यूपी में अब गगनचुंबी इमारतों का नया दौर: बिल्डरों को मिली मनचाही ऊंचाई तक कमर्शियल बिल्डिंग बनाने की छूट
उत्तर प्रदेश को वन ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने और शहरों को वैश्विक स्तर का रूप देने के लिए योगी सरकार ने रियल एस्टेट सेक्टर के लिए ऐतिहासिक कदम उठाया है। राज्य सरकार ने भवन निर्माण एवं विकास उपविधि (बिल्डिंग बायलॉज) में युगांतरकारी बदलाव करते हुए व्यावसायिक (कमर्शियल) इमारतों के लिए अधिकतम ऊंचाई की तय सीमा को खत्म करने का फैसला किया है। अब राजधानी लखनऊ, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद, कानपुर, वाराणसी और आगरा जैसे प्रमुख शहरों में बिल्डर और डेवलपर मनचाही ऊंचाई तक गगनचुंबी व्यावसायिक परिसर, शॉपिंग मॉल, कॉरपोरेट ऑफिस और आईटी पार्क तैयार कर सकेंगे। जमीन की उपलब्धता की कमी से जूझ रहे बड़े शहरों में वर्टिकल डेवलपमेंट को बढ़ावा देने के लिए यह फैसला मील का पत्थर साबित होने जा रहा है।
एफएआर और सड़क की चौड़ाई के आधार पर तय होगी ऊंचाई, हटी पुरानी बंदिशें
अब तक प्रदेश के विभिन्न विकास प्राधिकरणों में भवनों की ऊंचाई को लेकर कड़े प्रतिबंध लागू थे, जिसके चलते बहुमंजिला इमारतों के निर्माण में डेवलपरों को कई तकनीकी अड़चनों का सामना करना पड़ता था। नए नियमों के तहत अब इमारतों की ऊंचाई को सड़क की चौड़ाई और फ्लोर एरिया रेशियो (FAR) के मानकों से जोड़ दिया गया है। यदि किसी व्यावसायिक परियोजना के सामने 24 मीटर या उससे अधिक चौड़ी सड़क उपलब्ध है और अग्निशमन तथा नागरिक उड्डयन विभाग (AAI) से आवश्यक एनओसी प्राप्त है, तो डेवलपर को अपनी परियोजना के अनुरूप मनचाही मंजिलें बनाने की पूरी आजादी होगी। इससे शहर के प्राइम लोकेशंस पर कम जमीन में भी अंतरराष्ट्रीय स्तर के ऊंचे व्यापारिक हब खड़े किए जा सकेंगे।
सेटबैक और पार्किंग नियमों में भी बड़ी राहत, प्रोजेक्ट लागत में आएगी कमी
मनचाही ऊंचाई के साथ-साथ सरकार ने बिल्डरों और आवंटियों को कई अन्य महत्वपूर्ण रियायतें भी दी हैं। ऊंची इमारतों के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा बनने वाले सेटबैक (इमारत के चारों ओर छोड़ी जाने वाली खुली जगह) के कड़े नियमों को अधिक व्यावहारिक और लचीला बनाया गया है। इसके अलावा, मल्टी-लेवल और ऑटोमैटिक बेसमेंट पार्किंग को बढ़ावा देने के लिए फ्लोर कवरेज के नियमों में ढील दी गई है। अब बिल्डरों को बेसमेंट में अधिक जगह का उपयोग करने की छूट मिलेगी, जिससे सड़कों पर अवैध पार्किंग की समस्या से निजात मिलेगी। सरकार का मानना है कि इन सहूलियतों से न केवल निर्माण की लागत में कमी आएगी, बल्कि निवेशकों के लिए प्रोजेक्ट को तेजी से पूरा करना और भी आसान हो जाएगा।
मिक्स-लैंड यूज को बढ़ावा: एक ही छत के नीचे ऑफिस, होटल और रिटेल का मॉडल
नए नियमों में 'मिक्स्ड-लैंड यूज' यानी मिश्रित भू-उपयोग को लेकर भी क्रांतिकारी छूट दी गई है। अब बड़ी कमर्शियल इमारतों में सिर्फ दुकानें या सिर्फ दफ्तर तक सीमित रहने की अनिवार्यता नहीं होगी। एक ही गगनचुंबी टॉवर में निचले तलों पर रिटेल स्टोर्स और रेस्तरां, मध्य स्तरों पर आधुनिक कॉरपोरेट ऑफिस और ऊपरी मंजिलों पर प्रीमियम स्टूडियो अपार्टमेंट्स या फाइव-स्टार होटल के निर्माण की अनुमति दी जा रही है। मेट्रो स्टेशनों और प्रमुख एक्सप्रेसवे के किनारे स्थित ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट (TOD) जोन्स में अतिरिक्त पर्चेजेबल एफएआर (खरीदने योग्य एफएआर) की दर को भी तर्कसंगत बनाया गया है, जिससे निवेशकों को अधिक फ्लोर स्पेस इंडेक्स हासिल करने में आसानी होगी।
सिंगल विंडो क्लीयरेंस और फास्ट-ट्रैक नक्शा पासिंग: निवेशकों के लिए आसान राह
योगी सरकार ने स्पष्ट किया है कि केवल नियमों में ढील देना ही काफी नहीं है, बल्कि परियोजनाओं को तय समय में धरातल पर उतारने के लिए लालफीताशाही को भी खत्म किया जा रहा है। सभी विकास प्राधिकरणों जैसे एलडीए, केडीए, जीडीए और नोएडा प्राधिकरण में नक्शा पास कराने की प्रक्रिया को 'निवेश मित्र' पोर्टल के जरिए पूरी तरह डिजिटल और फेसलेस बनाया जा रहा है। यदि किसी कमर्शियल प्रोजेक्ट में सभी निर्धारित मानकों और सुरक्षा प्रमाणपत्रों का पालन किया गया है, तो उसे फास्ट-ट्रैक मोड में तय समय सीमा के भीतर स्वीकृति मिल जाएगी। अग्निशमन और संरचनात्मक सुरक्षा (स्ट्रक्चरल सेफ्टी) के ऑडिट के लिए थर्ड-पार्टी विशेषज्ञों की रिपोर्ट को मान्यता दी जा रही है, जिससे सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने की जरूरत खत्म होगी।
राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को आकर्षित करेगा यूपी का इंफ्रास्ट्रक्चर
रियल एस्टेट विशेषज्ञों और क्रेडाई (CREDAI) जैसे उद्योग संगठनों ने सरकार के इस फैसले का जोरदार स्वागत किया है। उनका मानना है कि मुंबई, बेंगलुरु और गुरुग्राम की तर्ज पर अब उत्तर प्रदेश के शहरों में भी वर्ल्ड-क्लास स्काईलाइन देखने को मिलेगी। जेवर में बन रहे नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट, डिफेंस कॉरिडोर और प्रदेश भर में फैले एक्सप्रेसवे नेटवर्क के चलते राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कंपनियां उत्तर प्रदेश में अपना कॉरपोरेट बेस स्थापित करना चाहती हैं। ऐसे में ऊंची कमर्शियल इमारतों के निर्माण की छूट से बड़े पैमाने पर निजी निवेश आकर्षित होगा, निर्माण क्षेत्र में लाखों नए रोजगार के अवसर पैदा होंगे और नगर विकास के जरिए राजस्व में भी भारी इजाफा होगा।