'मां से दूर रहकर समझदारी भरी पसंद नहीं कर सकता छह साल का बच्चा', इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रद्द किया फैमिली कोर्ट का फैसला
बच्चे की कस्टडी और संरक्षण (Child Custody) को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने आगरा की फैमिली कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया है, जिसके तहत 6 साल के बच्चे की अभिरक्षा उसकी सगी मां के बजाय दादी को सौंप दी गई थी। हाईकोर्ट ने स्पष्ट व्यवस्था दी कि इतनी कम उम्र के बच्चे को, जिसे वर्षों तक उसकी मां के स्नेह और सान्निध्य से दूर रखा गया हो, उसके बयान के आधार पर कस्टडी का फैसला नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि अबोध बच्चा अपने भावनात्मक, मानसिक और शारीरिक कल्याण को लेकर कोई 'समझदारी भरी पसंद' (Intelligent Preference) व्यक्त करने में सक्षम नहीं होता।
क्या था पूरा मामला? 8 महीने की उम्र में छिना था मां का आंचल
मामले के तथ्यों के अनुसार, महिला के पति का वर्ष 2020 में असमय निधन हो गया था। उस समय उनका बेटा महज आठ महीने का था। महिला ने अदालत में आरोप लगाया कि पति की मौत के बाद ससुराल वालों ने बीमा दावा दिलाने के बहाने उससे कुछ खाली और सादे कागजों पर हस्ताक्षर करवा लिए। बाद में उन्हीं दस्तावेजों का कथित तौर पर दुरुपयोग कर एक फर्जी समझौता पत्र तैयार किया गया, जिसमें बच्चे को उसकी दादी के पास रखने की बात लिख दी गई।
महिला का कहना था कि इसके बाद उसे बच्चे से मिलने तक नहीं दिया गया और घर से दूर कर दिया गया। अपने जिगर के टुकड़े को वापस पाने के लिए मां ने गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट (संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम), 1890 की धारा 7 व 25 के तहत आगरा की फैमिली कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। हालांकि, फैमिली कोर्ट ने बच्चे के दादी के साथ रहने की इच्छा और समझौतों का हवाला देकर 21 जुलाई 2026 को मां की याचिका खारिज कर दी थी, जिसके बाद व्यथित होकर मां ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: 'बच्चे को बरगलाया जाना संभव, बयान नहीं हो सकता आधार'
दादी की ओर से अदालत में दलील दी गई थी कि मां ने बच्चे को छोड़ दिया था और बच्चा अब दादी, चाचा-चाची के साथ रहने का आदी हो चुका है। फैमिली कोर्ट में बच्चे ने भी दादी के साथ रहने की बात कही थी।
हाईकोर्ट ने इस दलील को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा:
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समझदारी भरी पसंद का अभाव: छह वर्ष का बालक यह समझने में असमर्थ है कि उसका वास्तविक हित किसमें सुरक्षित है।
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ब्रेनवॉश की आशंका: कोर्ट ने माना कि जब किसी बच्चे को लंबे समय तक मां से अलग रखा जाता है, तो उसे दूसरे पक्ष द्वारा मानसिक रूप से प्रभावित या सिखाया-पढ़ाया (Tutored) जाना पूरी तरह संभव है।
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माता-पिता को जानने का प्राकृतिक अधिकार: अदालत ने कहा कि मां और बच्चे के बीच का संबंध ईश्वरीय और प्राकृतिक है। इतनी कम उम्र में बच्चे को उसकी मां से दूर करना उसे अपने माता-पिता के स्वाभाविक प्यार और अधिकारों से वंचित करने जैसा है।
पिता की मृत्यु के बाद मां ही एकमात्र 'स्वाभाविक संरक्षक'
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले 'गीता हरिहरन बनाम भारतीय रिजर्व बैंक' का हवाला देते हुए दोहराया कि पिता के न रहने पर कानूनन मां ही बच्चे की एकमात्र 'नेचुरल गार्जियन' (स्वाभाविक संरक्षक) होती है। अदालत ने कहा कि किसी कथित वसीयत या आपसी समझौते से बच्चे के कल्याण (Welfare of the Child) का अधिकार ऊपर होता है, जो कस्टडी से जुड़े मामलों में हमेशा सर्वोपरि रहता है।
कम आय कस्टडी छीनने का आधार नहीं बन सकती
ससुराल पक्ष द्वारा महिला की आर्थिक स्थिति कमजोर होने की दलील पर भी अदालत ने कड़ा रुख अपनाया। पीठ ने स्पष्ट किया कि दोनों पक्षों की माली हालत में ऐसा कोई बड़ा असंतुलन नहीं है जिसके चलते मां को उसके बच्चे से अलग रखा जाए। अदालत ने कहा कि केवल कम आय या आर्थिक आत्मनिर्भरता न होने के आधार पर किसी मां से उसके बच्चे की अभिरक्षा नहीं छीनी जा सकती।
तत्काल मां को सौंपी जाए कस्टडी, दादी को मिले मिलने के सीमित अधिकार
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला निरस्त करते हुए आदेश दिया कि बच्चे की कस्टडी तत्काल प्रभाव से उसकी मां को सौंपी जाए। इसके साथ ही मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए अदालत ने दादी को 'विजिटेशन राइट्स' (मिलने का अधिकार) भी प्रदान किए। आदेश के मुताबिक, शुरुआती छह महीनों में दादी हर दूसरे सप्ताहांत पर तय समय के लिए मां के आवास पर जाकर बच्चे से मिल सकेंगी, ताकि बच्चे का पारिवारिक जुड़ाव भी बना रहे।