाओं, उम्मीदों और भारी दबाव के केंद्र में रहे हैं। इसी संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण माहौल को भांपते हुए न्यूजीलैंड के एक पूर्व दिग्गज क्रिकेटर ने गंभीर की स्थिति पर खुलकर अपनी राय रखी है। कीवी दिग्गज का साफ कहना है कि बाहर बैठकर बातें बनाना बहुत आसान होता है, लेकिन जब आप भारतीय ड्रेसिंग रूम की कमान संभालते हैं, तो वह ताज फूलों का नहीं बल्कि तीखे कांटों का होता है। उन्होंने माना कि भारतीय क्रिकेट तंत्र में इतने बड़े कद के खिलाड़ियों, मीडिया के चौबीसों घंटे चलने वाले विश्लेषण और हार बर्दाश्त न करने वाले प्रशंसक वर्ग के बीच नतीजे देना किसी भी इंसान के लिए दुनिया का सबसे कठिन काम है। गंभीर हमेशा से अपनी बेबाक जुबान, आक्रामक रणनीतियों और बिना लाग-लपेट के फैसले लेने के लिए जाने जाते रहे हैं। आईपीएल में कोलकाता नाइट राइडर्स और लखनऊ सुपर जायंट्स के साथ खिताबी और सफल मेंटरशिप देने के बाद जब वे टीम इंडिया में आए, तो उनसे रातोंरात चमत्कारी बदलाव की अपेक्षा की जाने लगी। लेकिन द्विपक्षीय सीरीज के उतार-चढ़ाव, घरेलू मैदानों पर स्पिन के खिलाफ भारतीय बल्लेबाजों का संघर्ष और विदेशी दौरों की कठिन चुनौतियों ने यह साबित कर दिया कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का मंच फ्रेंचाइजी क्रिकेट से कोसों दूर और जटिल है। इसी पृष्ठभूमि में कीवी दिग्गज का यह बयान भारतीय कोचिंग की वास्तविक जटिलताओं को पूरी दुनिया के सामने उजागर करता है।
सुपरस्टार कल्चर को साधना और ड्रेसिंग रूम का संतुलन: सबसे टेढ़ी खीर
न्यूजीलैंड के पूर्व क्रिकेटर ने अपने विश्लेषण में रेखांकित किया कि भारतीय टीम की कोचिंग बाकी विदेशी टीमों की कोचिंग से बुनियादी रूप से अलग क्यों है। ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड या न्यूजीलैंड जैसी टीमों में एक स्थापित संरचना होती है जहां बोर्ड और कप्तान की भूमिकाएं स्पष्ट होती हैं और किसी एक खिलाड़ी का कद खेल से बड़ा नहीं माना जाता। इसके विपरीत, भारत में क्रिकेट केवल एक खेल नहीं बल्कि एक धर्म है, जहां रोहित शर्मा और विराट कोहली जैसे खिलाड़ी आधुनिक क्रिकेट के वैश्विक आइकन हैं। ऐसे दिग्गजों से सजी टीम में एक ऐसा कोच आना, जिसका अपना एक बहुत मजबूत और समझौता न करने वाला दृष्टिकोण हो, निश्चित रूप से टकराव और संतुलन साधने की एक महीन डोर पर चलने जैसा है। कीवी दिग्गज ने कहा कि गंभीर को केवल तकनीकी खामियां दुरुस्त नहीं करनी हैं, बल्कि ड्रेसिंग रूम के ईगो (Ego Management), खिलाड़ियों की निजी प्राथमिकताओं और टीम की सामूहिक जरूरत के बीच लगातार सामंजस्य बैठाना होता है। जब टीम जीतती है तो सारा श्रेय मैदान पर मौजूद सितारों को जाता है, लेकिन जैसे ही कोई मुकाबला हाथ से फिसलता है, सबसे पहला तीर कोच के सीने पर आकर लगता है। न्यूजीलैंड के दिग्गज ने स्पष्ट किया कि न्यूजीलैंड या अन्य देशों में अगर कोई कोच प्रयोग करता है और टीम हार जाती है, तो उसे सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा माना जाता है। वहीं भारत में एक साधारण द्विपक्षीय मैच गंवाने पर भी कोच की साख और योजना पर सवाल खड़े कर दिए जाते हैं। ऐसे माहौल में अपनी रणनीति पर टिके रहना और खिलाड़ियों का विश्वास बनाए रखना असाधारण मानसिक मजबूती की मांग करता है।
बदलाव के दौर से गुजरती टीम इंडिया: नई पीढ़ी को तराशने की दोहरी चुनौती
गंभीर के कार्यकाल का सबसे नाजुक पहलू यह है कि वे एक ऐसे दौर में टीम की बागडोर संभाल रहे हैं, जिसे भारतीय क्रिकेट का संक्रमण काल (Transition Phase) कहा जा रहा है। पिछले एक दशक से भारतीय बल्लेबाजी और गेंदबाजी की रीढ़ रहे कई वरिष्ठ खिलाड़ी अपने करियर के अंतिम पड़ाव पर हैं। टेस्ट क्रिकेट, वनडे और टी20 के बीच संतुलन साधते हुए यशस्वी जायसवाल, शुभमन गिल, सरफराज खान, ध्रुव जुरेल और युवा तेज गेंदबाजों को तैयार करना और साथ ही सीनियर खिलाड़ियों के सम्मान को ठेस पहुंचाए बिना उन्हें धीरे-धीरे विदा करने की रूपरेखा बनाना एक बेहद पेचीदा दायित्व है। कीवी विशेषज्ञ ने इस बात पर जोर दिया कि राहुल द्रविड़ के बाद गंभीर को एक ऐसी विरासत मिली थी जो टी20 विश्व कप जीतकर शिखर पर थी। शिखर से नीचे आने का खतरा हमेशा बड़ा होता है। जब भी कोई टीम अपने पुराने दिग्गजों की जगह नए लड़कों को मौका देती है, तो गलतियां होना स्वाभाविक है। पिच पर अनुभव की कमी के कारण कभी-कभी अप्रत्याशित हार का सामना करना पड़ता है। लेकिन भारतीय क्रिकेट का मिजाज ऐसा है कि यहां किसी भी दौर में हार को स्वीकार करने का धैर्य नहीं है। गंभीर के सामने चुनौती यह है कि उन्हें वर्तमान में मैच भी जीतने हैं और साथ ही अगले पांच से सात साल के लिए एक अभेद्य टीम इंडिया की नींव भी रखनी है। यह एक ऐसा दोहरा बोझ है, जिसे संभालते हुए अच्छे-अच्छे दिग्गजों के पसीने छूट जाते हैं।
विदेशी जमीन पर जीत की सख्त शर्तें और घरेलू दबदबे को बचाने का तनाव
भारतीय क्रिकेट के इतिहास में पिछले एक दशक में एक बड़ा बदलाव यह आया है कि अब भारतीय प्रशंसक केवल अपनी सरजमीं पर जीत से संतुष्ट नहीं होते। ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, दक्षिण अफ्रीका और न्यूजीलैंड जैसी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में जीत दर्ज करना अब भारतीय टीम के लिए न्यूनतम पैमाना बन चुका है। इसके साथ ही, घरेलू मैदानों पर अपराजेय रहने का जो रिकॉर्ड भारत ने वर्षों तक बनाए रखा था, उस पर जब भी कोई आंच आती है, तो पूरे देश में कोहराम मच जाता है। न्यूजीलैंड की टीम ने जब भारत आकर स्पिन के खिलाफ ठोस खेल दिखाया और टेस्ट मैचों में भारतीय बल्लेबाजों की कमजोरियां उजागर कीं, तो सारा ध्यान सीधे तौर पर पिच की तैयारी और कोचिंग स्टाफ की कार्यप्रणाली पर चला गया। कीवी दिग्गज ने याद दिलाया कि न्यूजीलैंड जैसी अनुशासित और परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने वाली टीमों के खिलाफ खेलना कभी आसान नहीं होता। जब विदेशी टीमें भारत आकर भारत की ही रणनीति से भारत को चुनौती देने लगती हैं, तो कोच के पास प्लान-बी का होना अनिवार्य हो जाता है। गंभीर के आक्रामक दृष्टिकोण पर टिप्पणी करते हुए पूर्व कीवी खिलाड़ी ने कहा कि आक्रामकता केवल बयानों में नहीं बल्कि रणनीतिक लचीलेपन में दिखनी चाहिए। यदि विरोधी टीम आपको बैकफुट पर धकेल रही है, तो वहां केवल आक्रामक होकर जवाबी हमला बोलना हमेशा कारगर नहीं होता; कभी-कभी खेल को धीमा करना और सेशन दर सेशन मैच को खींचना भी जरूरी होता है। गंभीर इस समय अपनी उसी आक्रामक सोच और पारंपरिक टेस्ट क्रिकेट की धैर्यपूर्ण मांग के बीच एक नया रास्ता तलाशने की कोशिश कर रहे हैं।
क्या गंभीर बदल पाएंगे भारतीय क्रिकेट का मुकद्दर? कीवी दिग्गज का निष्पक्ष नजरिया
अपने विस्तृत बयान के अंत में न्यूजीलैंड के दिग्गज ने गौतम गंभीर के प्रति पूरा सम्मान जताते हुए कहा कि वे उन चुनिंदा इंसानों में से हैं जो दबाव के आगे घुटने टेकने के बजाय उससे टकराना पसंद करते हैं। गंभीर का अपना खेल करियर भी इसी जुझारूपन की गवाही देता है, जब उन्होंने 2007 टी20 विश्व कप फाइनल और 2011 वनडे विश्व कप फाइनल जैसे सबसे बड़े वैश्विक मंचों पर भारत के लिए ऐतिहासिक पारियां खेली थीं। उनके पास दबाव झेलने का वह डीएनए मौजूद है जो बहुत कम लोगों के पास होता है। कीवी दिग्गज ने भारतीय क्रिकेट बोर्ड (BCCI), मीडिया और देश के करोड़ों समर्थकों से अपील करते हुए कहा कि गंभीर को उनका विजन लागू करने के लिए पर्याप्त समय और छूट दी जानी चाहिए। कोचिंग का काम किसी जादू की छड़ी की तरह नहीं होता कि रात भर में परिणाम बदल जाएं। विश्व टेस्ट चैंपियनशिप के फाइनल, चैंपियंस ट्रॉफी और आगामी विदेशी टेस्ट दौरों जैसे बड़े पड़ावों पर ही गंभीर के नेतृत्व की वास्तविक परीक्षा होगी। यदि भारतीय क्रिकेट प्रशासन गंभीर की कार्यप्रणाली पर भरोसा बनाए रखता है और उन्हें अपने तरीके से टीम को री-बिल्ड करने की आजादी देता है, तो यह 'कांटों का ताज' समय के साथ भारतीय क्रिकेट के लिए एक नया स्वर्णिम अध्याय भी साबित हो सकता है। फिलहाल, गंभीर के हर कदम पर पूरी दुनिया की नजरें हैं और वे भारतीय खेल इतिहास की सबसे जटिल कुर्सी पर बैठकर अपनी सबसे बड़ी जंग लड़ रहे हैं।